आधी रात को कठपुतली ने आँख खोली।
सांझ की साँस अटक गई। थिएटर की बत्तियाँ बुझी हुई थीं, बाहर पहाड़ों पर चाँदनी बिछी थी, और स्टेज के बीचों-बीच लटकी नर्तकी-कठपुतली — जिसके चेहरे पर दादाजी ने कभी आँखें बनाई ही नहीं थीं — अब उसे देख रही थी।
सत्ताईस साल की सांझ तीन दिन पहले ही बुरांशखेत लौटी थी। पहाड़ों के इस छोटे-से कस्बे में उसके दादाजी काशीनाथ का कठपुतली थिएटर था — "कठपुतली घर"। आठ साल पहले सांझ दिल्ली चली गई थी, डिज़ाइन की नौकरी के पीछे। तीन महीने पहले दादाजी गुज़र गए, और थिएटर उसके नाम हो गया — साथ में एक शर्त भी। सात दिन के अंदर यहाँ एक शो होना चाहिए, वरना यह जगह एक होटल बनाने वाले को बिक जाएगी।
पहली रात सांझ ने थिएटर का ताला खोला तो धूल, देवदार की ख़ुशबू और चालीस साल पुरानी ख़ामोशी ने उसका स्वागत किया। दीवारों पर लटकी दर्जनों कठपुतलियाँ थीं — राजा, रानी, साधु, राक्षस — और स्टेज के बीचों-बीच, सबसे अलग, एक नर्तकी। लकड़ी का चेहरा चिकना था। बिना आँखों के। बिना मुस्कान के।
दूसरे दिन एक अजनबी आया। तीस साल का निखिल — कंधे पर कैमरा, आँखों में घुमक्कड़ी की धूल। मुंबई से आया था, मरती हुई लोक-कलाओं पर एक डॉक्यूमेंट्री के लिए तस्वीरें लेने।
"सुना है यहाँ का आख़िरी शो होने वाला है," उसने कहा। "क्या मैं उसे कैमरे में क़ैद कर सकता हूँ?"
सांझ ने हामी भर दी। शो तो होना ही था — भले ही उसे अब कठपुतली चलानी आती भी न हो।
(AI generated illustration)
बिना चेहरे वाली नर्तकी
दूसरी रात, आधी रात को, सांझ की नींद टूटी। नीचे थिएटर से आवाज़ आ रही थी — लकड़ी की खट-खट, जैसे कोई स्टेज पर नाच रहा हो।
वह दबे पाँव नीचे उतरी। दरवाज़े की दरार से जो देखा, उस पर उसे अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं हुआ।
दो कठपुतलियाँ स्टेज पर थीं — एक राजकुमार, एक नर्तकी। कोई डोर थामे हुए नहीं था, फिर भी वे नाच रही थीं। राजकुमार घुटनों पर झुका, जैसे कुछ माँग रहा हो। नर्तकी ने मुँह फेर लिया। फिर दोनों अपनी जगह लौट गए। और फिर — वही सीन, फिर से।
सांझ ने बत्ती जलाई। सब कुछ ठहर गया। कठपुतलियाँ लटकी हुई थीं, जैसे कभी हिली ही न हों। सिर्फ़ नर्तकी की डोर अब भी हल्के से हिल रही थी।
"तुमने देखा?" पीछे से निखिल की आवाज़ आई। वह भी जाग गया था, कैमरा हाथ में। "मैंने तस्वीर खींचने की कोशिश की — फ़्रेम में सिर्फ़ धूल दिखी।"
"ये हर रात होता है?" सांझ ने पूछा।
"मैं तीन रातों से यहाँ हूँ," निखिल ने कहा। "तीनों रात, यही सीन। वही जगह। वही अधूरा अंत।"
डायरी का आख़िरी पन्ना
अगली सुबह सांझ ने दादाजी की डायरी खोली। आख़िरी पन्ने पर लिखा था — "नर्तकी का चेहरा कभी मत बनाना। वह चेहरा लकड़ी में नहीं, किसी के इंतज़ार में है।"
और उससे पहले, कई पन्नों में एक कहानी थी। जवानी में काशीनाथ ने एक नर्तकी से प्यार किया था — मोहिनी, जो एक घुमंतू मंडली के साथ कस्बे आई थी। उन्होंने एक साथ एक शो बनाया था — राजकुमार और नर्तकी की कहानी। आख़िरी सीन से एक रात पहले मोहिनी की मंडली को अचानक जाना पड़ा। शो कभी पूरा नहीं हुआ।
काशीनाथ ने चालीस साल तक वह आख़िरी सीन लिखने की कोशिश की। उन्होंने दोनों कठपुतलियाँ एक ही देवदार से तराशीं। पर नर्तकी का चेहरा कभी नहीं बनाया — छेनी हर बार फिसल जाती थी, जैसे लकड़ी मना कर रही हो।
"तो ये कठपुतलियाँ..." सांझ ने फुसफुसाकर कहा, "चालीस साल से उसी सीन की रिहर्सल कर रही हैं?"
