अक्टूबर की दोपहर थी, और हम्पी की धरती धूप में तपी हुई काँसे जैसी चमक रही थी। दूर-दूर तक बिखरे विशाल शिलाखंड ऐसे लगते थे, जैसे किसी दानव ने पत्थरों की बिसात बिछा दी हो।
उनतीस साल की देविका ने कैमरे का लेंस साफ़ किया और विट्ठल मंदिर के पत्थर-रथ की ओर देखा। बेंगलुरु से आई थी — विरासत-फ़ोटोग्राफ़र। विजयनगर साम्राज्य पर एक कॉफ़ी-टेबल किताब का काम हाथ में था, और प्रकाशक ने एक ही हिदायत दी थी: "खंडहरों को ऐसे दिखाओ, जैसे वो अभी भी साँस ले रहे हों।"
पत्थर-रथ के पहियों पर दोपहर की धूप पड़ रही थी। देविका ने कोण बदला, घुटनों के बल बैठी, शटर दबाया। क्लिक। फिर एक और कोण। क्लिक।
"इस रथ को दोपहर में नहीं, सुबह की पहली किरण में देखिए," पीछे से एक आवाज़ आई। "दोपहर की धूप पत्थर को थका देती है।"
देविका पलटी। तैंतीस के आसपास का एक आदमी खड़ा था — गेहुँआ रंग, आँखों में धूप की चमक, कंधे पर एक पुराना झोला।
"मैं विवान हूँ," उसने कहा। "गाइड। और आप शायद वो फ़ोटोग्राफ़र हैं, जिनके बारे में गाँव में चर्चा है।"
देविका हँस पड़ी। "चर्चा? मैं तो कल ही आई हूँ।"
"छोटा गाँव है," विवान ने कंधे उचकाए। "यहाँ ख़बरें हवा से तेज़ चलती हैं। वैसे — आपका नाम?"
"देविका।"
"तो देविका जी," विवान ने विट्ठल मंदिर के संगीत-स्तंभों की ओर इशारा किया, "अगर खंडहरों की साँसें सुननी हैं, तो मेरे साथ मातंग पहाड़ी चलिए। सूरज ढलने से ठीक पहले। वहीं से हम्पी अपना असली चेहरा दिखाता है।"
देविका ने घड़ी देखी — चार बज रहे थे। "ठीक है, गाइड साहब। आज़माकर देखती हूँ — आपकी सलाह कितनी काम की है।"
मातंग पहाड़ी की चढ़ाई खड़ी थी। बड़े-बड़े शिलाखंडों के बीच से पगडंडी साँप जैसी बलखाती ऊपर जाती थी। विवान आगे-आगे चल रहा था, और हर दो क़दम पर रुककर देविका का हाथ थाम लेता — "यहाँ पत्थर फिसलन भरा है।"
तीसरी बार जब उसने हाथ बढ़ाया, देविका ने मुस्कुराकर कहा, "मैं पहाड़ी लड़की नहीं हूँ, मगर इतनी नाज़ुक भी नहीं।"
"पता है," विवान ने हाथ नहीं छोड़ा। "मगर पहाड़ी को इससे क्या? वो तो सबसे मज़बूत को भी गिरा देती है।"
ऊपर पहुँचकर देविका की साँस थम गई। नीचे पूरी घाटी फैली थी — तुंगभद्रा नदी चाँदी की धारी जैसी बलखाती, हरे धान के खेत, और जगह-जगह खड़े मंदिरों के गोपुरम, जिन पर ढलते सूरज का सोना बरस रहा था।
"वाह..." उसके मुँह से बस यही निकला।
विवान ने झोले से पानी की बोतल निकाली। "मेरे दादा कहा करते थे — हम्पी को समझना हो तो पत्थर मत देखो, रौशनी देखो। पत्थर तो हज़ार साल से वही हैं; बदलती तो रौशनी है।"
देविका ने कैमरा उठाया। व्यूफ़ाइंडर में घाटी — और फिर अचानक फ्रेम के कोने में विवान का चेहरा आ गया, जो उसी घाटी को देख रहा था। उसने शटर दबा दिया।
क्लिक की आवाज़ पर विवान पलटा। "मेरी तस्वीर?"
