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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

दो बजकर दो मिनट वाली कॉल

बारिश में पुराना फ़ोन बूथ
रात के दो बजकर दो मिनट पर बजने वाला वो फ़ोन — जिस बूथ से कॉल आती थी, उसे तोड़े हुए बीस साल हो चुके थे।

फ़ोन बजा था रात के दो बजकर दो मिनट पर।

अर्जुन की उँगलियाँ कंसोल के फ़ेडर पर ठहरी हुई थीं। रेडियो स्टेशन "धड़कन 107.4" का नाइट शो "रात के राही" — आधी रात से सुबह चार बजे तक का शिफ़्ट। वो शिफ़्ट, जिसमें शहर सोता है और कुछ जागती आँखें किसी आवाज़ का इंतज़ार करती हैं। उसने हेडफ़ोन एक कान से सरकाया और लाइन दो उठाई।

"हैलो, धड़कन 107.4 — रात के राही में आपका स्वागत है।"

लाइन पर पहले बारिश की आवाज़ आई — टप-टप, जैसे टिन की छत पर बूँदें नाच रही हों। फिर एक औरत की आवाज़। नरम। थोड़ी थकी हुई। मगर इतनी गहरी कि हेडफ़ोन के अंदर ठहर गई।

"तुम्हारी आवाज़ में बारिश की खुशबू आती है, अर्जुन।"

अर्जुन की साँस एक पल को अटक गई। उसने अपना नाम ऑन-एयर बताया ही नहीं था।

"जी... कौन बोल रही हैं आप?"

हल्की सी हँसी — जैसे दूर कहीं घंटी बजी हो। "मेहर। और तुम बिना चीनी की चाय पीते हो, है ना? तुम्हारे कंसोल पर जो नीला मग है — किनारे से चटका हुआ, उसी में।"

अर्जुन ने मग की तरफ़ देखा। नीला मग। चटका हुआ किनारा। बिना चीनी की चाय — अभी दो घूँट पहले पी थी।

"आप... आप स्टूडियो में आई हैं कभी?"

"नहीं।" बारिश की आवाज़ थोड़ी तेज़ हुई। "मैं बस सुनती हूँ। हर रात। दो बजे।"

"कहाँ से बोल रही हैं?"

"एक बूथ से। हॉस्टल के बाहर वाला पुराना फ़ोन बूथ। वार्ड में मोबाइल की इजाज़त नहीं — रात की ड्यूटी वाली नर्स हूँ, सेंट जूड हॉस्पिटल।"

अर्जुन मुस्कुराया। "तो ये रही हमारी आज की कॉलर — नर्स मेहर। शहर की नींद की पहरेदार।"

"पहरेदार तो तुम हो, अर्जुन। मैं तो बस... सुनने वाली।"

उस रात वो बारह मिनट बात करते रहे। मेहर ने बताया — वार्ड नंबर चार में एक बूढ़ा मरीज़ है, जो हर रात अपनी पत्नी का नाम पूछता है, और हर सुबह भूल जाता है। "मैं उसे हर रात वही नाम बताती हूँ। शायद किसी की याद को ज़िंदा रखना भी इलाज होता है।"

अर्जुन ने उस रात शो बंद करते हुए कहा, "ये गाना वार्ड नंबर चार के उस नाम के लिए — जो हर रात दोहराया जाता है।"

रात का रेडियो स्टूडियो
"रात के राही" — वो शो, जिसकी हर रात दो बजकर दो मिनट पर एक ही कॉल आती थी।

दूसरी रात। दो बजकर दो मिनट। फ़ोन फिर बजा।

"आज बारिश ज़्यादा है," मेहर ने कहा। "बूथ की छत से टपक रहा है। ऊपर का शीशा टूटा है — उसी से बारिश झाँकती है।"

"तो भीग जाओगी।"

"भीगना भी तो एक तरह का साथ है, अर्जुन।" उसकी आवाज़ में वो नरमी थी, जो अर्जुन के सीने में उतरकर ठहर जाती। "तुम्हें पता है, मैं तुम्हारा शो क्यों सुनती हूँ? क्योंकि तुम्हारी आवाज़ में कोई जल्दी नहीं है। इस शहर में सब भाग रहे हैं। तुम... ठहरे हुए हो।"

अर्जुन का दिल धड़का — माइक ऑन था, और वो भूल गया था कि हज़ारों कान सुन रहे हैं।

तीसरी रात। चौथी रात। पाँचवीं।

मेहर रोज़ दो बजकर दो मिनट पर कॉल करती — वार्ड की बातें, बारिश की बातें, वो पुराना गाना जो उसकी अम्मी गुनगुनाती थीं। एक रात उसने कहा, "आज वार्ड नंबर चार वाले बुज़ुर्ग ने मेरा हाथ पकड़ लिया — जैसे कह रहे हों, 'बेटी, तुम नहीं भूलती, बस यही काफ़ी है।'"

एक रात इंजीनियर ने कहा, "अर्जुन भाई, लाइन दो पर कोई इनकमिंग नंबर ही नहीं दिखता।" अर्जुन हँस दिया — "प्राइवेट नंबर होगा।" मगर उस रात वो देर तक सोचता रहा।

छठी रात मेहर ने कहा, "कल आख़िरी कॉल होगी।"

अर्जुन के हाथ से पेन छूट गया। "क्या?"

