आधी रात को घंटी बजी — और रिया की नींद टूट गई।
खिड़की के बाहर, झील-किनारे की सड़क पर, एक लाल साइकिल खड़ी थी। उस पर कोई नहीं था।
रिया सत्ताईस साल की थी। नैनीताल की झील के किनारे उसका छोटा-सा कैफ़े था — "चाय-किताब"। कैफ़े के ऊपर ही उसका कमरा था, जिसकी खिड़की से झील और सड़क, दोनों दिखते थे।
पहली रात जब उसने साइकिल देखी, तो उसे लगा किसी ग्राहक की साइकिल छूट गई है। उसने खिड़की से आवाज़ लगाई, "किसी की साइकिल छूट गई है!" कोई जवाब नहीं आया।
रिया नीचे उतरी। हैंडल ठंडा और गीला था, टोकरी में एक सफ़ेद जंगली फूल रखा था।
अगली रात, ठीक ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट पर, घंटी फिर बजी। इस बार रिया खिड़की से ही देखती रही। सड़क ख़ाली थी। फिर धुंध के बीच से, बिना किसी सवार के, वही लाल साइकिल धीरे-धीरे आती दिखी। पहिए अपने आप घूम रहे थे, हैंडल सीधा था, टोकरी में फिर एक फूल था। साइकिल कैफ़े के दरवाज़े के सामने आकर रुकी, घंटी ने एक बार बजकर जैसे अपना काम पूरा किया, और सब कुछ ख़ामोश हो गया।
रिया के हाथ काँपने लगे। उसने दरवाज़ा नहीं खोला। रात भर वह खिड़की के पास बैठी रही, और साइकिल सुबह की पहली रोशनी से पहले ही ग़ायब हो गई — जैसे धुंध में घुल गई हो।

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टोकरी में रखा स्केच
तीसरी रात रिया ने हिम्मत की। घंटी बजते ही वह नीचे उतरी, और साइकिल के जाने से पहले उसकी टोकरी में झाँका। फूल की जगह इस बार एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था — एक स्केच।
स्केच में उसका कैफ़े था — बोर्ड, खिड़की के गमले, दरवाज़े की बेंच — सब कुछ इतना सटीक कि बनाने वाले ने जैसे हर सुबह वहीं बैठकर देखा हो।
दिन में रिया ने सोचा — कौन है, जो रात को उसके कैफ़े का स्केच बनाता है?
चौथी रात टोकरी में दूसरा स्केच था — इस बार खिड़की पर बैठी हुई वह ख़ुद, हाथ में चाय का कप, नज़र झील की तरफ़। बनाने वाले ने उसे वहीं से देखा था — उस जगह से, जहाँ से झील सबसे सुंदर दिखती है।
"तुम कौन हो?" उसने धुंध से पूछा। "सामने क्यों नहीं आते?"
जवाब में साइकिल की घंटी ने एक बार धीरे से बजकर जैसे कुछ कहा — और फिर साइकिल धुंध में वापस चली गई।
साइकिल के पीछे
पाँचवीं रात रिया ने पीछा करने का फ़ैसला किया। उसने शॉल ओढ़ा और घंटी बजते ही साइकिल के पीछे चल पड़ी।

