दीयू के उस पुराने लाइटहाउस को बने सौ से ज़्यादा साल हो चुके थे। काली चट्टानों पर खड़ा सफ़ेद मीनार, जिसके ऊपर की लालटेन हर रात घूम-घूमकर समुद्र को रोशनी देती थी — जैसे कोई बूढ़ा रखवाला, जो सोता कभी नहीं।
उस शाम आसमान में बादल ऐसे घिरे थे, जैसे समंदर ने आसमान को निगलने का इरादा कर लिया हो। मौसम विभाग ने चक्रवात की चेतावनी जारी की थी — रात भर तेज़ हवाएँ, ऊँची लहरें, मछुआरों को समुद्र से दूर रहने की हिदायत।
तीस साल की अनन्या अपने टेंट के बाहर खड़ी समुद्र को देख रही थी। वो समुद्री जीवविज्ञानी थी — ओलिव रिडले कछुओं पर शोध के लिए पिछले दो हफ़्तों से दीयू के इस सुनसान तट पर डेरा डाले थी। उसके नोटबुक में कछुओं के घोंसलों के निशान, पानी के तापमान के आँकड़े, और एक अकेली रात की ख़ामोशी दर्ज थी।
"मैडम!" पीछे से आवाज़ आई। एक आदमी साइकिल से उतर रहा था — छत्तीस के आसपास, कंधे चौड़े, चेहरे पर नमक और धूप की पुरानी कहानियाँ। "मैं वीर हूँ — लाइटहाउस का कीपर। तूफ़ान की चेतावनी है। आपका टेंट यहाँ सुरक्षित नहीं रहेगा।"
अनन्या ने आसमान की ओर देखा। बादल और गहरे हो रहे थे। "मेरा सारा सामान — नोटबुक, कैमरे..."
"सब लाइटहाउस में ले आइए," वीर ने कहा। "वहाँ दीवारें तीन फ़ीट मोटी हैं। सौ साल से तूफ़ान देख रही हैं — आज भी देख लेंगी।"
आधे घंटे में अनन्या का सामान लाइटहाउस के नीचे वाले कमरे में था। पत्थर की सीढ़ियाँ ऊपर लालटेन कक्ष तक जाती थीं, जहाँ एक विशाल लैंप धीरे-धीरे घूम रहा था — उसकी रोशनी हर कुछ सेकंड में खिड़कियों से बाहर निकलकर अँधेरे समुद्र पर एक चमकती लकीर खींचती।
"चाय पिएँगी?" वीर ने एक पुरानी केतली चूल्हे पर रखी। "तूफ़ानी रातों में यहाँ चाय ही सबसे अच्छी कंपनी होती है।"
अनन्या हँस पड़ी। "आप यहाँ अकेले रहते हैं?"
"बारह साल से," वीर ने कहा। "पहले तटरक्षक में था। एक रात गश्त के दौरान हमारी नाव पलट गई — मेरा सबसे अच्छा दोस्त, समीर, उसी रात समुद्र में खो गया।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "उसके बाद लगा — अब समुद्र से लड़ूँगा नहीं, उसकी रखवाली करूँगा। ये लाइटहाउस उसी का दूसरा नाम है।"
अनन्या चुप रही। कुछ कहानियों के बीच ख़ामोशी ही सबसे सच्चा जवाब होती है।
"और आप?" वीर ने पूछा। "कछुओं के पीछे-पीछे यहाँ तक?"
"कछुए हर साल हज़ारों मील तैरकर अपने उसी तट पर लौटते हैं, जहाँ वो पैदा हुए थे," अनन्या ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा। "वैज्ञानिक कहते हैं — ये उनकी याददाश्त है। मुझे लगता है, ये उनका घर से प्यार है। मैं बस ये समझना चाहती हूँ — घर लौटने की ये चाहत।"
वीर ने उसकी ओर देखा — लंबी, ईमानदार नज़र। "शायद हम सब कछुओं जैसे ही हैं। बस हमारे समुद्र अलग-अलग हैं।"
बाहर हवा तेज़ हो चली थी। लहरें चट्टानों से टकराकर फूट रही थीं, और लालटेन की रोशनी अँधेरे में एक उम्मीद की तरह घूम रही थी।
रात के ग्यारह बजे रेडियो पर खड़खड़ाहट हुई। वीर ने तुरंत रिसीवर उठाया — एक मछुआरे की घबराई हुई आवाज़: "लाइटहाउस... लाइटहाउस... ये 'सागर रानी' बोल रही है! इंजन बंद हो गया है... लहरें बहुत ऊँची हैं... हमारी पोज़िशन..."
