बारिश इतनी तेज़ थी कि लैंडौर की पूरी पहाड़ी एक ही आवाज़ में डूबी हुई थी — और तभी, किताब महल के बंद दरवाज़े के नीचे से एक लिफ़ाफ़ा अंदर सरक आया।
मीरा ने उसे उठाया। लिफ़ाफ़ा गीला था, पुराना था — और उस पर लगी मोहर ने उसकी साँस रोक दी। मोहर पर लिखा था: 2006।
बीस साल पुरानी मोहर।
मीरा अट्ठाईस साल की थी। दो साल पहले दादी के जाने के बाद उसने यही पुरानी किताबों की दुकान सँभाली थी — लकड़ी की अलमारियाँ, धूल में लिपटे दुर्लभ संस्करण, और एक खिड़की जिससे हर शाम पहाड़ों पर उतरती धुंध दिखती थी।
लिफ़ाफ़े पर पता लिखा था — "किताब महल की मालकिन के नाम।" मीरा ने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला।
"मेरी अनजान," चिट्ठी शुरू होती थी, "मैं तुम्हें जानता नहीं, पर मैंने तुम्हें सपने में देखा है। एक दिन तुम इस दुकान की मालकिन होगी, और तुम्हारे हाथों में मेरी यह चिट्ठी होगी। मुझे नहीं पता यह चिट्ठी तुम तक कब पहुँचेगी — शायद बरसों बाद। पर प्यार को देर से पहुँचने की आदत होती है।" चिट्ठी के नीचे हस्ताक्षर था — "देव।"
मीरा ने चिट्ठी दोबारा पढ़ी, फिर तीसरी बार। काग़ज़ की उम्र झूठ नहीं बोलती थी — स्याही फीकी पड़ चुकी थी, काग़ज़ के किनारे पीले थे। चिट्ठी की आख़िरी लाइन में लिखा था: "आज रात बारिश में, जब तुम यह चिट्ठी पढ़ रही होगी, तो खिड़की से बाहर देखना — कोई तुम्हें देख रहा होगा।"
मीरा ने खिड़की से बाहर देखा। बारिश में, दुकान के सामने वाली गली में, एक आदमी खड़ा था — छाता लिए, दुकान की तरफ़ देखते हुए। जैसे ही मीरा की नज़र उस पर पड़ी, वह मुड़ा और धुंध में ग़ायब हो गया।
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हर रात बदलने वाली आख़िरी लाइन
मीरा ने उस रात चिट्ठी को अपनी मेज़ की दराज़ में रख दिया। पर नींद नहीं आई।
अगली सुबह उसने दराज़ खोली तो चिट्ठी की आख़िरी लाइन बदल चुकी थी। अब वहाँ लिखा था: "कल तुमने खिड़की से बाहर देखा था, है ना? डरना मत। मैं वह नहीं हूँ जो डराता है। मैं वह हूँ जो इंतज़ार करता है।"
मीरा के हाथ से चिट्ठी छूटकर मेज़ पर गिर गई। यह नामुमकिन था। चिट्ठी रात भर दराज़ में बंद थी। फिर भी, उसकी आख़िरी लाइन बदल गई थी — जैसे किसी ने रात के अँधेरे में, उसी स्याही से, उसी लिखावट में, एक नई लाइन लिख दी हो।
उस दिन मीरा ने एक फ़ैसला किया। उसने चिट्ठी के पीछे, अपनी लिखावट में, एक जवाब लिखा: "तुम कौन हो? और बीस साल बाद यह चिट्ठी मेरे पास क्यों आई?" फिर उसने चिट्ठी को उसी लिफ़ाफ़े में डालकर दुकान के पुराने लेटर-बॉक्स में रख दिया।
अगली सुबह लेटर-बॉक्स में चिट्ठी थी — और उसके पीछे लिखा था: "मैं देव हूँ। बीस साल पहले मैंने यह चिट्ठी लिखी थी, पर इसे भेजने की हिम्मत नहीं हुई। अब यह चिट्ठी ख़ुद चलकर तुम तक पहुँची है।"
मीरा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। हर रात वह लेटर-बॉक्स में एक नई लाइन छोड़ जाती — और हर सुबह, उसका जवाब मिलता। कभी देव उसे पहाड़ों की कहानियाँ सुनाता। कभी वह लिखती, "आज बहुत अकेला महसूस हुआ," और सुबह जवाब मिलता, "अकेलापन भी एक किताब की तरह है — सही हाथों में आते ही खुल जाता है।"
एक रात मीरा ने लिखा: "काश तुम सामने आ सकते।" सुबह जवाब था: "जल्दी ही। बहुत जल्दी।"
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वो आदमी जो किताबें जिलाता था
उसी हफ़्ते दुकान में एक नया चेहरा आया।
"मैं कबीर हूँ," उसने कहा। "पुरानी किताबों की जिल्दसाज़ी करता हूँ। आपकी दुकान के दुर्लभ संस्करणों की मरम्मत के लिए ट्रस्ट ने मुझे भेजा है।"
कबीर तीस साल का था — लंबा, शांत, हाथों में किताबों को ऐसे पकड़ता था जैसे वे ज़िंदा चीज़ें हों। उसने दुकान की सबसे पुरानी अलमारी खोली, एक फटी हुई जिल्द को हाथ में लिया, और बोला, "यह किताब दो सौ साल पुरानी है। इसके पन्ने साँस ले रहे हैं।"
दिन गुज़रने लगे। कबीर सुबह आता, देर रात तक दुकान में काम करता। वह फटी जिल्दों को सीता, टूटे पन्नों को जोड़ता। मीरा को धीरे-धीरे एहसास हुआ कि कबीर के आने के बाद दुकान की हवा ही बदल गई थी।
एक शाम, जब बारिश फिर तेज़ थी, मीरा ने कबीर को चाय के लिए रोका। बातों-बातों में उसने चिट्ठी का ज़िक्र कर दिया। कबीर की चाय का कप एक पल के लिए रुक गया।
"देव?" उसने धीरे से कहा। "तुम जानते हो उसे?"
