शीशी की सील टूटी नहीं थी — फिर भी पूरी दुकान गुलाब से महक रही थी।
अयान ने काउंटर के पीछे से सिर उठाया। इकतीस साल की उम्र में उसने हज़ारों इत्र सूँघे थे, पर ये महक... ये तो उसके बचपन के उस बाग़ जैसी थी जो बीस साल पहले बिक चुका था।
कन्नौज की पुरानी गली में "ख़ुशबू महल" की ये तीसरी पीढ़ी थी। बाहर ताँबे की देग़ों से गुलाब का भाप उठ रहा था, और अंदर शीशियों की क़तारों में चार दशकों की मेहनत क़ैद थी।
उस सुबह गली में एक अजनबी क़दमों की आहट हुई।
"अस्सलाम वालेकुम," दरवाज़े पर एक लड़की खड़ी थी — हाथ में डायरी, कंधे पर बैग, आँखों में वो चमक जो सिर्फ़ किसी मिशन पर निकले लोगों में होती है। "मैं सायरा हूँ। दिल्ली से आई हूँ — ख़ुशबुओं पर लिखती हूँ।"
अट्ठाईस साल की सायरा पिछले एक साल से हिंदुस्तान के उन हुनरों को खोज रही थी जो दम तोड़ रहे थे। कन्नौज का इत्र उसकी लिस्ट में सबसे ऊपर था।
"लिखने वाले बहुत आते हैं," अयान ने मुस्कुराकर कहा। "रुकने वाले कोई नहीं।"
"मैं रुकूँगी," सायरा ने कहा। "जब तक ये देग़ें ठंडी न हो जाएँ।"
अयान हँस पड़ा — पहली बार किसी अजनबी की बात पर। उसने उसे दुकान दिखाई — चंदन की लकड़ी की अलमारियाँ, पीतल के तराज़ू, और वो रजिस्टर जिसमें उसके दादा हर ऑर्डर अपने हाथ से लिखते थे।
फिर सायरा की नज़र सबसे ऊँचे शेल्फ़ पर ठहर गई।
वहाँ एक छोटी सी शीशी थी — गर्दन पर लाल धागा, सील पर पुरानी मोहर, और लेबल पर दादा के हाथ की लिखावट: "गुलाब-ए-इश्क़"।
"ये महक रही है," सायरा ने धीरे से कहा।
अयान का हाथ रुक गया। "नामुमकिन है। ये शीशी चालीस साल से सील बंद है।"
"तो फिर ये गुलाब की ख़ुशबू कहाँ से आ रही है?"
अयान ने शीशी उतारी। सील सही थी — अटूटी, पुरानी, पीली पड़ चुकी। उसने उसे नाक के पास ले जाकर सूँघा। कुछ नहीं। सिर्फ़ काँच और वक़्त की गंध।
"अजीब है," उसने कहा। "बड़े-बड़े इत्र-शनास आए — सबने कहा, ख़ुशबू मर चुकी है। सील के अंदर जो था, वो वक़्त खा गया।"
"पर मुझे महक रही है," सायरा ने कहा। "जैसे... जैसे अभी-अभी गुलाब तोड़े गए हों।"
अयान ने दादा की डायरी निकाली — चमड़े की जिल्द, पन्ने पीले। एक पन्ने पर लाल स्याही से लिखा था:
"जिस दिन ये शीशी महकेगी, समझना वो आ गई।"
"कौन 'वो'?" सायरा ने पूछा।
अयान ने पुराना ऑर्डर-रजिस्टर खोला। चालीस साल पुराना पन्ना — "रुक्साना बेगम, दिल्ली। गुलाब-ए-इश्क़, एक शीशी। पेशगी अदा।"
"उन्होंने कभी आकर शीशी ली ही नहीं," अयान ने कहा। "दादा हर साल इसी महीने में ये इत्र दोबारा बनाते थे — ताकि जब वो आएँ, ताज़ा मिले। चालीस साल। आख़िरी बार उन्होंने ये शीशी भरी, सील की, और ऊपर रख दी।"
सायरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"मेरी नानी का नाम..." उसने धीरे से कहा, "रुक्साना था।"
दुकान में सन्नाटा छा गया। देग़ की भाप खिड़की से आती धूप में तैर रही थी।
"वो मेरे पैदा होने से पहले गुज़र गईं," सायरा ने कहा। "अम्मी ने कभी कन्नौज का ज़िक्र नहीं किया। बस इतना कहा था — नानी की शादी बहुत जल्दी में तय हुई थी।"
अयान ने डायरी का आख़िरी पन्ना पलटा। वहाँ दादा की काँपती लिखावट थी:
"ख़ुशबू अपने हक़दार को पहचानती है — चाहे चालीस साल लग जाएँ।"
अगली सुबह अयान उसे गुलाब के खेतों में ले गया।
भोर की धुंध में हज़ारों गुलाब ओस से भीगे थे। मज़दूर टोकरियों में फूल तोड़ रहे थे, और हवा में वो महक थी जो किसी इत्र की शीशी में क़ैद नहीं हो सकती।
"इत्र बनाना रसायन नहीं है," अयान ने एक गुलाब तोड़कर उसे दिया। "ये इंतज़ार है। फूल को सही वक़्त पर तोड़ो, देग़ में सही आँच दो, और फिर... बस इंतज़ार करो।"
सायरा ने गुलाब को चेहरे के पास ले जाकर सूँघा। "और अगर इंतज़ार चालीस साल लंबा हो?"
