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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

गुड़िया

"इशान ने वो चेहरा पहली बार सपने में देखा था — और सात साल तक हर गुड़िया में वही चेहरा तराशता रहा।"

"उस सुबह वो चेहरा उसकी दुकान के दरवाज़े पर खड़ा था — हाथ में स्केचबुक, कंधे पर झोला, और होठों पर वही मुस्कान जो उसने सिर्फ़ नींद में देखी थी।"

चन्नपटना की सुबह लकड़ी की खुशबू लेकर आती है — खराद की घरघराहट, लाख के रंगों की कटोरियाँ, और दरवाज़े से तिरछी आती धूप। इशान की दुनिया इन्हीं तीन चीज़ों से बनी थी। चौंतीस साल का वो, इस गली का सबसे धीमा कारीगर कहलाता था। धीमा इसलिए नहीं कि हाथ सुस्त थे — बल्कि इसलिए कि वो हर गुड़िया को ऐसे तराशता था जैसे वो किसी का इंतज़ार कर रही हो।

उस दिन दरवाज़े पर दस्तक हुई — हल्की, झिझकती हुई। "अंदर आ सकती हूँ?"

इशान ने ऊपर देखा — और उसका हाथ खराद पर ठिठक गया।

सपने वाला चेहरा। वही बड़ी आँखें, वही बाएँ गाल पर हल्का-सा तिल, वही होठों के कोने में अटकी मुस्कान। सात साल। सात साल से हर रात, हर गुड़िया में।

"मैं मायरा," उसने कहा, अंदर आते हुए। "उनतीस साल की — बच्चों की किताबों के लिए तस्वीरें बनाती हूँ, कोलकाता से।" उसने स्केचबुक उठाकर दिखाई। "खिलौना बनाने वालों पर एक किताब कर रही हूँ। एक हफ़्ता — बस आपकी दुकान में बैठकर देखना और बनाना चाहती हूँ। चलेगा?"

इशान ने कुछ कहा नहीं — वो अब भी उसके चेहरे को देख रहा था, जैसे कोई अपनी ही बनाई चीज़ को पहली बार साँस लेते देख रहा हो।

"चलेगा?" मायरा ने फिर पूछा, थोड़ा हँसकर। "या आप सपने देख रहे हैं?"

वो चौंका। "नहीं — नहीं, चलेगा। बैठिए।"

मायरा कोने में रखे स्टूल पर बैठ गई और स्केचबुक खोल ली। इशान ने खराद फिर से चलाई, पर उसकी नज़र बार-बार दरवाज़े की ओर जाती — जहाँ सुबह की धूप में वो खड़ी थी, बिल्कुल वैसी ही जैसी कल रात सपने में थी।

कल रात का सपना अलग था — सात साल में पहली बार उस चेहरे ने मुँह खोला था।

"कल आ रही हूँ," उसने कहा था।

इशान ने उस रात आधी नींद में उठकर एक नई गुड़िया का चेहरा तराशा था — सबसे साफ़, सबसे ज़िंदा। वो अब भी मेज़ पर रखी थी, आधी रंगी हुई।

दोपहर तक मायरा ने दुकान के हर कोने को स्केच कर लिया था। फिर उसकी नज़र ताक पर रखी गुड़ियों पर पड़ी।

वो उठी, पास गई, और एक-एक चेहरा देखती चली गई।

"ये सब..." उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "ये सब एक जैसी क्यों हैं?"

इशान के हाथ रुक गए। "क्योंकि ये सब एक ही सपने की हैं।"

"मतलब?"

"सात साल पहले एक चेहरा सपने में आना शुरू हुआ। हर रात वही चेहरा, और हर सुबह मेरे हाथ खुद-ब-खुद उसे लकड़ी में उतारने लगते।" उसने ताक की ओर देखा। "ये सारी गुड़ियाँ उसी की हैं।"

मायरा ख़ामोश खड़ी रही। फिर धीरे से उसने अपनी स्केचबुक का एक पन्ना पलटा, और किताब इशान की ओर बढ़ा दी।

पन्ने पर एक जोड़ी हाथ बने थे — मज़बूत, लंबी उँगलियों वाले, अँगूठे पर एक पतला-सा सफ़ेद निशान, पोरों पर रंग के धब्बे।

"ये हाथ," मायरा ने कहा, "मैं पाँच साल से बना रही हूँ — हर किताब के हाशिए में। मुझे नहीं पता था ये किसके हैं।"

इशान ने अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाया। अँगूठे पर वही पतला सफ़ेद निशान — बरसों पुरानी छेनी की फिसलन का। पोरों पर लाख के रंग — जो कभी पूरी तरह नहीं छूटते।

दुकान में सिर्फ़ खराद की घरघराहट रह गई।

"तुम्हें..." इशान की आवाज़ काँप रही थी। "तुम्हें मेरे हाथ सपने में दिखते थे?"

