छह बजकर पैंतालीस मिनट पर काग़ज़ का जहाज़ बालकनी में उतरा — हवा के ख़िलाफ़।
अट्ठाईस साल की समीरा ने चाय का कप नीचे रखा। अंधेरी वेस्ट की बारहवीं मंज़िल — उसकी बालकनी ही उसका स्टूडियो थी: लैपटॉप, स्केचपैड, और सामने फैला मुंबई का शामियाना। फ्रीलांस ग्राफ़िक डिज़ाइनर की ज़िंदगी में शाम के ये दो घंटे सबसे कीमती थे।
और पिछले तीन हफ़्तों से इन दो घंटों में एक मेहमान भी शामिल था — काग़ज़ का जहाज़।
पहली बार समीरा ने समझा किसी बच्चे की शरारत है। पर दूसरी शाम फिर वही वक़्त — छह बजकर पैंतालीस मिनट — और तीसरी शाम भी। हर बार जहाज़ रेलिंग पर आकर टिकता, जैसे उसे पता हो कहाँ उतरना है।
अजीब बात ये थी कि शाम की हवा उसकी बिल्डिंग से सामने वाली बिल्डिंग की ओर बहती थी — जहाज़ को उसकी बालकनी से दूर ले जाने वाली दिशा में। पर ये जहाज़ हवा के ख़िलाफ़ आता था — धीमा, ठहरा हुआ, जैसे तैरता हुआ।
और हर जहाज़ के पंख पर एक छोटी-सी तस्वीर बनी होती — कभी चाँद, कभी तारा, कभी उड़ती चिड़िया। कोई नाम नहीं, कोई शब्द नहीं।

चौथी शाम समीरा ने जवाब भेजने की ठानी। उसने अख़बार का पन्ना मोड़ा — नुकीला, संतुलित जहाज़ — और सामने वाली बिल्डिंग की तरफ़ उछाला।
हवा ने उसे छीन लिया। जहाज़ घूमता हुआ नीचे नीम के पेड़ में जा अटका।
पाँचवीं शाम फिर कोशिश। फिर वही — नीम का पेड़।
छठी शाम वो नीचे उतरी — वॉचमैन रामू काका गेट पर डंडा लिए थे।
"काका, ये नीम के पेड़ में जो काग़ज़ के जहाज़ अटके हैं —"
रामू काका हँस पड़े। "अरे बिटिया, वो तो आपके ही हैं! रोज़ एक-दो निकालता हूँ — आप उड़ाती हैं, पेड़ पकड़ता है।"
"और... मेरी बालकनी में जो उतरते हैं?"
काका की हँसी थम गई। उन्होंने सामने वाली बिल्डिंग की छत की तरफ़ देखा। "साहब के जहाज़ तो सीधे आपकी रेलिंग पर उतरते हैं, बिटिया। बारिश में भी। मैंने खुद देखा है — आँधी में भी वो जहाज़ डगमगाता नहीं।"
"कौन साहब?"
"अरे वही — बारहवीं मंज़िल वाले।" काका ने कंधे उचकाए। "नाम नहीं पता। पर जहाज़ मोड़ना उन्हें आता है।"
उस रात समीरा को नींद नहीं आई। बारहवीं मंज़िल — उसी की मंज़िल, सामने वाली बिल्डिंग में। कोई था, जो तीन हफ़्तों से उसे देख रहा था — और उसने कभी पलटकर देखा तक नहीं।
अगली शाम छह बजकर चालीस मिनट पर वो बालकनी में थी — नज़र सामने वाली छत पर।
छह बजकर पैंतालीस मिनट। एक सफ़ेद बिंदु हवा में उठा — छोटा-सा, नाज़ुक — और हवा के ख़िलाफ़ तैरता हुआ उसकी तरफ़ बढ़ा। समीरा की साँस थम गई। जहाज़ ने एक गोल चक्कर काटा — जैसे सलाम किया हो — और रेलिंग पर उतर गया।
पंख पर इस बार एक छोटी-सी खिड़की बनी थी — और खिड़की में दो आँखें।
समीरा हँस पड़ी — पहली बार, खुलकर। फिर उसने अख़बार का पन्ना उठाया, जहाज़ मोड़ा, और उस पर बड़े अक्षरों में लिखा: "तुम हो कौन?"
उछाला। हवा ने छीना। नीम का पेड़।
पर अगली शाम जवाब आया। जहाज़ के पेट पर लिखा था — "वो, जो तुम्हें रोज़ शाम को देखता है।"
समीरा का दिल ज़ोर से धड़का — पंख पर एक छोटा-सा दिल बना था, तीर के साथ नहीं, बस सादा और सच्चा।
फिर शुरू हुआ काग़ज़ का इश्क़।

