झूमर वाली रात
आधी रात के ठीक बारह बजे, झूमर की इक्कीसवीं बत्ती में आग लगी।
हॉल में कोई नहीं था। झूमर में कोई मोमबत्ती नहीं थी — पिछले चालीस साल से उसमें एक भी बत्ती नहीं रखी गई थी। और फिर भी, इक्कीसवीं डंडी के खाली प्याले में एक लौ नाची — सुनहरी, स्थिर, जैसे किसी ने अभी-अभी उसे छुआ हो।
तारिणी की साँस थम गई।

वो उनतीस साल की थी — इंदौर की क्रिस्टल-संरक्षण विशेषज्ञ, देश की गिनी-चुनी कारीगरों में से एक जो टूटे क्रिस्टल को फिर से साँस देना जानती थीं। डूंगरपुर की इस पुरानी हवेली में वो नीलामी-घर की तरफ़ से आई थी — हवेली का सामान बिकने वाला था, और उसका काम था इस बेल्जियम के क्रिस्टल झूमर की हालत और क़ीमत की रिपोर्ट तैयार करना।
इक्कीस डंडियों वाला झूमर। बीस पर धूल। इक्कीसवीं पर आग।
"ये... ये हर साल होता है," पीछे से एक आवाज़ आई।
तारिणी पलटी। दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था — चौंतीस के आसपास, कंधे पर पुरानी चादर, हाथ में लालटेन। "मैं सम्राट हूँ," उसने कहा। "इस हवेली के आख़िरी चौकीदार का पोता। और तुम वो हो जो झूमर को नीलाम करने आई हो।"
"बेचने नहीं — सहेजने," तारिणी ने कहा, पर उसकी नज़र लौ से नहीं हटी। "ये बत्ती... किसने जलाई?"
"किसी ने नहीं।" सम्राट ने लालटेन नीचे रखी। "उन्नीस सौ इकतीस से, हर साल इसी रात — जिस रात ये झूमर पहली बार जला था — इक्कीसवीं बत्ती ख़ुद जल उठती है। सुबह तक बुझ जाती है। मेरे दादा ने देखा, उनके दादा ने देखा।"
तारिणी हँसना चाहती थी, पर हँसी नहीं आई। वो कारीगर थी — शीशे को छूकर उसकी उम्र बता सकती थी। और ये लौ... ये लौ किसी चालबाज़ी जैसी नहीं लग रही थी।
"इक्कीसवीं डंडी," सम्राट ने कहा, "बाक़ी बीस बेल्जियम से आई थीं। इक्कीसवीं यहीं बनी थी — डूंगरपुर के काँच के कारीगर मोहनलाल ने अपने हाथों से गढ़ी थी। अट्ठाईस साल का था वो तब।"
"और ये रात?" तारिणी ने पूछा।
सम्राट खिड़की के पास गया। बाहर चाँद था, और हवेली की छत पर कबूतरों की परछाइयाँ तैर रही थीं। "हवेली के बानी की बेटी थीं — रुक्मिणी। छब्बीस साल की। मोहनलाल से..." वो रुका। "उस ज़माने में ये कहानी कहने की इजाज़त नहीं थी। जिस रात वो दोनों इस हवेली से भागने वाले थे, उसी रात झूमर पहली बार जला था — मोहनलाल ने इक्कीसवीं डंडी ख़ुद लगाई थी, रुक्मिणी के नाम पर।"
"फिर?"
"फिर वो रात आई ही नहीं। रुक्मिणी को उसी हफ़्ते ब्याह दिया गया। मोहनलाल डूंगरपुर छोड़कर चले गए।" सम्राट की आवाज़ धीमी हुई। "कहते हैं, उसी रात से इक्कीसवीं बत्ती हर साल जलती है — जैसे कोई अब भी इंतज़ार कर रहा हो।"