कबीर ने कुछ देर खिड़की से बाहर बारिश को देखा। फिर बोला, "देव मेरे दादाजी थे — लैंडौर के डाकिए। बीस साल पहले वे एक चिट्ठी लेकर घूमते थे, जिसे उन्होंने कभी डाक में नहीं डाला।"
"दादाजी के जाने के बाद मुझे वह चिट्ठी उनकी पुरानी थैली में मिली," कबीर ने कहा। "और मैंने उसे यहाँ पहुँचा दिया।"
ख़त का सच
मीरा को लगा जैसे दुकान की सारी किताबें एक साथ चुप हो गई हों। "तो बदलती हुई लाइनें? जवाब? वह सब... तुम थे?"
कबीर ने सिर झुकाया। "हाँ। मैं रात को, काम के बाद, तुम्हारे जवाब पढ़ता था — और उसी स्याही से, दादाजी की लिखावट की नक़ल में, जवाब लिख देता था। मुझे पता है, यह ग़लत था। पर जब मैंने पहली बार तुम्हारा जवाब पढ़ा — 'आज बहुत अकेला महसूस हुआ' — तो मुझे लगा जैसे वह लाइन मेरे लिए ही लिखी गई हो।"
मीरा की आँखों में ग़ुस्सा और आँसू, दोनों एक साथ आ गए। "तुमने मुझे बेवकूफ़ बनाया, कबीर। मैं रात-रात भर एक भूत से बातें करती रही!"
"नहीं," कबीर ने धीरे से कहा, और अपनी जेब से एक पुरानी डायरी निकाली। "दादाजी की डायरी है। बीस साल पहले उन्होंने एक सपना देखा था — सपने में एक लड़की थी, जो एक पुरानी किताबों की दुकान की मालकिन थी, और जिसके हाथों में उनकी चिट्ठी थी।"
उसने डायरी का एक पन्ना मीरा की तरफ़ बढ़ाया। उस पर, दादाजी की लिखावट में, एक ही लाइन थी: "जिस दिन यह चिट्ठी अपने पते पर पहुँचेगी, उस दिन मेरे पोते को अपनी मंज़िल मिल जाएगी।"
मीरा ने डायरी देखी, फिर कबीर को देखा। ग़ुस्सा धीरे-धीरे पिघलने लगा।
"तो तुमने दादाजी की चिट्ठी को आगे बढ़ाया," मीरा ने धीरे से कहा, "और मैं... मैं उसी चिट्ठी के जवाब देती रही।"
"और अब," कबीर ने कहा, "चिट्ठी का आख़िरी जवाब मैं अपने हाथ से लिखना चाहता हूँ — अपनी लिखावट में।"
उसने चिट्ठी उठाई, और उसकी आख़िरी लाइन के नीचे, अपनी लिखावट में लिखा: "अब यह ख़त किसी और को नहीं जाएगा।"
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फिर उसने मीरा का चेहरा अपनी हथेलियों में लिया। मीरा की पलकें झुक गईं। जब उसके होंठ मीरा के होंठों से मिले, तो बाहर बारिश जैसे एक पल के लिए थम गई — एक लंबा, गहरा, मीठा चुम्बन, जिसमें बीस साल का इंतज़ार और दो दिलों की हर अधूरी लाइन, दोनों घुल गए थे। फिर वह रात एक मीठे सन्नाटे में डूब गई, जिसमें सिर्फ़ दो धड़कनें थीं।
सुबह जब दोनों दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे, मीरा ने चिट्ठी को एक काँच के फ्रेम में लगाकर दुकान की दीवार पर टाँग दिया।
कबीर ने मुस्कुराकर कहा, "अब इस चिट्ठी को कोई और लाइन नहीं चाहिए।"
मीरा ने उसका हाथ थामा। "नहीं," उसने कहा, "अब इस चिट्ठी की हर लाइन हम दोनों मिलकर लिखेंगे।"
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।



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