"तो समझो," अयान ने उसकी आँखों में देखा, "ख़ुशबू सच्ची थी।"
शाम को भट्टी के पास अयान ने उसे इत्र लगाना सिखाया।
"नब्ज़ पर लगाओ," उसने शीशी की डाट से एक बूँद उसकी कलाई पर टपकाई। "ख़ुशबू दिल की धड़कन से खुलती है।"
उसकी उँगलियाँ सायरा की कलाई पर ठहर गईं — एक पल ज़्यादा। सायरा की धड़कन तेज़ हो गई, और अयान ने महसूस किया — उसकी उँगलियों के नीचे वो धड़कन जैसे इत्र में घुल रही हो।
"तुम्हारी नब्ज़ कह रही है," उसने धीरे से कहा, "कि तुम्हें ये जगह अपनी लगने लगी है।"
"शायद," सायरा ने कहा, नज़रें न हटाते हुए। "या शायद नब्ज़ कुछ और कह रही है।"
बाहर मानसून की पहली बारिश शुरू हो गई थी। देग़ की भाप और बारिश की बूँदें मिलकर दुकान को किसी सपने जैसा बना रही थीं।
अयान ने वो पुरानी शीशी — "गुलाब-ए-इश्क़" — अलमारी से उतारी और सायरा के हाथों में रख दी।
"दादा कहते थे — ये शीशी किसी की अमानत है। आज मुझे लग रहा है, अमानत अपनी मालकिन के पास पहुँच गई।"
सायरा ने शीशी को थामा। सील अब भी बंद थी — पर उसके हाथों में आते ही पूरी दुकान में गुलाब की वो महक फैल गई जो सिर्फ़ वही महसूस कर सकती थी।
"अयान," उसकी आवाज़ काँप रही थी, "अगर ये ख़ुशबू मेरी नानी के लिए थी... तो मैं कौन हूँ?"
"तुम वो हो," अयान ने उसके चेहरे को हाथों में लिया — धीरे से, जैसे कोई शीशी उठाता है, टूटने के डर से, "जिसके लिए चालीस साल का इंतज़ार ख़त्म हुआ।"
गुलाब की पंखुड़ियाँ भाप में तैर रही थीं। बारिश शीशों पर थिरक रही थी। उसके होंठ उसके होंठों से एक साँस की दूरी पर थे — इतने क़रीब कि दुनिया में सिर्फ़ दो धड़कनें बची थीं।
सुबह सायरा छत पर थी — हाथ में कुल्हड़ की चाय, सामने जागता हुआ कन्नौज।
अयान उसके पास आकर बैठा। दोनों के बीच वो शीशी रखी थी — सील अब भी बंद, पर कमरा गुलाब से महक रहा था।
"मैं वो लेख नहीं लिखूँगी," सायरा ने कहा। "वो 'मरते हुए हुनर' वाला।"
"तो क्या लिखोगी?"
"एक प्रेम-पत्र," उसने मुस्कुराकर कहा। "एक ऐसे हुनर के नाम, जो मरता नहीं — बस इंतज़ार करता है।"
एक साल बाद।
"ख़ुशबू महल" के बोर्ड पर नया रंग था। अंदर दो कारीगर काम सीख रहे थे, और दीवार पर सायरा के लेख की कतरन फ्रेम में लगी थी — उस लेख ने दुकान की क़िस्मत बदल दी थी।
उनके घर की खिड़की पर वो शीशी अब खुली रखी थी। हर मानसून की भोर में, बिना किसी के छुए, कमरा ख़ुद-ब-ख़ुद गुलाब से महक उठता था — जैसे चालीस साल का इंतज़ार अब हर सुबह दोहराता हो कि वो ख़त्म हो चुका है।
अयान ने डायरी का वो पन्ना फ्रेम कराकर दीवार पर लगाया था:
"जिस दिन ये शीशी महकेगी, समझना वो आ गई।"
नीचे सायरा ने अपने हाथ से लिखा था — "आ गई।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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