"रौशनी अच्छी थी," देविका ने शरारत से कहा।
दोनों हँस पड़े, और उस हँसी में कुछ ऐसा था, जो दोपहर की औपचारिकता को बहा ले गया।
सूरज अब क्षितिज को छू रहा था। आसमान नारंगी से गुलाबी, गुलाबी से बैंगनी होता जा रहा था। हवा में ठंडक उतर आई थी।
"चलिए," विवान ने कहा, "अब नदी। डूबते सूरज को नाव से देखना — वो नज़ारा किताब में ज़रूर आना चाहिए।"
तुंगभद्रा के किनारे गोल-गोल टोकरा-नावें खड़ी थीं — कोराकल। विवान ने एक नाव वाले से कन्नड़ में कुछ कहा, और एक नाव पानी में उतार दी गई।
"मेरे दादा इन्हीं नावों के मल्लाह थे," विवान ने देविका को नाव में बैठने में मदद करते हुए कहा। "कहते थे — नदी गोल नाव में बैठकर ही समझ आती है। सीधी नाव में तो बस पार होते हो; गोल नाव में घूमते हो, नदी के साथ।"
नाव धीरे-धीरे बीच धारा में आई। सूरज आधा डूब चुका था; पानी पर सुनहरी लकीरें काँप रही थीं। किनारे पर किसी मंदिर से घंटियों की आवाज़ आ रही थी, और हवा में जुगनू चमकने लगे थे।
देविका ने कैमरा गोद में रख दिया। "आज पहली बार," उसने धीरे से कहा, "कैमरे के बिना देख रही हूँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि कुछ नज़ारे..." वो रुकी, विवान की ओर देखा। नाव की लालटेन की रौशनी में उसका चेहरा नरम लग रहा था। "कुछ नज़ारे सिर्फ़ आँखों के लिए होते हैं। लेंस के लिए नहीं।"
विवान ने कुछ नहीं कहा। बस नाव की डंडी पानी में डुबोई, और नाव एक धीमे चक्कर में घूम गई — जैसे वक़्त ने एक पल के लिए साँस रोक ली हो।
किनारे से दूर, पानी के बीच, दोनों के बीच की ख़ामोशी में कुछ पक रहा था — अनकहा, अनछुआ, मगर बिल्कुल साफ़।
"मेरे पिता भी फ़ोटोग्राफ़र थे। ये कैमरा उन्हीं का है," उसने अचानक कहा, जैसे ख़ामोशी तोड़ना ज़रूरी हो। "उनके जाने के बाद मैंने उनकी अधूरी किताब पूरी करने की ठानी। हम्पी उनका सपना था — कभी आ नहीं पाए।"
विवान ने लालटेन की बत्ती थोड़ी ऊँची की। "तो आप अपने पिता का सपना जी रही हैं।"
"शायद," देविका की आवाज़ भर्रा गई। "मगर आज लग रहा है — ये सपना मेरा भी हो गया है।"
विवान ने नाव किनारे लगाई। ऊपर विरुपापुर गड्डे के एक छत वाले कैफ़े में दोनों ने खाना खाया — तवे की रोटी, दाल, और छाछ। सामने तारों से भरा आसमान था, नीचे नदी की कलकल।
"कल सुबह?" विवान ने पूछा।
"हेमकूट पहाड़ी," देविका ने कहा। "सूर्योदय। और इस बार आप फ्रेम में होंगे — जानबूझकर।"
विवान हँसा। फिर गंभीर होकर बोला, "देविका... आज का दिन..."
"अधूरा मत छोड़िए," देविका ने उसकी बात काटी। "कुछ दिन पूरे कहने के लिए नहीं होते।"
कैफ़े से निकलकर विवान उसे गेस्टहाउस के फाटक तक छोड़ने आया। गली सुनसान थी; दूर किसी घर से रेडियो की धीमी आवाज़ आ रही थी। फाटक की बत्ती के नीचे दोनों रुके।
विवान ने धीरे से उसका हाथ थामा — वही हाथ, जो पहाड़ी पर उसने थामा था। इस बार देविका ने हाथ नहीं छुड़ाया। उसकी उँगलियाँ उसकी उँगलियों में उलझ गईं।
"कल सुबह," उसने फुसफुसाकर कहा, और उसके इतने क़रीब आ गया कि देविका को उसकी साँसों की गर्माहट महसूस हुई।
देविका ने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठों पर एक नरम, धीमा स्पर्श उतरा — जैसे शाम की आख़िरी किरण पानी को छूकर गुज़र जाए। वक़्त फिर थम गया — इस बार ज़्यादा देर के लिए।
फिर फाटक की बत्ती टिमटिमाई, गली में किसी के क़दमों की आहट हुई, और दोनों अलग हुए — हँसते हुए, शर्माते हुए, जैसे दो स्कूली बच्चे।
"गुड नाइट, गाइड साहब," देविका ने कहा, फाटक के अंदर क़दम रखते हुए।
"गुड नाइट, फ़ोटोग्राफ़र जी," विवान ने कहा। "और हाँ — कल की तस्वीरों में मैं अच्छा दिखूँ, ये आपकी ज़िम्मेदारी।"
देविका ने अपने कमरे की खिड़की से देखा — विवान गली के मोड़ तक पैदल गया, फिर एक बार पलटकर ऊपर देखा, हाथ हिलाया, और अँधेरे में घुल गया।
उसने कैमरा उठाया, आज की आख़िरी तस्वीर देखी — मातंग पहाड़ी से ली हुई घाटी, जिसके कोने में विवान का चेहरा था, डूबते सूरज की रौशनी में।
कुछ इश्क़ खंडहरों जैसे होते हैं — बाहर से पत्थर, अंदर से सदियों पुरानी धड़कन। देविका ने कैमरा सीने से लगाया और मुस्कुरा दी — कल सुबह हेमकूट पहाड़ी पर एक नई कहानी इंतज़ार कर रही थी।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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