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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

इत्र की वो शीशी

बारिश में पुरानी गली की इत्र की दुकान
बारिश की उस रात, पुरानी गली की ‘नूर-ए-खुशबू’ दुकान — जहाँ साठ साल से एक शीशी किसी का इंतज़ार कर रही थी।

रात के पौने ग्यारह बजे थे, और बारिश ने पुराने शहर की गली को शीशा बना दिया था।

आरव टैक्सी से उतरा ही था कि बादल गरजे और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। छतरी वो होटल के कमरे में भूल आया था। सामने की गली में बत्तियाँ बुझ चुकी थीं — बस एक दुकान की खिड़की से पीली रौशनी छनकर बाहर आ रही थी। वो दौड़कर उस दुकान की छत के नीचे घुस गया।

लकड़ी के तख़्ते पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था — "नूर-ए-खुशबू — इत्र फ़रोश, सन् 1947 से।"

दुकान का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर काँच की सैकड़ों शीशियाँ पीली रौशनी में झिलमिला रही थीं — नीली, हरी, सुनहरी — जैसे किसी ख़ज़ाने का कमरा हो। हवा में चंदन, गुलाब और किसी अनजान फूल की मिली-जुली खुशबू तैर रही थी।

"आइए... अंदर आ जाइए, भीग जाएँगे।"

आवाज़ सुनकर आरव ने देखा — काउंटर के पीछे एक लड़की खड़ी थी। सत्ताईस-अट्ठाईस की उम्र, गीली लटें माथे पर चिपकी हुईं, और आँखों में ऐसी गहराई जैसे पुरानी शीशियों में डूबा हुआ वक़्त।

"मैं मीरा," उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा। "ये दुकान मेरी दादी की थी। अब मैं चलाती हूँ।"

"आरव," उसने कहा, और अंदर आकर काउंटर के पास खड़ा हो गया। "बारिश रुकते ही निकल जाऊँगा। वैसे... इतनी रात को दुकान खुली है?"

"इत्र की दुकान का कोई वक़्त नहीं होता," मीरा ने कहा, और एक कपड़े से काउंटर पोंछने लगी। "खुशबू तो रात में और गहरी होती है।"

इत्र की दुकान में काउंटर पर बात करते आरव और मीरा

आरव की नज़र काउंटर के एक कोने पर ठहर गई — वहाँ सबसे अलग एक शीशी रखी थी। गहरे नीले काँच की, जिस पर चाँदी की नक़्क़ाशी बनी थी, और ढक्कन पर एक छोटा सा चाँद जड़ा था। बाक़ी शीशियों से अलग, उस पर हल्की सी धूल जमी थी — जैसे उसे बरसों से किसी ने छुआ न हो।

चाँदी की नक़्क़ाशी वाली नीले काँच की इत्र की शीशी

"वो वाली?" मीरा ने उसकी नज़र का पीछा किया। उसकी मुस्कान एक पल को फीकी पड़ी। "वो... वो बिकाऊ नहीं है।"

"क्यों?"

मीरा ने शीशी को उठाया और रौशनी की तरफ़ किया। नीले काँच के अंदर सुनहरा तरल ऐसे हिला जैसे उसमें कोई छोटा समंदर क़ैद हो। "दादी ने इसे अपने हाथों से बनाया था। कहती थीं — इसमें यादें बसी हैं। जो इसे लगाए, उसे अपनी सबसे खूबसूरत भूली हुई याद की खुशबू महसूस होती है।"

आरव हँस पड़ा। "यादों वाला इत्र? ये तो किसी फ़िल्मी कहानी जैसा लगता है।"

"मैंने भी कभी यक़ीन नहीं किया था," मीरा ने कहा, और उसकी आँखों में शरारत के साथ कुछ और भी था — एक चुनौती। "सूँघकर देख लीजिए।"

उसने ढक्कन खोला और शीशी आरव की तरफ़ बढ़ा दी।

आरव ने झुककर खुशबू ली —

और उसकी साँस रुक गई।

शीशी से उठी खुशबू में गुलमोहर के फूल थे। वो गुलमोहर, जो उसके बचपन के घर के आँगन में खड़ा था। और खुशबू के साथ एक तस्वीर उभरी — इतनी साफ़, जैसे कोई फ़िल्म चल रही हो। सात साल का वो, नंगे पाँव आँगन में दौड़ रहा है। उसके बराबर में एक लड़की है — बालों में गुलमोहर का फूल खोंसा हुआ, हँसते हुए उसके पीछे भाग रही है। आइसक्रीम वाले की घंटी। धूप में चमकती उसकी चोटी।

"सना..." आरव के मुँह से अनायास निकला। उसका हाथ काँप रहा था। "ये... ये खुशबू तो... मैं तो उसका चेहरा तक भूल चुका था। बीस साल हो गए। ये मुझे कैसे याद आ गया?"