हर शाम एक जहाज़ — कभी एक लाइन, कभी एक तस्वीर। "आज तुम्हारी चाय ठंडी हो गई थी।" "वो नीली स्केचबुक में क्या बनाती हो?" समीरा जवाब में जहाज़ उड़ाती — सब नीम के पेड़ में। पर उसे अब बुरा नहीं लगता था; रामू काका रोज़ शाम उसके जहाज़ पेड़ से निकालकर एक थैले में रख देते — "बिटिया, ये तो चिट्ठियों का पेड़ हो गया है।"
एक शाम उसने पूछा — "तुम्हारा नाम क्या है?"
जवाब आया — "राघव। इकतीस साल। और तुम?"
"समीरा। अट्ठाईस। ग्राफ़िक डिज़ाइनर।"
"मैं जानता हूँ," जहाज़ ने कहा। "तुम्हारे लैपटॉप की रोशनी रोज़ रात बारह बजे तक जलती है।"
समीरा ने सामने वाली छत की तरफ़ देखा — एक साया रेलिंग पर टिका था। उसने हाथ हिलाया। साये ने भी।
दो हफ़्ते ऐसे ही बीते — बिना मिले, बिना आवाज़ सुने। समीरा अब छह बजकर पैंतालीस मिनट का इंतज़ार घड़ी देखकर नहीं, दिल देखकर करती थी।
फिर एक शाम जहाज़ नहीं आया।
छह बजकर पैंतालीस मिनट। समीरा रेलिंग पर टिकी रही। सात बजे। साढ़े सात। आठ।
बालकनी खाली थी। हवा आज भी उसी दिशा में बह रही थी — पर जहाज़ नहीं था।
उस रात उसने खाना नहीं खाया। लैपटॉप की रोशनी बारह बजे से पहले बुझ गई।
अगली सुबह — धूप अभी नरम थी — एक जहाज़ बालकनी में उतरा। किनारे भीगे हुए थे, जैसे बारिश में उड़ा हो — पर उसकी तरफ़ तो बूँद भी नहीं पड़ी थी।
पेट पर लिखा था — "कल मेरा तबादला हो गया। पुणे। ये आख़िरी जहाज़ है।"
समीरा देर तक वो लाइन पढ़ती रही, फिर जहाज़ को सीने से लगा लिया — और पहली बार काग़ज़ के जहाज़ को देखकर रोई।
शाम को छह बजकर पैंतालीस मिनट पर वो बालकनी में नहीं थी। वो नीचे थी — सामने वाली बिल्डिंग के गेट पर।
"बारहवीं मंज़िल — राघव?" उसने वॉचमैन से पूछा।
"अरे, वो तो सुबह ही सामान लेकर निकले —" वॉचमैन की बात अधूरी रह गई।
क्योंकि गेट के बाहर एक टैक्सी रुकी — और उसमें से एक आदमी उतरा। हाथ में अटैची, जेब में कुछ खुरदुरा।
उसने समीरा को देखा — और ठिठक गया।
"तुम...?"
"मैं राघव," उसने कहा। जेब से उसने काग़ज़ का जहाज़ निकाला — थोड़ा मुड़ा-तुड़ा, जेब की सलवटों वाला। "मैंने सोचा, आख़िरी जहाज़ हाथ से दे दूँ।"
समीरा ने जहाज़ लिया। पंख पर इस बार कोई तस्वीर नहीं थी — बस एक लाइन: "वापस आ गया।"
"तबादला?" उसने पूछा।
"रद्द कर दिया," राघव मुस्कुराया — इकतीस साल की उम्र, आँखों में शाम का उजाला। "पुणे में बालकनी नहीं है। और बिना बालकनी के जहाज़ कहाँ उतरेगा?"
समीरा हँस पड़ी — आँसू और हँसी एक साथ। "तुम्हारे जहाज़ हवा के ख़िलाफ़ कैसे आते थे, राघव?"
"काग़ज़ के जहाज़ हवा के नहीं, इरादों के ग़ुलाम होते हैं," उसने कहा। "मैंने हर जहाज़ को तुम्हारा नाम सिखाया था।"
उस शाम दोनों समीरा की बालकनी में थे — पहली बार, आमने-सामने। चाय के दो कप, और रेलिंग पर दो काग़ज़ के जहाज़।
जब उनके होठ मिले, तो रेलिंग पर रखा जहाज़ हल्के से हिला — जैसे हवा ने भी एक पल को साँस रोक ली हो।

उसके बाद की शाम सिर्फ़ उन दो जहाज़ों को पता है।
सुबह बालकनी की रेलिंग पर दो काग़ज़ के जहाज़ रखे थे — एक के पंख पर छोटा-सा चाँद बना था, दूसरे पर सूरज।
रामू काका ने नीचे से देखा और मुस्कुराए — नीम के पेड़ में आज कोई नया जहाज़ नहीं अटका था।
अब हर शाम छह बजकर पैंतालीस मिनट पर एक काग़ज़ का जहाज़ उड़ता है — पर अब उसे हवा के ख़िलाफ़ नहीं उड़ना पड़ता। राघव अब जहाज़ हाथ में लेकर आता है — और समीरा के हाथ में थमा देता है।
पंख पर हर बार एक नई तस्वीर होती है। कल चाँद था। आज समीरा ने कहा है — कल सूरज बनेगा।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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