आधी रात को आइशा की खिड़की दूसरे शहर में खुलती थी।
पहली रात उसने सोचा — नींद की कमी है। दूसरी रात उसने सोचा — शायद सपना है। तीसरी रात उसने खिड़की की चौखट पर उँगली रखी और समझ गई कि सपनों में लकड़ी इतनी ठंडी नहीं होती।
आइशा अट्ठाईस साल की आर्किटेक्ट थी। बांद्रा की सत्तर साल पुरानी इमारत में उसने तीसरी मंज़िल का फ़्लैट लिया था — फ़्लैट नंबर 302, किराया सस्ता, दीवारें ऊँची, और पूर्वी दीवार पर एक खिड़की जो किसी नक़्शे में नहीं थी। दिन में वो खिड़की मुंबई की गली में खुलती थी — रिक्शे, सब्ज़ी वाला, बच्चों की चीख़-पुकार। लेकिन रात बारह बजते ही उसके पार का नज़ारा बदल जाता था।
उस पार जोधपुर की एक नीली गली थी — नीले रंग से पुती दीवारें, डोर पर लटकी गेंदे की मालाएँ, पत्थर की सिल पर रखा पीतल का लालटेन, और एक आदमी जो आधी रात को गली के बीचों-बीच ईज़ल लगाकर पेंटिंग कर रहा था।
पहली रात आइशा ने खिड़की बंद करके फिर खोली। गली वहीं थी। तीसरे दिन वो नीचे उतरकर इमारत के बाहर गई और पूर्वी दीवार को ग़ौर से देखा। वहाँ कोई खिड़की थी ही नहीं। दीवार सपाट थी, जैसे किसी ने उसे प्लास्टर से मिटा दिया हो।
उस रात बारह बजकर चार मिनट पर वो फिर खिड़की के सामने खड़ी थी, और उस पार वाला आदमी मुस्कुरा रहा था।
"आप रोज़ इसी वक़्त खिड़की खोलती हैं," उसने कहा।
"और आप रोज़ इसी वक़्त पेंटिंग करते हैं?" आइशा ने पूछा।
"मैं तो सालों से इसी वक़्त पेंटिंग करता हूँ। बस देखने वाला कोई नहीं था।"
उसका नाम अरमान था। तीस साल का। जोधपुर की नीली गली में उसका छोटा-सा स्टूडियो था, और वो रात को पेंटिंग इसलिए करता था क्योंकि दिन की रोशनी में उसे रंग "झूठे" लगते थे।
(AI generated illustration)
खिड़की के नियम
अगले कुछ दिनों में आइशा ने खिड़की के नियम समझ लिए। खिड़की सिर्फ़ रात बारह से एक के बीच खुलती थी। छोटी चीज़ें उसके पार जा सकती थीं — उसने एक दिन अपनी स्केचबुक का पन्ना सरकाया, और वो अरमान के हाथ में पहुँच गया। अरमान ने एक गेंदे का फूल भेजा, जो आइशा की हथेली पर आकर गिरा, अभी भी ताज़ा, अभी भी महकता हुआ। लेकिन जब आइशा ने एक रात खिड़की से बाहर झुककर गली में उतरने की कोशिश की, तो काँच पत्थर बन गया। शरीर पार नहीं जा सकता था। सिर्फ़ छोटी-छोटी चीज़ें। सिर्फ़ एहसास।
उसने फ़ोटो खींचने की कोशिश की। फ़ोन की स्क्रीन पर सिर्फ़ उसकी अपनी दीवार दिखी — खाली, सपाट, बिना खिड़की वाली।
रातें बदलने लगीं। आइशा दिन में ऑफ़िस में बैठकर रात के बारह बजने का इंतज़ार करती।
एक रात अरमान ने पूछा, "तुमने कभी सोचा है कि ये खिड़की क्यों खुली?"