"नहीं," मायरा ने कहा। "सपने में नहीं। जागती आँखों से — जब भी मैं पेंसिल उठाती, यही हाथ बन जाते। जैसे मेरी उँगलियाँ किसी और की याद से चल रही हों।"

उस शाम इशान ने उसे सबसे पुरानी गुड़िया दिखाई — सात साल पुरानी, रंग उड़ चुका था। पर चेहरा अब भी साफ़ था।

"देखो," उसने गुड़िया को घुमाया। उसके बाएँ गाल पर लाख का एक छोटा-सा काला निशान था — बिल्कुल वहीं, जहाँ मायरा के गाल पर तिल था।

"ये तिल..." मायरा ने अपने गाल को छुआ। "तुमने सपने में तिल भी देखा था?"

"नहीं," इशान ने धीरे से कहा। "सपने में सिर्फ़ चेहरा था। तिल मैंने खुद लगाया था — जाने क्यों, हाथ ने खुद ही बना दिया था। जैसे लकड़ी खुद जानती हो कि क्या छूट रहा है।"

मायरा ने वो गुड़िया हाथ में ली और देर तक देखती रही। फिर उसने उसे अपने गाल से सटा लिया।

"तो तुम सात साल से मुझे तराश रहे थे," उसने फुसफुसाकर कहा, "और मैं पाँच साल से तुम्हारे हाथ बना रही थी। हम दोनों को एक-दूसरे की आधी-आधी याद थी।"

अगले दिन इशान ने उसे छेनी पकड़ना सिखाया — उसका हाथ उसके हाथ पर, उँगलियाँ उँगलियों में उलझीं। "धीरे," उसने उसके कान के पास कहा। "लकड़ी को धक्का नहीं देते — उसे मनाते हैं।"

छेनी लकड़ी पर फिसली, और एक घुमावदार छीलन नीचे गिरी। मायरा हँस पड़ी।

"तुम्हारे हाथ गरम हैं," उसने कहा, बिना पलटे।

"लाख की भट्टी के पास बैठता हूँ," इशान ने कहा, पर उसका हाथ उसके हाथ पर ही रहा।

उस रात मायरा देर तक उसके हाथों का स्केच बनाती रही — लैंप की पीली रोशनी में। इशान सामने बैठा उसे देख रहा था।

"तुम्हें पता है," उसने कहा, "सात साल में मैंने कभी नहीं सोचा था कि ये चेहरा बोल भी सकता है।"

"और मैंने कभी नहीं सोचा था," मायरा ने पेंसिल रोके बिना कहा, "कि ये हाथ मुझे छू भी सकते हैं।"

इशान उठा, उसके पास आया, और उसके गाल पर लगा लाख का एक धब्बा अपने अँगूठे से पोंछ दिया — बिल्कुल तिल के पास से। उसका अँगूठा वहाँ एक पल के लिए ठहर गया।

मायरा ने स्केचबुक नीचे रख दी।

लैंप की रोशनी में लकड़ी का बुरादा हवा में तैर रहा था — सुनहरा, धीमा। इशान ने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया — वही चेहरा जिसे उसने सैकड़ों बार लकड़ी में तराशा था, और पहली बार छू रहा था।

और फिर खराद की घरघराहट भी थम गई — या शायद उन्हें सुनाई देना बंद हो गई।

सुबह दोनों पुराने कैफ़े में फ़िल्टर कॉफ़ी पी रहे थे। मायरा की स्केचबुक मेज़ पर खुली थी — आख़िरी पन्ने पर दो हाथ, एक-दूसरे में उलझे। नीचे लिखा था — "पहली बार, जागती आँखों से।"

"किताब का नाम क्या रखोगी?" इशान ने पूछा।

"सोचा था — 'चन्नपटना के खिलौने'," मायरा ने कहा। "पर अब नाम बदलना पड़ेगा।"

"क्या?"

"'जो सपने में मिले थे।'"

इशान हँस पड़ा — वो खुली हँसी जो सात साल से उसके अंदर कहीं दबी थी।

छह महीने बाद मायरा की किताब छपी। आख़िरी पन्ने पर दो गुड़ियाएँ थीं — एक उसका चेहरा, एक इशान का — हाथ में हाथ डाले। नीचे लिखा था — "इशान के लिए, जिसने मुझे सपने से निकालकर धूप में रख दिया।"

और इशान की दुकान की सबसे ऊँची ताक पर अब एक जोड़ी रखी थी — पहली जोड़ी, जो सपने में नहीं, जागती आँखों से बनी थी।

कोई पूछता तो वो मुस्कुराकर कहता — "सात साल तक एक चेहरा तराशा जो मेरे पास नहीं था। अब दो चेहरे तराशता हूँ — जो हर सुबह मेरे सामने कॉफ़ी पीते हैं।"

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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