दरवाज़े पर एक शख़्स खड़ा था — भीगा हुआ, कंधे पर पुराना कैमरा-बैग, उम्र यही कोई इकतीस-बत्तीस। आँखों में वो थकान जो सिर्फ़ लंबी यात्रा या लंबे ग़म से आती है।
"रॉयल फ़ोटो स्टूडियो?" उसने पूछा। "सुना है यहाँ अब भी फ़िल्म डेवलप होती है।"
रिया ने शटर रोक दिया। "शहर में आख़िरी दुकान है। अंदर आइए।"
उसने बैग से Kodak की एक रोल निकाली — पीली डिब्बी, किनारे मुड़े हुए। लेबल पर फीकी स्याही में लिखा था: "धर्मशाला, 1998"।
रिया की साँस थम गई। "अट्ठाईस साल पुरानी अनडेवलप्ड रोल? ये तो ख़ज़ाना है।"
"मेरे बाबा की है," उसने कहा, और अपना नाम बताया — आदित्य। "छह महीने पहले वो गुज़रे। स्टोररूम से उनका कैमरा-बैग मिला। दिल्ली से ट्रैवल स्टोरी के लिए आया था, पर..." उसने रोल की तरफ़ देखा, "पहले ये देखना है।"
रिया ने लिफ़ाफ़ा पलटा। फ्लैप पर एक पुरानी मुहर थी — "रॉयल फ़ोटो स्टूडियो" — और उसके नीचे उसके नाना की जानी-पहचानी लिखावट।
कोने की आरामकुर्सी से एक धीमी आवाज़ आई। "1998... आदित्य के बाबा?"
चौरासी साल के रघुवीर — नाना — ने चश्मा ठीक किया और रोल को देखा। उनकी आँखों में कुछ चमका — पहचान, या शायद कोई पुराना हिसाब।
"तुम्हारे बाबा मेरे दोस्त थे, बेटा," उन्होंने कहा। "ये रोल डेवलप कराने आए थे। फिर कभी लौटे नहीं। अट्ठाईस साल से ये मेरी दराज़ में तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।"
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डार्करूम की लाल रोशनी में रिया ने रोल खोली। आदित्य दरवाज़े पर खड़ा देखता रहा।
"अंदर आओ," रिया ने कहा। "हल्के हाथ से — जैसे किसी की याद छू रहे हो।"
केमिकल की ट्रे में फ़िल्म डूबी, और धीरे-धीरे तस्वीरें उभरने लगीं। 1998 का धर्मशाला जीवित हो उठा — वो चायवाला जो अब नहीं है, वो मठ जो अब बड़ा हो गया है, वो पुल जो अब भी वैसा ही है।
पैंतीस फ़्रेम। और फिर छत्तीसवीं।
आदित्य ने पहले देखा। "रुको... ये लड़की कौन है?"
रिया ने पट्टी को रोशनी की तरफ़ उठाया। पुल पर खड़ी लड़की। मैरून शॉल। वही शॉल जो इस वक़्त दुकान के पिछले कमरे में टंगी थी — नानी की निशानी, जिसे रिया सर्दियों में पहनती थी।
"डबल एक्सपोज़र होगा," आदित्य ने कहा, पर उसकी आवाज़ में यक़ीन नहीं था।
"नाना कभी ग़लती से डबल एक्सपोज़र नहीं करते थे," रिया ने धीरे से कहा। "और ये रोल उन्होंने नहीं, तुम्हारे बाबा ने शूट की थी।"
वो दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। लाल बत्ती की रोशनी में आदित्य का चेहरा गंभीर था।
"1998 में," रिया ने फुसफुसाकर कहा, "मैं पैदा भी नहीं हुई थी।"
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नाना उस रात देर तक जागे। रिया ने उन्हें छत्तीसवीं फ़्रेम दिखाई।
बूढ़ी आँखों ने तस्वीर को देर तक देखा। फिर रघुवीर मुस्कुराए — वो मुस्कान जो राज़ जानने वालों की होती है।
"ये कैमरा," उन्होंने अपने 1962 के Leica की तरफ़ इशारा किया, "हर मालिक को ज़िंदगी में एक बार कल की तस्वीर देता है।"
"नाना, पहेलियाँ मत बुझाइए," रिया ने कहा, पर उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"पहेली नहीं, बेटा। वादा है।" उन्होंने आदित्य की तरफ़ देखा। "तुम्हारे बाबा ने जाते हुए कहा था — 'रघुवीर, मेरा बेटा एक दिन ये रोल लेने आएगा।' और मैंने उस दिन फ़ैसला कर लिया था।"
"कैसा फ़ैसला?"
"1998 में मैंने पुल पर एक अजनबी लड़की की तस्वीर ली थी — मैरून शॉल वाली। सालों बाद, जब तुम पहली बार अपनी नानी की शॉल ओढ़कर उसी पुल पर गईं, रिया..." नाना रुके, "मैंने उसी रोल की आख़िरी फ़्रेम पर तुम्हारी तस्वीर डबल एक्सपोज़ की। जानबूझकर।"
डार्करूम में सन्नाटा छा गया। बाहर बारिश तेज़ हो गई थी।
"कल मैंने देखा नहीं था, बेटा," रघुवीर ने धीरे से कहा। "कल मैंने बनाया था।"
रिया की आँखों में आँसू आ गए। "मतलब... ये भविष्यवाणी नहीं थी?"
