दशहरे के मेले का बड़ा झूला आधी रात के बाद अपने आप घूमने लगता था — और सबसे ऊपर वाली टोकरी में हर रात दो लोग बैठे होते थे।
कबीर ने पहले ही दिन काउंटर वाली लड़की को ताकीद कर दी थी। "बारह बजने के बाद मैदान में मत निकलना," उसने कहा था, और टिकटों की गड्डी उसके हाथ में थमा दी थी। आशा ने भौंह उठाई थी। "क्यों? भूत है क्या?"
कबीर हँसा नहीं था। उनतीस साल का कबीर इस झूले को अपने दादा के ज़माने से जानता था — इसके हर नट-बोल्ट को, हर ज़ंजीर की आवाज़ को। मेले के मालिक का बेटा था वो, पर काम मैकेनिक वाला करता था। उसने धीरे से कहा था, "भूत नहीं। बस... कुछ चीज़ें रात को अपनी मर्ज़ी से चलती हैं।"
सत्ताईस साल की आशा दूसरे शहर से आई थी — मेले में टिकट काउंटर की अस्थायी नौकरी, पंद्रह दिन का काम, रहने को टेंट के पीछे एक छोटा-सा कमरा। पहले दो दिन सब सामान्य रहा। भीड़, शोर, बत्तियाँ, जलेबी की खुशबू। तीसरी रात बारह बजे के बाद उसकी आँख खुली — बाहर से लोहे की चरमराहट आ रही थी, जैसे कोई बहुत बड़ा पहिया साँस ले रहा हो।

उसने खिड़की का परदा हटाया। मैदान के बीचों-बीच बड़ा झूला घूम रहा था — खाली मैदान, बुझी बत्तियाँ, और वो पहिया अपने आप चक्कर काट रहा था। आशा की साँस अटक गई। तभी टेंटों के बीच से एक टॉर्च की रोशनी हिली — कबीर झूले की तरफ़ बढ़ रहा था।
वो भी बाहर निकल आई। "कबीर!"
कबीर ठिठका। झूला धीमा हुआ, और सबसे ऊपर वाली टोकरी — नंबर सात — नीचे आई और रुक गई। टोकरी खाली नहीं थी। उसमें पहले से कोई बैठा था।
"तुम?" कबीर ने कहा।
"तुम?" आशा ने कहा।
दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे, और झूला फिर चल पड़ा — इस बार दोनों को लेकर ऊपर। आशा चीख़ने वाली थी, पर कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया। "डरो मत। ये कुछ नहीं करता। बस... दिखाता है।"
टोकरी ऊपर उठी — और नीचे सब कुछ ठहरा हुआ था। चाय वाले की केतली से उठता धुआँ हवा में जमा था, एक दीये की लौ बीच में जमी हुई थी, दूर बँधा कुत्ता भौंकते-भौंकते आधा मुँह खोले रुक गया था। समय रुक गया था — सिर्फ़ उनके लिए, सिर्फ़ सात मिनट के लिए।
सात मिनट बाद झूला खुद नीचे आया। दोनों उतरे। कबीर का हाथ अब भी उसके हाथ में था।
"ये... ये क्या था?" आशा की आवाज़ काँप रही थी।
"पता नहीं," कबीर ने कहा। "पर ये हर रात होता है। और कल रात भी होगा।"
अगली रात आशा बारह बजने से दस मिनट पहले ही मैदान में थी। कबीर आया, बिना कुछ कहे टोकरी नंबर सात का दरवाज़ा खोला। उस रात बातें हुईं — धीमी, अधूरी, जैसे दो पुराने दोस्तों की। आशा ने बताया कि उसने बचपन से एक झूले को सपने में देखा है — "मैं इस कस्बे में पहली बार आई हूँ, कबीर। पर ये झूला... मैंने इसे सौ बार सपने में देखा है। वही बत्तियाँ, वही टोकरी नंबर सात।"
कबीर ने पहिए की तरफ़ देखा। "मेरे दादा कहते थे — इसमें जो एक बार ऊपर जाता है, वो नीचे वही नहीं उतरता।"
तीसरी, चौथी रात — बातें लंबी होती गईं। कबीर ने बताया कि वो इंजीनियरिंग छोड़कर मेले में लौट आया था। आशा ने बताया कि वो हर शहर में पंद्रह दिन रुकती है, फिर आगे बढ़ जाती है — "रुकना मुझे आता ही नहीं।"
उन रातों में कुछ और भी हो रहा था — नज़रों का ठहरना ज़रा लंबा, हाथों का छूना ज़रा धीमा। टोकरी की छोटी-सी जगह में दोनों के कंधे टकराते, और कोई हटता नहीं।
पाँचवीं रात आसमान में आतिशबाज़ी हो रही थी — दशहरा क़रीब था। टोकरी सबसे ऊपर पहुँची। नीचे रंग-बिरंगे फूल खिल रहे थे, दोनों के चेहरे इतने पास कि साँसें टकरा रही थीं। कबीर का हाथ उठा — आशा के गाल से बस एक छुअन की दूरी पर। उसके होंठ काँप रहे थे, और पूरी कायनात उन सात मिनटों में सिमट आई थी —
तभी झूला हिला। सात मिनट पूरे हो चुके थे। पल टूट गया, पर उसकी गूँज दोनों के सीने में रह गई।

