(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...
गुफा की दीवार पर दस हज़ार साल पुरानी एक तस्वीर थी — और उसमें बनी औरत बिल्कुल रैना जैसी दिखती थी।
अट्ठाईस साल की रैना ने टॉर्च की रोशनी दीवार पर टिकाई और साँस रोक ली। भीमबेटका की इस अंदरूनी गुफा में वो पहली बार आई थी — दो साल से शैलचित्रों पर किताब लिख रही थी, पर इस दीवार के बारे में किसी किताब में एक लाइन तक नहीं थी।
"मैंने कहा था ना," पीछे से आवाज़ आई। इकतीस साल का अभिनव — तीसरी पीढ़ी का केयरटेकर, जिसकी आँखों में गुफाओं जैसी गहराई थी — टॉर्च लिए खड़ा था। "ये दीवार हर किसी को नहीं दिखती।"
"मैं हर कोई नहीं हूँ," रैना ने कहा, पर उसकी आवाज़ काँप गई। दीवार पर गेरू और कोयले से बना एक जोड़ा था — ऊपर एक गोल चाँद, नीचे हाथ में हाथ डाले दो आकृतियाँ। औरत का चेहरा — वही नाक, वही होंठ, और बाएँ गाल पर वही तिल जो आईने में रैना रोज़ देखती थी।
उसने काँपते हाथों से कैमरा उठाया। क्लिक।
प्रीव्यू में देखा — और उसके पैर लड़खड़ा गए।
स्क्रीन पर दीवार ख़ाली थी। सिर्फ़ पत्थर। कोई चाँद नहीं, कोई जोड़ा नहीं।
"एक बार और," उसने फुसफुसाया। क्लिक। फिर ख़ाली।
अभिनव ने टॉर्च नीचे की। "मैंने मना किया था कैमरा लाने को। ये दीवार लेंस को नहीं दिखती, रैना। सिर्फ़ आँखों को।"
"तुम्हारे दादाजी ने क्या देखा था — ठीक-ठीक बताओ।"
अभिनव ने टॉर्च बुझा दी। अँधेरे में सिर्फ़ उसकी आवाज़ रह गई। "उन्नीस सौ इक्यावन में दादाजी यहाँ के केयरटेकर बने। दीवार पर तब उनकी और दादी की तस्वीर थी — दादी तब बीस की थीं। दादाजी कहते थे, हर पूर्णिमा को चेहरे थोड़े-थोड़े बदलते थे। फिर एक बरसात में दादी गुज़र गईं — और अगली पूर्णिमा को दीवार पर सिर्फ़ दादाजी का चेहरा था। अकेला।"
रैना की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। "फिर?"
"फिर दादाजी हर पूर्णिमा को यहाँ आते रहे — अड़तीस साल। आख़िरी बार जब आए, तो दीवार पर कोई चेहरा नहीं था। बस ख़ाली चाँद।" अभिनव ने टॉर्च जलाई। "उसके एक हफ़्ते बाद वो भी चले गए।"
"ये... ये मुमकिन नहीं है। पेंटिंग हज़ारों साल पुरानी है। मेरा चेहरा —"
"तुम्हारा चेहरा नहीं," अभिनव ने धीरे से कहा। "अभी तुम्हारा है।"
रैना ने उसे घूरा। "मतलब?"
अभिनव दीवार के पास गया, टॉर्च की रोशनी सबसे आख़िरी तस्वीर पर डाली — एक जोड़ा, हाथ में हाथ डाले, एक बने हुए सूरज की तरफ़ चलता हुआ। "मेरे दादाजी ने इस दीवार पर अपनी और दादी की तस्वीर देखी थी। उन्हीं चेहरों के साथ। फिर एक दिन चेहरे बदल गए।"
"बदल गए?"
"दीवारें जिसे चुनती हैं," अभिनव की आवाज़ गुफा में गूँजी, "उसे बना लेती हैं।"
उस रात रैना गेस्टहाउस के कमरे में सो नहीं पाई। दीवार पर बना वो चेहरा — उसका चेहरा — आँखों के सामने घूमता रहा। आधी रात को दिल्ली से प्रकाशक का फ़ोन आया।
"रैना, पैनल-सात की फ़ोटो कब मिलेगी? बिना उसके चैप्टर अधूरा है।"
"वो फ़ोटो... नहीं हो पाएगी।"
"क्या मतलब? दो साल का काम है ये!"
