धुंध वाली पटरी
रात के 2 बजकर 47 मिनट पर कालका स्टेशन की पुरानी घड़ी हमेशा की तरह रुक गई — और ठीक उसी पल धुंध के पार से सीटी की आवाज़ आई।
प्लेटफ़ॉर्म की ट्यूबलाइट तीसरी बार फड़फड़ाकर बुझ गई। रिया ने शॉल कसकर लपेटा। हवा में कोयले और गीली मिट्टी की गंध घुली थी, चाय की दुकान का शटर आधा गिरा था, और मोबाइल में नेटवर्क का एक भी डंडा नहीं था।
सत्ताईस साल की रिया — चंडीगढ़ की फिज़ियोथेरेपिस्ट — शिमला में अपनी कज़िन की शादी में जा रही थी। टैक्सी बीच रास्ते में खराब हो गई थी, एक ट्रक वाले ने उसे कालका स्टेशन तक छोड़ दिया था, और अब वो सुबह 5:10 की हिमालयन क्वीन का इंतज़ार कर रही थी।
तभी अनाउंसमेंट बोर्ड झिलमिलाया।
"2:47 — शिमला पैसेंजर — प्लेटफ़ॉर्म नंबर 1"
रिया भौंचक्की रह गई। रात के इस पहर कोई पैसेंजर? उसने आसपास देखा — प्लेटफ़ॉर्म सुनसान था। पर धुंध के भीतर से दो पीली आँखें उभरीं — हेडलाइट — और एक ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफ़ॉर्म पर सरक आई। पुराने ज़माने के मैरून डिब्बे, खिड़कियों से छनती गर्म पीली रौशनी, इंजन से उठता भाप का बादल।
एक बूढ़े टीसी ने उसका प्लेटफ़ॉर्म टिकट बिना देखे फाड़ दिया। "शिमला? डिब्बा नंबर तीन। जल्दी चढ़िए, ट्रेन रुकती नहीं।"
"रुकती नहीं मतलब?" रिया ने पूछा — पर टीसी पहले ही धुंध में आगे बढ़ चुका था।
ठंड हड्डियों में उतर रही थी। रिया डिब्बे में चढ़ गई।
अंदर गर्मी थी — पुरानी लकड़ी, चाय और किसी पुराने इत्र की मिली-जुली खुशबू। कुछ यात्री बैठे थे, चेहरे खिड़कियों की ओर, बिल्कुल स्थिर — जैसे किसी पुरानी तस्वीर में जमे हों। एक बूढ़ी औरत गोद में स्वेटर बुन रही थी, पर उसकी उँगलियाँ हिल नहीं रही थीं।
सामने वाली सीट पर एक आदमी अख़बार पढ़ रहा था। तीस-इकतीस का, हल्की दाढ़ी, आँखों में थकान और उससे भी गहरा कुछ — जैसे कोई बहुत पुराना इंतज़ार। उसने नज़र उठाई।
"बैठिए," उसने कहा, "यहाँ हवा कम लगती है।"
रिया बैठ गई। दिल अभी भी ज़ोर से धड़क रहा था। "मैं रिया। सत्ताईस साल। आप भी शिमला?"
"आर्यन। इकतीस।" वो हल्का मुस्कुराया। "शिमला ही जा रहा हूँ। पंद्रह साल से।"
रिया हँस पड़ी। "मज़ाक अच्छा है।"
"काश मज़ाक होता।" उसने अख़बार मोड़कर रख दिया। रिया की नज़र तारीख़ पर पड़ी — 5 अक्टूबर, 2011।
"ये अख़बार तो—" उसने रुककर कहा, "पंद्रह साल पुराना है।"
"इस ट्रेन में सब कुछ पंद्रह साल पुराना है," आर्यन ने धीरे से कहा। "खिड़की से बाहर देखिए। तीसरे टनल के बाद।"
ट्रेन पहाड़ों में चढ़ रही थी, डिब्बा हल्के से हिल रहा था। खिड़की के बाहर धुंध, चीड़ के काले साये, और बीच-बीच में छोटे स्टेशन। रिया ने गिना — पहला स्टेशन गुज़रा। बोर्ड पर पीली बत्ती में लिखा था: "कालका"।
पर वो तो कालका से ही चली थी!