"या फिर," निखिल ने कहा, "किसी का इंतज़ार कर रही हैं — जो इस कहानी को ख़त्म करे।"
उस शाम सांझ ने छेनी उठाई। नर्तकी की कठपुतली को गोद में रखा और चेहरा तराशने की कोशिश की। छेनी फिसली। अँगूठा कट गया — एक बूँद लहू लकड़ी पर गिरा।
निखिल ने उसका हाथ थामा, रूमाल से अँगूठा बाँधा। उसके हाथ सांझ के हाथ पर ठहरे रह गए — एक पल, दो पल। लालटेन की रोशनी में दोनों एक-दूसरे के इतने क़रीब थे कि साँसें टकराने लगीं।
सांझ के होंठ उसके होंठों से बस एक साँस की दूरी पर ठहर गए। फिर उसने धीरे से कहा, "पहले कहानी।"
निखिल मुस्कुराया। "पहले कहानी," उसने कहा, और उसका हाथ छोड़ दिया — पर नज़रें नहीं।
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अधूरा सीन
छठी रात सांझ समझ गई।
नर्तकी का चेहरा ग़ायब नहीं था। वह इंतज़ार कर रहा था — किसी ऐसे का, जो कहानी का अंत ख़ुद चुने। दादाजी ने चेहरा इसलिए नहीं बनाया था क्योंकि अंत उनका नहीं था। अंत उसका था, जो इस कहानी को आगे ले जाए।
"हम ये शो करेंगे," सांझ ने कहा। "आख़िरी सीन हम ख़ुद खेलेंगे। मैं नर्तकी की डोर थामूँगी, तुम राजकुमार की।"
निखिल ने एक पल उसे देखा, फिर सिर हिलाया। "तो रिहर्सल शुरू करें?"
दोनों ने रात-रात भर रिहर्सल की। सांझ ने डोर थामी, निखिल ने डोर थामी। कभी डोरें उलझ जातीं, कभी कठपुतलियाँ लड़खड़ा जातीं — और दोनों हँस पड़ते। एक रात रिहर्सल के बीच निखिल ने सांझ का हाथ थाम लिया — इस बार डोर के बहाने नहीं। "अगर ये कहानी ख़त्म हो गई," उसने पूछा, "तो हमारा क्या होगा?"
सांझ ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। "कहानी ख़त्म होगी," उसने कहा, "हम नहीं।"
आख़िरी शो
सातवें दिन थिएटर खचाखच भरा था। निखिल की तस्वीरों ने कस्बे को जगा दिया था — लोग दूर-दूर से आए थे। पर्दा उठा।
शो शुरू हुआ — राजकुमार और नर्तकी की कहानी, जैसी दादाजी ने लिखी थी। और जब आख़िरी सीन आया, तो सांझ ने नर्तकी की डोर थामी और निखिल ने राजकुमार की।
इस बार नर्तकी ने मुँह नहीं फेरा।
वह राजकुमार की ओर बढ़ी — एक क़दम, दो क़दम — और उसके सामने रुक गई। स्टेज पर चाँदनी गिर रही थी। दोनों कठपुतलियाँ एक-दूसरे के सामने ठहर गईं, जैसे चालीस साल का इंतज़ार एक ही साँस में सिमट गया हो।
और तभी सारी डोरें एक साथ ढीली पड़ गईं।
सांझ ने नर्तकी को देखा। चाँदनी में, एक पल के लिए, उस चिकने लकड़ी के चेहरे पर एक मुस्कान थी — वैसी ही, जैसी उसी पल सांझ के होंठों पर थी।
तालियों की गड़गड़ाहट से थिएटर गूँज उठा।
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शो के बाद, ख़ाली स्टेज पर, निखिल ने सांझ का हाथ थामा। "तो," उसने कहा, "अगला शो कब?"
"जब तक डोर हमारे हाथ में है," सांझ ने कहा, "हर रात।"
उसने सांझ को अपनी ओर खींचा। उनके होंठ मिले — धीमे, जैसे कोई पुरानी धुन फिर से शुरू हो रही हो। उसके बाद की रात सिर्फ़ उनकी थी।
अगली सुबह कठपुतलियाँ फिर से चुपचाप लटकी हुई थीं, डोरें ढीली। नर्तकी का चेहरा फिर से चिकनी लकड़ी था — पर सांझ जानती थी, कहानी पूरी हो चुकी है।
और "कठपुतली घर" — वह अब बिकने वाला नहीं था। वह फिर से जी उठा था।



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