तारिणी ने झूमर को ग़ौर से देखा। क्रिस्टल की हर किरच में वो लौ सौ बार टूटकर बिखर रही थी — पूरा हॉल जैसे आग की झील में तैर रहा था।
"तुम्हें डर नहीं लगता?" उसने पूछा।
"पहले लगता था," सम्राट मुस्कुराया। "बचपन में दादा कहते थे — जिस रात ये बत्ती बुझ जाए, समझना कहानी ख़त्म। पर पचानवे साल हो गए, बुझी नहीं।"
अगले तीन दिन तारिणी ने झूमर के साथ गुज़ारे। दिन में वो उसकी हर किरच नापती, हर डंडी की मज़बूती परखती, नोट्स लिखती। शाम को सम्राट उसके लिए चाय लाता — हवेली के पिछले हिस्से के पुराने क्वार्टर से, जहाँ वो अब भी रहता था।
"तुम ये हवेली बिकने दोगे?" एक शाम तारिणी ने पूछा।
"मेरी क्या औक़ात," सम्राट ने कहा। "मैं तो चौकीदार का पोता हूँ। पर..." उसने झूमर की तरफ़ देखा। "ये झूमर बिका, तो कहानी भी बिक जाएगी।"
तारिणी कुछ नहीं बोली। पर उस रात उसने अपनी रिपोर्ट में एक लाइन जोड़ी — "इक्कीसवीं डंडी मूल नहीं, स्थानीय कारीगरी है; ऐतिहासिक मूल्य असाधारण।"
चौथी रात — वही सालाना रात — तारिणी हॉल में रुक गई। "मैं देखना चाहती हूँ," उसने कहा। "अपनी आँखों से।"
सम्राट ने हॉल के सारे दरवाज़े बंद किए। "कल नीलामी की आख़िरी तारीख़ है," उसने धीरे से कहा। "परसों से ये झूमर शायद किसी और शहर की किसी और छत पर होगा।"
बारह बजने में दस मिनट थे। दोनों झूमर के नीचे खड़े थे — इतने पास कि तारिणी को सम्राट की साँसों की गर्माहट महसूस हो रही थी।
"तुम्हें क्या लगता है," तारिणी ने फुसफुसाकर पूछा, "मोहनलाल अब कहाँ होंगे?"
"पता नहीं," सम्राट ने कहा। "पर दादा कहते थे — जो इंतज़ार करता है, वो हारता नहीं। वो बस... रूप बदल लेता है।"
ठीक बारह बजे, इक्कीसवीं बत्ती में आग लगी।
तारिणी ने अपनी आँखों से देखा — कोई हाथ नहीं, कोई दिया नहीं, कोई तार नहीं। खाली प्याले में लौ उठी, जैसे साँस ली हो।
और फिर —
बीसवीं बत्ती में भी आग लगी।
तारिणी की चीख़ गले में अटक गई। सम्राट का हाथ अनजाने में उसका हाथ थाम चुका था। पचानवे साल में पहली बार — इक्कीसवीं के साथ बीसवीं बत्ती भी जल रही थी। दो लौं, दो परछाइयाँ, एक-दूसरे की तरफ़ झुकी हुई।
"ये... ये पहले कभी नहीं हुआ," सम्राट की आवाज़ काँप रही थी।
तारिणी ने उसकी आँखों में देखा — उनमें दो लौं नाच रही थीं। "शायद," उसने धीरे से कहा, "इंतज़ार ख़त्म होने का वक़्त आ गया है।"
झूमर की रोशनी में हॉल बदल गया था। धूल सुनहरी लग रही थी। पुरानी दीवारों पर क्रिस्टल की हज़ारों किरचें सितारों जैसी चमक रही थीं। और उन दोनों के बीच की दूरी — जो तीन दिन से एक-एक इंच घट रही थी — अब साँस भर की रह गई थी।
सम्राट ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया। तारिणी ने आँखें बंद नहीं कीं — वो इस पल को देखना चाहती थी, पूरा, बिना पलक झपकाए।
उनके होंठों के बीच अब सिर्फ़ एक साँस का फ़ासला था...

सुबह जब तारिणी की आँख खुली, तो पहली चीज़ जो उसने देखी वो थी खिड़की से आती धूप — और दूसरी, मेज़ पर रखा उसका अपना फ़ोन, जिसमें नीलामी-घर के तीन मिस्ड कॉल थे।
उसने रिपोर्ट भेजी। आख़िरी लाइन में लिखा था — "झूमर को हवेली से अलग करके बेचना इसकी ऐतिहासिक आत्मा की हत्या होगी। सिफ़ारिश: झूमर हवेली के साथ ही रहे; संरक्षण-कार्य हेतु मैं उपलब्ध हूँ।"
नीलामी-घर ने झूमर को सूची से हटा दिया। हवेली बिकी — एक ऐसे ख़रीदार को जो उसे धरोहर-होटल बनाना चाहता था, और जिसकी पहली शर्त थी कि झूमर वहीं रहेगा, उसी हॉल में।
तारिणी ने इंदौर वापसी का टिकट रद्द कर दिया।
आज, एक साल बाद, डूंगरपुर की उसी हवेली के उसी हॉल में इक्कीस बत्तियों वाला झूमर हर शाम जलता है — पूरे इक्कीस, पूरे शबाब पर। इंतज़ार ख़त्म हुआ, तो झूमर ने हर शाम जलना शुरू कर दिया।
और कहते हैं, जो जोड़ा उसके नीचे खड़ा होकर कोई मन्नत माँगता है, उसकी मन्नत कभी ख़ाली नहीं जाती।
सम्राट कहता है — ये मन्नतों वाला झूमर नहीं, मोहब्बत वाला झूमर है।
तारिणी हँसती है। फिर वो दोनों उसी के नीचे खड़े हो जाते हैं — और झूमर की इक्कीस लौं एक साथ झुक जाती हैं, जैसे सलाम कर रही हों।
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