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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

चौदहवीं सीढ़ी

तेरह सीढ़ियाँ थीं — उसने गिनी थीं, दो बार। चौदहवीं उसे रात को मिली।

सत्ताईस साल की शिवांगी दिल्ली की एक आर्किटेक्चर फ़र्म के लिए शिमला आई थी। काम था — 1928 का एक पुराना अंग्रेज़ों के ज़माने का बंगला, "विलो कॉटेज", जिसे एक बुटीक होटल में बदलना था। नक़्शे, माप, डेडलाइन — सब कुछ काग़ज़ पर तय था।

बंगले के पीछे एक पत्थर की सीढ़ी थी — पुरानी, काई जमी हुई, जो कभी नौकरों के क्वार्टर की छत तक जाती थी।

शिवांगी ने पहले ही दिन उसे नापा था। तेरह सीढ़ियाँ। ऊपर एक सफ़ेद पुती हुई दीवार — छत का दरवाज़ा बरसों पहले बंद करके चुनवा दिया गया था।

"डेड स्पेस," उसने अपनी नोटबुक में लिखा। "यहाँ ग्लास एट्रियम आएगा।"

पहली रात वो देर तक काम करती रही। आधी रात के क़रीब बंगले के पीछे से कोई आवाज़ आई — पानी की धार, बहुत हल्की, जैसे कोई पौधों को सींच रहा हो।

और उसके साथ एक ख़ुशबू — रातरानी की, इतनी तेज़ कि खिड़की का शीशा जैसे महक उठा।

शिवांगी टॉर्च लेकर बाहर निकली। सीढ़ी के पास पहुँचकर वो ठिठक गई।

उसने गिना। एक, दो, तीन... चौदह।

चौदहवीं सीढ़ी के ऊपर कोई दीवार नहीं थी। एक खुली छत थी — और छत पर एक बग़ीचा, चाँदनी में नहाया हुआ।

सफ़ेद फूल — चमेली, मोगरा, रातरानी — इतने खिले हुए थे जैसे चाँद ने उन्हें खुद छुआ हो। बीच में एक आदमी खड़ा था, पीतल की कैन से पौधों को पानी दे रहा था।

तीस के आसपास की उम्र। कंधे पर गमछा, हाथों में मिट्टी।

"तुम..." शिवांगी की आवाज़ अटक गई। "यहाँ छत थी? दिन में तो दीवार थी।"

वो हँसा — ऐसी हँसी जैसे ये सवाल वो पहले भी सुन चुका हो। "दिन में दीवार होती है। रात को रास्ता। मैं युग।"

"शिवांगी।" उसने टॉर्च नीचे की। "तुम यहाँ क्या करते हो?"

"दादाजी का बग़ीचा सँभालता हूँ। वो इस बंगले के माली थे — चालीस साल।" युग ने एक फूल की डाली को छुआ। "ये फूल दिन में नहीं खिलते। सिर्फ़ रात को — और सिर्फ़ तब, जब कोई इन्हें देखने आए।"

"ये... मुमकिन नहीं है। मैंने नापा था। तेरह सीढ़ियाँ—"

"तेरह ही हैं," युग ने कहा। "चौदहवीं नापी नहीं जाती।"

शिवांगी को लगा जैसे किसी ने उसके पेशे पर सवाल उठा दिया हो। वो कुछ कहने वाली थी — तभी चाँदनी में उसकी आँखें इतनी साफ़ दिखीं कि बहस बेवक़ूफ़ी लगी।

"कल आओगी?" उसने पूछा। "ख़ाली हाथ।"

"ख़ाली हाथ मतलब?"

"टेप, नोटबुक, फ़ोन — सब नीचे छोड़कर। बग़ीचा नापा नहीं जाता, शिवांगी।"

वो रात शिवांगी देर तक सो न सकी। आर्किटेक्ट की ज़िंदगी में हर चीज़ नापी जाती थी — और पहली बार कोई चीज़ नाप से बाहर मिली थी।

अगली रात वो टेप सीढ़ी के नीचे ही छोड़ आई।

चौदह सीढ़ियाँ। छत। बग़ीचा। युग।

वो घंटों बैठे रहे — फूलों के बीच, चाँदनी में। युग ने बताया — दादाजी कहते थे, ये बग़ीचा उनकी दादी ने लगाया था, उस रात जब उनकी शादी हुई थी। "दादी कहती थीं — जो फूल रात को खिलते हैं, वो दिन की दुनिया से नहीं डरते।"

"और तुम्हारे दादाजी?"

"वो हर रात यहाँ आते थे। कहते थे — बग़ीचे को अकेला नहीं छोड़ते।" युग की आवाज़ धीमी हो गई। "अब मैं आता हूँ।"

शिवांगी ने उसकी तरफ़ देखा — चाँदनी में उसके गाल पर मिट्टी का एक धब्बा था, और उसे वो धब्बा छूने का मन हुआ। उसने हाथ बढ़ाया भी — फिर रोक लिया। युग ने उसका रुका हाथ देखा, और मुस्कुराया।

तीसरी रात हल्की बारिश थी। युग ने उसे दादाजी की पुरानी शॉल ओढ़ा दी — लकड़ी और मिट्टी की ख़ुशबू वाली।

"तुम्हें डर नहीं लगता? इतनी रात को, अकेले?"