"ये..." उसकी साँस अटक गई।
"दूसरी बार," आर्यन ने कहा, बिना खिड़की की ओर देखे। "अभी तीसरी बार आएगा।"
और सच में — कुछ मिनट बाद वही बोर्ड, वही पीली बत्ती, वही "कालका"। रिया के रोंगटे खड़े हो गए। उसने आर्यन की ओर देखा — वो अब खिड़की से बाहर देख रहा था, और उसकी आँखों में वो थकान नहीं थी, एक गहरा, पुराना दर्द था।
"5 अक्टूबर 2011 की रात," उसने कहा, "मैं इस ट्रेन में चढ़ा था। शिमला पहुँचकर अनन्या को रोकने के लिए। वो सुबह कनाडा की फ़्लाइट पकड़ने वाली थी। मैं उससे सिर्फ़ इतना कहना चाहता था — रुक जाओ।"
"और?" रिया की आवाज़ धीमी हो गई।
"टनल नंबर तीन में ट्रेन खराब हो गई। चार घंटे।" उसने अपनी हथेली देखी, जैसे वहाँ वो रात लिखी हो। "जब शिमला पहुँचा, फ़्लाइट जा चुकी थी। उसी रात वापसी की ट्रेन पकड़ी। और तब से..." उसने रिया की ओर देखा, "हर रात यही ट्रेन। यही 2:47। यही धुंध। ये ट्रेन उस रात को दोहराती है, रिया। और मेरे लिए शिमला कभी नहीं आता।"
रिया ने उसके हाथ की ओर देखा — उँगलियों में एक पुराना टिकट मुड़ा हुआ था: "कालका–शिमला, 5 अक्टूबर 2011"। स्याही फीकी पड़ चुकी थी, पर तारीख़ साफ़ थी।
"तो आप... पंद्रह साल से इसी ट्रेन में हैं?"
"इस रात में," उसने सुधारा। "और आप पहली ज़िंदा सवारी हैं जो इतने सालों में इस डिब्बे में चढ़ी है।"
तभी ट्रेन एक झटके से हिली — या लगा कि हिली। बाहर घना अँधेरा छा गया, फिर टनल की गहरी गूँज। डिब्बे की बत्तियाँ फड़फड़ाईं। रिया लड़खड़ाई — और आर्यन ने उसकी कमर थाम ली।
वो दोनों एक-दूसरे के बहुत क़रीब थे। इतने क़रीब कि उसकी साँसों की गर्मी रिया के चेहरे पर महसूस हो रही थी। डिब्बा हिल रहा था, बाहर टनल का अँधेरा था, और उस अँधेरे में सिर्फ़ दो धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
"डर लग रहा है?" उसने फुसफुसाकर पूछा।
"आपके साथ नहीं," रिया ने कहा — और खुद हैरान रह गई अपनी आवाज़ की सच्चाई पर।
उसने धीरे से रिया का चेहरा अपनी ओर किया — इजाज़त आँखों में माँगी, जल्दबाज़ी कहीं नहीं थी। उसके होंठ रिया के होंठों से एक साँस की दूरी पर ठहर गए — कोयले, धुंध और पंद्रह साल के इंतज़ार की खुशबू लिए। रिया ने आँखें बंद कर लीं।
ट्रेन टनल में और गहरे उतर गई — और कहानी ने वहीं पर्दा गिरा दिया।
जब रिया की आँख खुली, खिड़की से सुबह की सुनहरी रौशनी आ रही थी। ट्रेन धीमी हो रही थी — ब्रेक की लंबी चीख़, जो आर्यन के मुताबिक़ पंद्रह साल में कभी सुनाई नहीं दी थी।
"ये आवाज़..." आर्यन खिड़की से चिपक गया। उसकी आँखों में अविश्वास था।
बाहर — शिमला। असली शिमला। सुबह की धूप में नहाया प्लेटफ़ॉर्म, 2026 की भीड़, चाय वालों की आवाज़ें, पहाड़ों पर उतरती धूप।
"रुक रही है," वो फुसफुसाया, "ये रुक रही है... पंद्रह साल में पहली बार..."
ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर ठहरी। दरवाज़ा खुला — ठंडी, ताज़ा, असली हवा अंदर आई। आर्यन ने रिया का हाथ थामा — इस बार छोड़ने के लिए नहीं, साथ ले जाने के लिए। दोनों प्लेटफ़ॉर्म पर उतरे।
पीछे ट्रेन धीरे-धीरे सुबह की धुंध में घुल गई — बिना सीटी, बिना शोर, जैसे कभी थी ही नहीं।
एक स्टेशन मास्टर पास से गुज़रा। रिया ने हिम्मत करके पूछा, "वो 2:47 वाली शिमला पैसेंजर...?"
मास्टर ने अजीब नज़रों से देखा। "मैडम, रात की पैसेंजर तो 2011 में ही बंद हो गई थी।"
रिया ने मुट्ठी खोली — उसमें आर्यन के कोट का पीतल का बटन था, जो रात डिब्बे के झटके में टूटकर उसके हाथ में आ गया था। ठंडा, भारी, बिल्कुल असली।
और उसके बगल में आर्यन खड़ा था — सुबह की धूप में आँखें मिचमिचाता, जैसे लंबी नींद से जागा हो। ज़िंदा। असली। उसका हाथ अब भी रिया के हाथ में था।
"अब?" उसने पूछा।
रिया मुस्कुराई — वो मुस्कान जो सिर्फ़ सुबह की धूप में खिलती है। "अब शिमला घूमेंगे। पंद्रह साल का हिसाब बाकी है।"
कुछ ट्रेनें मंज़िल तक नहीं, किसी के इंतज़ार तक जाती हैं — और उस सुबह, पंद्रह साल का इंतज़ार ख़त्म हुआ।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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