वीर का चेहरा गंभीर हो गया। उसने तुरंत नक्शा फैलाया, कम्पास उठाया। "सागर रानी, ये लाइटहाउस। घबराइए मत। मेरी रोशनी देख रहे हैं? उसी की ओर आइए — धीरे-धीरे, लहरों के साथ, उनके ख़िलाफ़ नहीं!"
अनन्या ने भी हेडफ़ोन का एक हिस्सा कान से लगाया। "मैं समुद्री धाराओं का नक्शा जानती हूँ," उसने फुसफुसाकर कहा। "इस तट के पास एक छिपी हुई चट्टान है — नाव को उससे बचाना होगा।"
वीर ने सिर हिलाया और रेडियो पर चिल्लाया, "सागर रानी! रोशनी के ठीक दाईं ओर रहिए — बाईं ओर चट्टानें हैं! दाईं ओर... हाँ, ऐसे ही!"
अगले चालीस मिनट दोनों लालटेन कक्ष में खड़े रहे — वीर रेडियो पर दिशा देता रहा, अनन्या दूरबीन से नाव की लालटेन खोजती रही। तूफ़ान की आवाज़, रेडियो की खड़खड़ाहट, और बीच-बीच में वीर की शांत आवाज़ — "घबराइए मत... आप बिल्कुल सही आ रहे हैं..."
और फिर — दूरबीन में एक छोटी-सी रोशनी दिखी। नाव की लालटेन। धीरे-धीरे, लहरों से लड़ती हुई, वो रोशनी किनारे की ओर बढ़ रही थी।
रात के एक बजे 'सागर रानी' सुरक्षित खाड़ी में लंगर डाल चुकी थी। रेडियो पर मछुआरे की भर्राई हुई आवाज़ आई — "धन्यवाद, लाइटहाउस... आपने हमारी जान बचाई।"
वीर ने रिसीवर रखा और गहरी साँस ली। उसकी आँखों में कुछ चमक रहा था — शायद बारिश की बूँदें, शायद कुछ और।
अनन्या ने धीरे से कहा, "समीर को आज आप पर गर्व होता।"
वीर ने उसकी ओर देखा। उस पल दोनों के बीच कुछ ऐसा बीता, जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं थी — दो अजनबी, जो एक ही रात में एक-दूसरे के सबसे गहरे हिस्से को छू चुके थे।
"चाय ठंडी हो गई होगी," वीर ने मुस्कुराकर कहा, और दोबारा केतली चढ़ा दी।
वो रात दोनों ने लालटेन कक्ष में बिताई — चाय की चुस्कियों के बीच बातें। अनन्या ने बताया — कैसे उसने शहर की आरामदाकर नौकरी छोड़ी थी, क्योंकि प्रयोगशाला की दीवारों में उसे समुद्र की ख़ुशबू नहीं मिलती थी। वीर ने बताया — कैसे हर पूर्णिमा को वो लालटेन की रोशनी को थोड़ा और तेज़ कर देता है, "ताकि समीर तक भी पहुँचे।"
"आपने कभी सोचा," अनन्या ने कहा, "कि आप ये लाइटहाउस छोड़कर शहर चले जाएँ?"
"सोचा था," वीर ने कहा। "फिर एक रात एक बच्चा आया — गाँव का। बोला, 'चाचा, जब आपकी रोशनी घूमती है, तो मुझे लगता है कोई हमें देख रहा है।' उस दिन समझा — ये रोशनी सिर्फ़ नावों के लिए नहीं, डर के लिए भी है। डर को रोशनी चाहिए होती है।"
भोर के चार बजे तूफ़ान थमने लगा। खिड़की से पहली हल्की रोशनी अंदर आई — समुद्र अब भी उफ़ान पर था, मगर आसमान में एक सुनहरी लकीर खिंच गई थी।
अनन्या ने अपना नोटबुक खोला और कुछ लिखा। फिर वो पन्ना फाड़कर वीर को दिया। उस पर लिखा था — "अगली पूर्णिमा को मैं फिर आऊँगी। इस बार कछुओं के घोंसले देखने — और चाय पीने।"
वीर ने पन्ना संभालकर अपनी जेब में रखा। "लालटेन उस रात थोड़ी और तेज़ होगी," उसने कहा। "ताकि आपको रास्ता दिखे।"
अनन्या टेंट की ओर लौट गई — उसका सामान सुरक्षित था, नोटबुक में एक नई रात दर्ज थी। जाते-जाते उसने पलटकर लाइटहाउस को देखा — सफ़ेद मीनार, सुबह की धूप में चमकता हुआ, और उसके ऊपर वीर, हाथ हिलाता हुआ।
कुछ मुलाक़ातें तूफ़ानों में होती हैं। वो शोर में शुरू होकर ख़ामोशी में पूरी होती हैं — और दिल में एक रोशनी छोड़ जाती हैं, जो हर रात घूम-घूमकर रास्ता दिखाती है।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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