"रोज़ सोचती हूँ," आइशा ने कहा। "और रोज़ जवाब बदल जाता है।"
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एक घंटे की दुनिया
धीरे-धीरे वो एक घंटा आइशा की पूरी दुनिया बन गया। बाक़ी तेईस घंटे बस इंतज़ार थे। कभी दोनों चुप रहते — सिर्फ़ दो शहरों की रात की आवाज़ें, और बीच में एक खिड़की की ख़ामोशी।
एक रात दोनों एक साथ खिड़की की तरफ़ झुके। उनके माथे काँच से बस एक साँस की दूरी पर थे। काँच गर्म था — जैसे दोनों तरफ़ से दो दिलों की धड़कन उसे सेंक रही हो।
"काँच के इस पार तुम्हारी साँसें मुझे सुनाई देती हैं," अरमान ने फुसफुसाकर कहा।
"और इस पार तुम्हारी," आइशा ने कहा। "कभी-कभी लगता है, काँच है ही नहीं।"
दस दिन का नोटिस
फिर एक सुबह इमारत के गेट पर एक नोटिस चिपका मिला — बिल्डिंग टूटेगी। दस दिन में खाली करना होगा। ये वाली खिड़की — जो किसी नक़्शे में नहीं थी — दीवार के साथ ही मिट्टी में मिल जाएगी।
"दस दिन," आइशा ने कहा। "दस रातें। फिर ये दीवार गिरा दी जाएगी।"
उस रात खिड़की कुछ झिलमिलाई — जैसे लालटेन की लौ हवा में काँपती है। अरमान ने अपनी हथेली काँच पर रखी। आइशा ने अपनी हथेली उसकी हथेली के ठीक सामने रखी।
"सुनो," अरमान ने कहा। "मेरी दादी कहती थीं — खिड़की रास्ता नहीं दिखाती, खिड़की रास्ता बनाती है। जो उस पर चल पड़े, उसके लिए।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि खिड़की से पार जाने का रास्ता खिड़की से नहीं होता। टिकट से होता है।" वो मुस्कुराया, लेकिन उसकी आँखों में वो मुस्कुराहट नहीं थी जो आइशा ने पहली रात देखी थी। "अगर ये खिड़की बंद हो जाए, तो क्या तुम जोधपुर आओगी? सच वाले जोधपुर। जहाँ ये गली सच में है, और मैं सच में हूँ?"
आइशा चुप रही। डर था — क्या होगा अगर वो गली सच में न हुई? क्या होगा अगर अरमान सिर्फ़ खिड़की का सपना हुआ?
"मैं सोचूँगी," उसने कहा।
"दस रातें हैं," अरमान ने कहा। "सोचने के लिए काफ़ी हैं।"
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आख़िरी रात
दसवीं रात आई। आइशा ने अपना सामान बाँध लिया था। सुबह उसे फ़्लैट खाली करना था। रात बारह बजे खिड़की खुली, और उस पार अरमान खड़ा था — हाथ में एक छोटा-सा कैनवास, जिस पर उसने वो खिड़की बनाई थी जिससे आइशा उसे देखती थी।
"ये तुम्हारे लिए," उसने कहा, और कैनवास काँच के पार सरकाया। "ताकि जब खिड़की न रहे, तब भी तुम्हें याद रहे कि वो कहाँ थी।"
आइशा ने कैनवास थामा। फिर उसने धीरे से कहा, "मैं आ रही हूँ, अरमान। सच वाले जोधपुर। कल सुबह की फ़्लाइट है।"
गली में लालटेन की लौ एक पल के लिए ठहर गई। फिर अरमान ने अपनी हथेली काँच पर रखी, और आइशा ने अपनी। दोनों ने एक साथ काँच को चूमा — एक तरफ़ गर्म साँसें, दूसरी तरफ़ गर्म साँसें, और बीच में एक पतली-सी परत जो उस रात दुनिया की सबसे क्रूर दीवार लग रही थी। एक पल के लिए लगा, जैसे काँच पिघल गया हो और दोनों एक ही हवा में साँस ले रहे हों।
एक बजा। खिड़की बंद हुई। दीवार सपाट हो गई। आइशा ने कैनवास को सीने से लगाया और सुबह होने तक वहीं बैठी रही।
नीली गली, सच वाली
अगली शाम आइशा जोधपुर की एक गली में खड़ी थी। नीले रंग से पुती दीवारें। डोर पर लटकी गेंदे की मालाएँ। पत्थर की सिल। और सामने — एक छोटा-सा स्टूडियो, जिसके दरवाज़े पर लिखा था "अरमान आर्ट स्टूडियो"।
दरवाज़ा खुला, और अरमान सामने था। उसने उसे अंदर बुलाया। स्टूडियो की पिछली दीवार पर एक खिड़की थी — पुरानी, लकड़ी की, नक्क़ाशीदार चौखट वाली। और उस खिड़की के पार मुंबई का आसमान दिख रहा था। आइशा का पुराना फ़्लैट। जहाँ अब कोई खिड़की नहीं थी, वहाँ से अब भी एक खिड़की खुलती थी — बस उसका पता बदल गया था।
आइशा हँस पड़ी। आँखों में आँसू थे, होंठों पर हँसी थी।
"खिड़की बंद नहीं हुई थी," उसने कहा। "वो सिर्फ़ अपना पता बदल चुकी थी।"
अरमान ने उसका हाथ और मज़बूती से थामा। "और अब?"
"अब," आइशा ने कहा, "अब इस खिड़की के दोनों तरफ़ एक ही शहर है।"
उस रात जोधपुर की नीली गली में एक खिड़की देर तक खुली रही — बारह बजे से बहुत पहले, और एक बजे के बहुत बाद तक। क्योंकि अब उसे खुलने के लिए आधी रात का इंतज़ार नहीं था। अब उसके दोनों तरफ़ वो लोग थे जो एक-दूसरे को ढूँढ चुके थे।



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