रैना ने खिड़की से बाहर देखा — दूर पहाड़ियों पर गुफाओं के काले मुँह। "कुछ तस्वीरें कैमरे में नहीं आतीं, सर।"
फ़ोन कट गया। रैना ने स्केचबुक निकाली — फ़ोटो नहीं, तो हाथ से। दीवार को छुए बिना, सिर्फ़ आँखों से उतारूँगी, उसने ठान लिया।
और उसी पल दरवाज़े पर दस्तक हुई — अभिनव था, हाथ में लालटेन।
"वन विभाग परसों से अंदर वाली गुफा सील कर रहा है। मानसून सर्वे।" वो रुका। "तुम्हारे पास दो रातें हैं।"
"दो रातों में मैं क्या करूँगी? फ़ोटो तो —"
"फ़ोटो नहीं," अभिनव ने कहा। "देखना। बस देखना।"
अगली रात रैना अकेली गुफा में घुसी — लालटेन लिए, अभिनव की चेतावनी के बावजूद। अंदर की हवा अलग थी। ठंडी, और... चलती हुई। जैसे गुफा साँस ले रही हो।
लालटेन की रोशनी में दीवार जाग उठी। सैकड़ों आकृतियाँ — शिकार, नाच, जानवर। एक पल को लगा, शिकारियों की टोली हिली — रैना ने आँखें झपकाईं। रोशनी हिली थी, बस। या... नहीं?
वो सबसे अंदर गई — पैनल-सात तक।
वो जोड़ा। वो चाँद। और उसका चेहरा।
रैना ने लालटेन ऊँची की — और तब उसने आख़िरी तस्वीर को पहली बार ठीक से देखा। सूरज की तरफ़ चलता जोड़ा। आदमी का चेहरा —
उसके हाथ से लालटेन छूटते-छूटते बची।
वो चेहरा अभिनव का था।
"तुम्हें अकेले नहीं आना चाहिए था।"
वो चौंकी। अभिनव दरवाज़े पर खड़ा था — टॉर्च बुझी हुई, सिर्फ़ चाँदनी उसके पीछे। वो अंदर आया, उसके पास खड़ा हो गया। दोनों की परछाइयाँ दीवार पर उस जोड़े की परछाइयों से जा मिलीं।
"तुम जानते थे," रैना ने कहा। "तुमने पहले ही देख लिया था — मेरा चेहरा, तुम्हारा चेहरा।"
"तीन महीने पहले," अभिनव ने सच कहा। "जब चेहरे बदले। मैं डर गया था, रैना। दादाजी कहते थे — दीवार जिसे चुनती है, उसे छोड़ती नहीं।"
"और तुमने मुझे फिर भी अंदर आने दिया?"
"रोकता तो क्या होता?" वो मुस्कुराया — पहली बार, खुलकर। "दीवार ने चुन लिया था। मैं कौन होता हूँ रोकने वाला?"
लालटेन की लौ हिली। ऊपर दीवार पर बना चाँद जैसे सच में चमकने लगा। अभिनव का हाथ उठा — धीरे, जैसे पूछ रहा हो — और रैना के गाल को छूने से एक साँस पहले रुक गया।
रैना ने वो दूरी ख़त्म कर दी।
उसके होंठों पर गुफा की ठंडक थी, और फिर किसी की साँसों की गर्माहट। दीवार पर उनकी परछाइयाँ उस बने हुए जोड़े से मिल गईं — हाथ में हाथ, साँस में साँस।
बाक़ी रात गुफा की दीवारों ने अपने पास रख ली।
सुबह जब लालटेन की लौ बुझी, रैना ने दीवार की तरफ़ देखा। बने हुए चाँद के नीचे वो जोड़ा था — हाथ में हाथ डाले — और इस बार उनके चेहरों पर हल्की-सी मुस्कान थी। या शायद भोर की रोशनी का खेल था।
भोर को वो दोनों गुफा के मुँह पर खड़े थे। पूरब में सूरज उग रहा था — ठीक उसी जगह, जहाँ दीवार पर बना था। अभिनव ने रैना का हाथ थामा।
और वो दोनों, हाथ में हाथ डाले, सूरज की तरफ़ चल पड़े।
रैना ने उस दिन कैमरा बैग में ही रहने दिया। पैनल-सात की कोई फ़ोटो उसकी किताब में नहीं छपी।
आख़िरी पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन थी —
"ये तस्वीर दीवार पर ही अच्छी लगती है।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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