मीरा की आँखें चौड़ी हो गईं। शीशी उसके हाथ से छूटते-छूटते बची। "आपने... आपने ये नाम कहाँ सुना?"

"मेरी बचपन की दोस्त थी सना। हम दोनों गुलमोहर के नीचे खेलते थे। फिर उसके पिता का तबादला हो गया, वो चली गई।" आरव ने मीरा को देखा। "आपको ये नाम कैसे पता?"

मीरा कुछ न बोली। वो काउंटर के नीचे झुकी और एक पुरानी डायरी निकाली — चमड़े की जिल्द, पन्ने पीले पड़ चुके थे। काँपती उँगलियों से उसने पन्ने पलटे और एक पन्ना आरव की तरफ़ बढ़ा दिया।

"दादी की डायरी। पढ़िए — ये सफ़हा।"

आरव ने पढ़ा। पुरानी, सुंदर लिखावट में लिखा था — "1962। आज 'याद-ए-गुल' तैयार हुआ। मेरी सबसे प्यारी सहेली की बेटी के लिए — वो बेटी, जिसकी शादी में मैं जा नहीं पाई। उस बेटी का नाम सना की अम्मी रखेंगी, ये मैंने ख़्वाब में देखा है। ये शीशी उसी तक पहुँचेगी — चाहे साठ साल लग जाएँ।"

ख़ामोशी छा गई। बाहर बारिश की आवाज़, और अंदर दो दिलों की धड़कनें।

"मतलब..." आरव ने धीरे से कहा, "आपकी दादी और सना की नानी... सहेलियाँ थीं?"

"सिर्फ़ सहेलियाँ नहीं थीं," मीरा ने डायरी का अगला पन्ना पलटा। "दादी ने लिखा है — सना की नानी की शादी अचानक तय हो गई थी, दूसरे शहर। दोनों फिर कभी नहीं मिलीं। ये इत्र दादी ने उसी अधूरी दोस्ती की निशानी के तौर पर बनाया था। साठ साल से ये शीशी इसी दुकान में इंतज़ार कर रही थी।"

"और आज बारिश ने मुझे यहीं ला खड़ा किया," आरव ने कहा। उसकी आवाज़ में हैरानी के साथ कुछ और भी था — कुछ ऐसा जो उसके सीने में उतरता जा रहा था।

मीरा ने शीशी से एक बूँद इत्र अपनी कलाई पर लगाई। फिर झिझकते हुए उसने आरव की कलाई की तरफ़ हाथ बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ उसकी कलाई को छू गईं — और एक पल को वक़्त ठहर गया।

खुशबू अब दोनों के बीच तैर रही थी — गुलमोहर, बारिश, चंदन... और कुछ और। कुछ ऐसा जो अभी लिखा जाना बाकी था।

अचानक मीरा की आँखों में आँसू आ गए। "मुझे... मुझे दादी की आवाज़ सुनाई दे रही है," वो फुसफुसाई। "वो लोरी... जो वो मुझे सुनाती थीं। मैं तो भूल चुकी थी कि वो लोरी कैसी थी।"

आरव ने उसकी आँखों में देखा — उन आँखों में वही गहराई थी जो उसने शीशियों में देखी थी। उसका हाथ अनायास उसकी ओर बढ़ा, और मीरा ने उसे रोका नहीं। उसने उसके गाल पर आई गीली लट को धीरे से हटाया। मीरा की साँसें तेज़ हो गईं।

"दादी लिखती हैं," मीरा ने फुसफुसाते हुए कहा, "खुशबू कभी झूठ नहीं बोलती। जो दिल एक-दूसरे के लिए बने हों, वो खुशबू से पहचान लेते हैं।"

बाहर बारिश थमने लगी थी। दुकान की पीली रौशनी में दोनों के चेहरे इतने पास आ गए कि साँसों की गर्मी महसूस होने लगी। मीरा की पलकें झुक गईं। आरव के होंठ उसके माथे को छू गए — एक पल, बस एक पल, जिसमें साठ साल का इंतज़ार सिमट आया।

फिर उसके होंठ उसके होंठों से एक साँस की दूरी पर ठहर गए। मीरा ने आँखें खोलीं — और उस एक नज़र में हज़ार बातें कह दीं।

उस रात के बाद की कहानी शीशियों की पीली रौशनी में ही रह गई।

सुबह जब दुकान खुली, तो काउंटर पर दो कप चाय रखी थी — और नीले काँच वाली शीशी की जगह ख़ाली थी। डायरी के आख़िरी पन्ने पर मीरा ने रात को ही एक लाइन लिख दी थी — "जिस दिन ये शीशी किसी ऐसे के हाथ खुले, जो सना को जानता हो — समझना, कहानी पूरी होने आई है। आज वो दिन था।"

साठ साल पहले जो दोस्ती अधूरी रह गई थी, वो आज मोहब्बत बनकर पूरी हुई।

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