"मेरा ट्रांसफ़र हो गया है। दूसरे शहर। कल रात की ड्यूटी आख़िरी है।" बारिश की आवाज़ के बीच उसकी साँसें सुनाई दीं। "अर्जुन... इन छह रातों में तुम मेरी सबसे ख़ूबसूरत आदत बन गए हो।"

"मेहर, रुको — हम मिल सकते हैं। बताओ कहाँ है ये बूथ, मैं..."

"नहीं।" उसकी आवाज़ में पहली बार डर था। "वादा करो — तुम वहाँ नहीं आओगे।"

"क्यों?"

"बस... वादा करो।"

माइक के सामने, हज़ारों सुनने वालों के बीच, अर्जुन ने कहा, "वादा।"

बारिश की खिड़की के पास नर्स
"कल आख़िरी कॉल होगी" — और उसके बाद वो वादा, जो टूटने के लिए ही किया गया था।

सातवीं रात — आख़िरी रात।

अर्जुन स्टूडियो नहीं गया।

वो जानता था उसने वादा तोड़ा है। मगर कुछ वादे टूटने के लिए ही होते हैं — और मेहर ने एक रात बूथ का पता बता दिया था: "हॉस्टल के बाहर, पुराने बरगद के नीचे, जहाँ सड़क मुड़ती है।"

उसने गाड़ी उसी मोड़ पर रोकी। बरगद था। सड़क थी। मगर बूथ नहीं था।

वहाँ सिर्फ़ एक ख़ाली प्लॉट था — टूटी दीवार, एक पुराना होर्डिंग, मलबा। उसने चाय की दुकान पर बैठे चौकीदार से पूछा।

"यहाँ कभी फ़ोन का बूथ था क्या? बरगद के नीचे?"

बूढ़ा चौकीदार हँसा। "था, साहब। लाल वाला बूथ था। मगर वो तो... दो हज़ार छह में टूट गया। बीस साल हो गए।"

अर्जुन के हाथ की टॉर्च काँप गई।

"बीस... साल?"

"हाँ साहब। उसी साल हॉस्टल भी बंद हुआ था। सेंट जूड वाला।"

अर्जुन गाड़ी में बैठा रहा — देर तक। "वार्ड में मोबाइल की इजाज़त नहीं" — बीस साल पहले शायद सच में नहीं थी। एक बजकर पचपन पर उसने इंजन बंद किया और प्लॉट के बीचों-बीच जाकर खड़ा हो गया, जहाँ बरगद की छाँह सबसे गहरी थी।

दो बजकर एक मिनट।

दो बजकर दो मिनट।

हवा थम गई।

बारिश की बूँदें हवा में ठहर गईं — जैसे किसी ने वक़्त का फ़ेडर नीचे कर दिया हो। और फिर, धुंध के बीच, वो दिखा — लाल, जंग लगा बूथ। ऊपर का शीशा टूटा हुआ, अंदर पीली रोशनी। और अंदर... मेहर।

भीगे बाल, रिसीवर कानों से लगाए। उसने अर्जुन को देखा — आँखों में वो सारी रातें उतर आईं। उसने धीरे से बूथ का दरवाज़ा खोला।

"तुमने वादा तोड़ा," उसने कहा — मगर उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं, राहत थी।

"तुमने झूठ बोला," अर्जुन ने कहा, एक क़दम आगे बढ़कर। "तुम बीस साल दूर हो।"

"और तुम..." मेहर ने अपना हाथ बढ़ाया — हवा में, उस जगह जहाँ दो वक़्त मिल रहे थे। "तुम बिल्कुल वैसे हो, जैसी तुम्हारी आवाज़।"

अर्जुन ने अपना हाथ बढ़ाया। उनकी उँगलियाँ मिलीं — एक धड़कन के लिए। गर्म। असली। बारिश की बूँदें उनके चारों तरफ़ ठहरी हुई थीं, जैसे वक़्त साँस रोककर देख रहा हो।

मेहर ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया — आँसू या बारिश, अब फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उसके होंठ उसके माथे से छू गए, और छह रातों का सारा इंतज़ार एक धड़कन में सिमट आया।

और फिर बारिश ने सब कुछ धो दिया।

अर्जुन ने आँखें खोलीं तो ख़ाली प्लॉट में अकेला था — भीगा हुआ, बूथ ग़ायब। जेब में फ़ोन वाइब्रेट कर रहा था।

एक मिस्ड कॉल। रात के दो बजकर तीन मिनट पर।

नंबर — कोई नंबर नहीं।

उस रात के बाद अर्जुन ने "रात के राही" कभी नहीं छोड़ा। हर रात, दो बजकर दो मिनट पर, उसका फ़ोन एक बार वाइब्रेट करता है। कोई नंबर नहीं। कोई आवाज़ नहीं।

मगर अर्जुन मुस्कुराता है, माइक ऑन करता है, और कहता है —

"ये गाना उस कॉल के नाम... जो वक़्त के उस पार से आई थी।"

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