"कैमरा भविष्य नहीं बताता," नाना ने उसका हाथ थामा। "वो बस याद दिलाता है — कुछ मुलाक़ातें तय होती हैं। मैंने सिर्फ़ उस तय मुलाक़ात की तस्वीर पहले खींच ली थी।"
आदित्य ने निगेटिव की तरफ़ देखा, फिर रिया की तरफ़। उसकी आँखों में अब डर नहीं था — कुछ और था। कुछ नरम, कुछ तय।
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अगली भोर वो दोनों पुराने पत्थर के पुल पर थे। कोहरा इतना गाढ़ा कि पुल का दूसरा सिरा दिख ही नहीं रहा था।
रिया ने मैरून शॉल ओढ़ी थी — वही शॉल। आदित्य के हाथ में नाना का Leica था।
"ठीक उसी जगह," रिया ने कहा, और पुल की रेलिंग के पास जाकर खड़ी हो गई — बिल्कुल वैसे ही, जैसे छत्तीसवीं फ़्रेम में थी।
आदित्य ने व्यूफ़ाइंडर से देखा। कोहरे के बीच रिया — शॉल, आधा मुड़ा चेहरा, वही मुस्कान। अट्ठाईस साल पुरानी तस्वीर जीवित हो उठी थी।
उसने शटर दबाया। क्लिक की आवाज़ कोहरे में घुल गई।
फिर उसने कैमरा नीचे कर दिया।
"तस्वीर हो गई," उसने कहा, और उसके क़रीब आया। "अब वो, जो तस्वीर में नहीं आ सकता।"
कोहरे की सफ़ेदी में वो इतने क़रीब थे कि एक-दूसरे की साँसें महसूस हो रही थीं। रिया के हाथ उसकी जैकेट के किनारे पर ठहरे — धीरे, जैसे कोई क़ीमती निगेटिव थाम रही हो। आदित्य की उँगलियाँ उसके चेहरे तक आईं, रुकीं, फिर शॉल के किनारे को सहलाती हुई नीचे उतर आईं।
उनके होंठ बस छूने को थे —
और तभी कोहरे ने उन्हें ढँक लिया। नरम, सफ़ेद, पूरी तरह।
बाक़ी कहानी कोहरे ने अपने पास रख ली।
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सुबह चायवाले की आवाज़ पर आँख खुली — "कुल्हड़ चाय!"
वो दोनों स्टूडियो की छत पर थे, कंधे से कंधा मिलाए। घाटी में धूप उतर रही थी। रात कब बीती, पता ही नहीं चला था।
डार्करूम में नई फ़िल्म की पट्टी सूख रही थी। रिया ने उसे रोशनी की तरफ़ उठाया।
आख़िरी फ़्रेम में पुल था, कोहरा था, मैरून शॉल थी — और इस बार फ़्रेम में दो लोग थे।
रिया हँस पड़ी — वही साफ़, खुली हँसी। "कल पूरा हो गया।"
उसी हफ़्ते रॉयल फ़ोटो स्टूडियो के साइनबोर्ड पर एक नई लाइन पेंट हुई: "कल की तस्वीरें भी बनती हैं।"
और नाना रघुवीर अपनी आरामकुर्सी से मुस्कुराते हुए बोले, "एक रोल अभी बाक़ी है — तुम्हारी शादी वाला।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
रॉयल फ़ोटो स्टूडियो की लाल बत्ती उस रात तीन बजे जली — और सत्ताईस साल की रिया ने पहली बार देखा कि एक निगेटिव भी डर सकता है।
वो डार्करूम की ट्रे पर तैरती फ़िल्म की पट्टी को देख रही थी। पैंतीस फ़्रेम — 1998 का धर्मशाला। मठ की सीढ़ियाँ, चाय की दुकानें, कोहरे में डूबा पुराना पत्थर का पुल।
और फिर छत्तीसवीं फ़्रेम आई।
उसी पुल पर, उसी कोहरे में, एक लड़की खड़ी थी — मैरून शॉल ओढ़े, चेहरा आधा मुड़ा हुआ, जैसे फ़ोटोग्राफ़र को देखकर मुस्कुरा रही हो।
रिया के हाथ काँपने लगे। वो शॉल उसकी थी। उसकी नानी सावित्री की — जो अब वो ख़ुद पहनती थी।
"ये..." उसकी आवाज़ ट्रे के पानी में डूब गई, "ये मैं हूँ?"
पर 1998 में वो पैदा भी नहीं हुई थी।
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शाम के सात बजे थे जब दुकान की घंटी बजी थी। बाहर मैक्लोडगंज की गलियों में हल्की बारिश हो रही थी, और रिया शटर गिराने ही वाली थी।



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