"डर उस चीज़ से लगता है जो छूट जाए," युग ने कहा। "ये बग़ीचा तो हर रात मिलता है।"

उस रात पहली बार शिवांगी ने सोचा — काश ये प्रोजेक्ट कभी ख़त्म न हो।

चौथे दिन फ़र्म से फ़ोन आया।

"शिवांगी, क्लाइंट ने प्लान अप्रूव कर दिया। टेरेस विंग पूरी तरह तोड़कर ग्लास एट्रियम बनेगा। ड्रॉइंग्स परसों तक चाहिए।"

उसने "ठीक है" कहा। फ़ोन रखकर वो बहुत देर तक खिड़की से पीछे की सीढ़ी देखती रही।

शाम को वो बग़ीचे की "आख़िरी" तस्वीरें लेने गई — रिकॉर्ड के लिए। टेप भी साथ था। "डॉक्यूमेंटेशन," उसने नोटबुक में लिखा, पर हाथ काँप रहे थे।

रात को वो सीढ़ी चढ़ी।

एक, दो, तीन... तेरह।

चौदहवीं नहीं थी। ऊपर वही सफ़ेद पुती दीवार।

शिवांगी की साँस रुक गई। उसने फिर गिना। तेरह। सिर्फ़ तेरह।

"टेप नीचे छोड़ आओ," अँधेरे से युग की आवाज़ आई। वो सीढ़ी के नीचे खड़ा था।

"मैंने छोड़ा नहीं था," वो बुदबुदाई।

"जानता हूँ।" युग ऊपर आया, उसके पास खड़ा हो गया। "तुम आज बग़ीचे को देखने नहीं, नापने आई थीं।"

शिवांगी ने उसकी तरफ़ देखा — आँखों में आँसू थे, पर वो आर्किटेक्ट थी, रोती नहीं थी। "परसों ड्रॉइंग्स जानी हैं। ये विंग... टूटेगा।"

"जानता हूँ।"

"तुम्हें बुरा नहीं लग रहा?"

युग ने बहुत देर तक उसे देखा। फिर धीरे से कहा — "बुरा तब लगता, जब तुमने इसे काग़ज़ पर तोड़ा न होता। तुमने तो तोड़ भी दिया — और अब अलविदा कहने आई हो।"

ये बात चुभी — क्योंकि सच थी।

शिवांगी सीढ़ी पर ही बैठ गई। तेरहवीं सीढ़ी पर। नीचे घाटी में शिमला की बत्तियाँ टिमटिमा रही थीं।

"मेरे पास कोई रास्ता नहीं है, युग। ये मेरा काम है।"

"रास्ता हमेशा होता है," उसने कहा। "बस सीढ़ियाँ गिननी पड़ती हैं।"

वो रात शिवांगी ने नई शीट निकाली। टेरेस विंग को तोड़ा नहीं — बचाया। ग्लास एट्रियम की जगह उसने डिज़ाइन किया एक खुला "मूनलाइट गार्डन" — रात को खिलने वाले फूलों का लाउंज, जो सिर्फ़ अँधेरे के बाद खुलता।

सुबह के चार बजे उसने शीट समेटीं — हाथ में न टेप, न नोटबुक, न फ़ोन।

वो सीढ़ी के पास गई।

एक, दो, तीन... चौदह।

छत खुली थी। बग़ीचा चाँदनी में इस क़दर खिला था जैसे बरसों का इंतज़ार एक रात में पूरा हो गया हो। और बीच में युग खड़ा था — देख रहा था, मुस्कुरा रहा था।

"तुमने गिना?" उसने पूछा।

"गिना," शिवांगी बोली, और सीढ़ी चढ़ती चली गई। "ख़ाली हाथ।"

युग ने उसका हाथ थामा — और इस बार किसी ने हाथ नहीं रोका। चाँदनी में उसने शिवांगी के चेहरे को देखा — थकी हुई, ज़िद्दी, ख़ूबसूरत।

उनके होंठ मिले — धीरे, जैसे कोई पुराना वादा पूरा हो रहा हो, जैसे फूलों ने साँस रोक रखी हो।

बाक़ी रात रातरानी की ख़ुशबू ने अपने पास रख ली।

सुबह शिवांगी की आँख छत पर खुली — फूलों के बीच, एक पत्थर की बेंच पर। युग की शॉल अब भी उसके कंधों पर थी।

युग पास ही बैठा था, चाय का कुल्हड़ लिए। "क्लाइंट को ड्रॉइंग्स पसंद आएँगी?"

"आएँगी," शिवांगी ने कहा। "क्योंकि इस बार मैंने कुछ तोड़ा नहीं — कुछ जोड़ा है।"

क्लाइंट को ड्रॉइंग्स सिर्फ़ पसंद नहीं आईं — वो "मूनलाइट गार्डन" के नाम पर ही फ़िदा हो गया। विलो कॉटेज का नया नारा बना — "वो होटल, जहाँ रात को बग़ीचा खिलता है।"

और अब, हर पूर्णिमा की रात, होटल के मेहमानों को बताया जाता है — छत का बग़ीचा सिर्फ़ अँधेरे के बाद खुलता है।

शिवांगी और युग मेहमानों से पहले सीढ़ी चढ़ते हैं — हाथ में हाथ डाले, ख़ाली हाथ।

वो गिनती है — "तेरह..."

वो मुस्कुराता है — "चौदह।"

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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