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आधा घंटा चला यह पीछा। फिर साइकिल एक पुरानी वर्कशॉप के सामने रुकी — झील के दूसरे छोर पर, जहाँ साइकिलें ठीक होती थीं। बोर्ड पर लिखा था: "विवान साइकिल वर्क्स"।
रिया ने दरवाज़ा धकेला। अंदर एक आदमी मेज़ पर सिर टिकाए सो रहा था।
दीवार पर टँगी घड़ी ने बारह बजाए, और सोते हुए आदमी ने नींद में ही कहा, "दादाजी... साइकिल फिर चली गई..."
रिया ने धीरे से मेज़ खटखटाई। आदमी चौंककर उठा। तीस साल का विवान — आँखों में नींद, हाथों में ग्रीस के दाग़, और चेहरे पर वह हैरानी, जो सिर्फ़ तब आती है जब कोई सपना अचानक सच हो जाए। उसने रिया को देखा, फिर दरवाज़े पर खड़ी साइकिल को देखा, और उसके हाथ से पेंसिल छूटकर नीचे गिर गई।
"तुम..." उसने धीरे से कहा। "तुमने पीछा किया?"
जिसने स्केच बनाए थे
विवान ने सब कुछ बता दिया — बिना कुछ छिपाए, बिना कोई बहाना बनाए।
यह लाल साइकिल उसके दादाजी की थी। चालीस साल तक दादाजी हर भोर इसी साइकिल पर झील के उस मोड़ तक जाते थे, जहाँ उनकी प्रेमिका चाय की छोटी-सी दुकान लगाती थीं। दादाजी कहते थे, "यह साइकिल रास्ता नहीं भूलती। यह दिल का रास्ता जानती है।"
दादाजी के जाने के बाद साइकिल वर्कशॉप में ही खड़ी रही — जब तक विवान ने एक दिन उसे ठीक करने के लिए हाथ नहीं लगाया। उसी रात से साइकिल अपने आप चलने लगी। हर रात ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट पर वह वर्कशॉप से निकलती, झील-किनारे की सड़क पर चलती, और उसी मोड़ पर जाकर रुकती — जहाँ कभी दादी की दुकान थी, और जहाँ अब रिया का कैफ़े था।
"और स्केच?" रिया ने पूछा।
विवान ने नज़रें झुका लीं। "स्केच मैं बनाता था। हर सुबह, तुम्हारे कैफ़े के सामने वाली बेंच पर बैठकर। मैं उन्हें टोकरी में रखता था — और साइकिल उन्हें तुम तक पहुँचा देती थी। सामने आकर कहने से मैं डरता था।"
"डरते थे?" रिया ने कहा। "किससे?"
"इससे," विवान ने धीरे से कहा, "कि तुम मना कर दोगी। और फिर तुम्हारे कैफ़े की वह बेंच, जहाँ मैं हर सुबह बैठता हूँ, वह भी मुझसे छिन जाएगी।"
रिया ने विवान की ओर देखा — उस आदमी को, जिसने दो महीने तक हर सुबह उसे चुपचाप देखा था और हर रात उसके लिए एक स्केच बनाया था।
"विवान," उसने कहा, "तुम्हारी साइकिल मुझसे ज़्यादा बहादुर निकली।"
विवान हँस पड़ा — वह हँसी, जिसमें राहत भी थी और शर्म भी। "दादाजी कहते थे, यह साइकिल उसी के पास रुकती है, जिससे इसके मालिक का दिल जुड़ जाए। मैंने कभी यक़ीन नहीं किया था। पर अब..."
उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया। रिया ने उसका हाथ थाम लिया। उसका हाथ गर्म था — ग्रीस और ठंड के बावजूद, एक ज़िंदा, धड़कता हुआ हाथ।
"तो अब?" रिया ने पूछा।
"अब," विवान ने कहा, "साइकिल को आराम देते हैं। कल सुबह मैं ख़ुद आऊँगा — बिना साइकिल के, बिना स्केच के। सिर्फ़ मैं।"
सुबह की सवारी
अगली सुबह विवान सचमुच आया — बिना साइकिल के, बिना स्केच के। उसने कैफ़े की बेंच पर नहीं, काउंटर के सामने बैठकर चाय माँगी। "एक चाय," उसने कहा, "और अगर हो सके तो... थोड़ी देर की बातचीत।"
रिया ने चाय बनाई। दोनों ने बातें कीं — वर्कशॉप की, कैफ़े की, दादाजी की, और उस साइकिल की, जिसने दो अजनबियों को बिना एक शब्द कहे मिला दिया था।
शाम को जब कैफ़े बंद हुआ, तो विवान ने कहा, "एक सवारी हो जाए?"
दोनों झील-किनारे की सड़क पर निकले — विवान साइकिल चला रहा था, रिया पीछे कैरियर पर बैठी थी। साइकिल की घंटी हर मोड़ पर बजती, जैसे वह ख़ुद भी इस सवारी से ख़ुश हो।
झील के उसी मोड़ पर, जहाँ कभी दादी की दुकान थी, विवान ने साइकिल रोकी। दोनों उतरे। रिया ने झील की तरफ़ देखा — पानी पर चाँद की पहली झलक, किनारे पर ठंडी हवा। विवान ने धीरे से उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लिया। रिया की पलकें झुक गईं। उसके होंठ रिया के होंठों से मिले — धीमे, गहरे, जैसे दो महीने की ख़ामोशी एक ही पल में पिघल गई हो। फिर वह शाम सिर्फ़ उन्हीं की थी, जिसमें दो धड़कनों के सिवा कुछ नहीं था।

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जब दोनों कैफ़े लौटे, तो लाल साइकिल दरवाज़े के सामने खड़ी थी — अपनी जगह पर, चुपचाप, जैसे उसका काम पूरा हो गया हो। रिया ने उसकी घंटी को छुआ। घंटी ने एक बार बजकर जैसे कहा — अब यह साइकिल किसी एक की नहीं, दो लोगों की है।
आज वह साइकिल "चाय-किताब" के दरवाज़े पर ही खड़ी रहती है, और विवान अब हर सुबह काउंटर के सामने बैठता है — बिना स्केच के, बिना बहाने के। कभी-कभी वह अब भी एक स्केच बनाता है — पर अब वह उसे टोकरी में नहीं रखता। वह उसे सीधे रिया के हाथ में देता है।
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।
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