छठी रात कबीर चुप था। टोकरी ऊपर पहुँची, और उसने आख़िर कहा — "तुम्हें एक बात बतानी है। दस साल की उम्र में मैं इसी झूले से गिरा था — ऊपर वाली टोकरी से। डॉक्टरों ने कहा था, बचना मुश्किल है।"
आशा ने उसका हाथ थाम लिया।
"उस रात के बाद से," कबीर ने कहा, "हर दशहरे पर ये झूला आधी रात को ख़ुद चलता है। जैसे... किसी का इंतज़ार करता हो। मैं रोज़ सोचता था — किसका? आज समझ आया।"
"किसका?"
"शायद वो मेरा इंतज़ार नहीं कर रहा था, आशा। शायद वो तुम्हारा था। तुम्हारे सपनों वाला झूला... तुम ही तो हो वो।"
आशा की आँखों में आँसू थे, पर वो मुस्कुरा रही थी। "तो फिर ये सात रातें... ये क्या हैं?"
"पता नहीं। पर कल सातवीं रात है। दादा कहते थे — सातवीं रात झूला कुछ माँगता है।"
सातवीं रात टोकरी ऊपर पहुँचकर ठहर गई — सबसे ऊपर, आसमान के बिल्कुल पास। नीचे मेले की बत्तियाँ एक-एक कर बुझने लगीं, जैसे कोई उन्हें फूँक मारकर बुझा रहा हो। दोनों ने एक साथ महसूस किया — झूला उनसे कुछ पूछ रहा था।
कबीर ने धीरे से कहा, "ये कह रहा है — ये सात मिनट हमेशा के लिए ले लो। ऊपर ही रह जाओ। समय के बाहर। जहाँ कोई सुबह नहीं, कोई बिछड़ना नहीं।" उसने आशा की ओर देखा। "या... एक सुबह ले लो। नीचे उतर जाओ। और फिर ये सात मिनट कभी वापस नहीं आएँगे।"
आशा ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। "तुम क्या चाहते हो, कबीर?"
"तुम्हारे साथ एक सुबह," उसने कहा। "सौ झूठे हमेशा से बेहतर एक सच्ची सुबह।"
और फिर उनके होंठ मिले — आतिशबाज़ी के रंगों के बीच, ठहरे हुए समय के बीचों-बीच। दुनिया में सिर्फ़ दो धड़कनें थीं, एक-दूसरे में घुलती हुई। झूला धीरे-धीरे हिला, जैसे आशीर्वाद दे रहा हो — और फिर नीचे उतरने लगा।
उस रात कबीर ने पहली बार झूले को अपने हाथों से चलाया — लीवर खींचा, पहिया घुमाया, टोकरी नंबर सात को ज़मीन पर उतारा। "अब ये मेरा है," उसने पहिए से कहा। "अब इसे किसी इंतज़ार की ज़रूरत नहीं।"
सुबह मेला उखड़ने लगा। टेंट गिरे, बत्तियाँ उतरीं, ट्रक लगे। आशा ने काउंटर का हिसाब चुकाया, अपना छोटा-सा बैग उठाया — और कबीर के ट्रक में बैठ गई। "अगला मेला कहाँ है?" उसने पूछा। कबीर ने मुस्कुराकर कहा, "जहाँ तुम हो, वहीं।"
ट्रक चला गया। खाली मैदान में झूला अकेला खड़ा था — तभी बिना हवा, बिना हाथ के उसका पहिया धीरे से घूमा। बस एक चक्कर।
उसमें एक ताज़ा गेंदे का फूल रखा था — जैसे किसी ने अलविदा कहा हो।

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