रात के ग्यारह बजे फ़्लैटबेड मशीन ने खाँसा — और एक अख़बार बाहर सरक आया जिस पर कल की तारीख़ छपी थी।
प्राची ने उसे उठाया। काग़ज़ अब भी गर्म था। स्याही की खुशबू — उसके बचपन की सबसे पुरानी खुशबू — उसकी नाक में उतर गई।
उनतीस साल की प्राची अल्मोड़ा के 'पर्वत प्रभात' अख़बार की सब-एडिटर थी। और पिछले एक साल से — पिता के गुज़रने के बाद — इस प्रेस की मालकिन भी।
प्रेस शहर के पुराने हिस्से में था — लकड़ी की सीढ़ियाँ, टीन की छत, और बीचों-बीच 1928 की फ़्लैटबेड मशीन। धनीराम उसे 'बुढ़िया' कहता था। बासठ साल का धनीराम चालीस साल से इसी प्रेस में था — पिता के सबसे पुराने साथी।
"काका," प्राची ने अख़बार हवा में लहराया, "मशीन ने फिर एक ज़्यादा छाप दिया।"
धनीराम ने चश्मा नाक पर सरकाया। "गिनती में ग़लती हुई होगी।"
पर प्राची की नज़र तारीख़ पर अटक गई थी। कल की तारीख़। आज रात छपे अख़बार पर कल की तारीख़।
उसने आज सुबह वाला अख़बार निकाला — दोनों को ट्यूबलाइट के नीचे फैलाया। हर शब्द एक जैसा। हर खबर एक जैसी। सिर्फ़ पहले पन्ने की तस्वीर अलग थी।
आज सुबह की तस्वीर में पहाड़ों के ऊपर उगता सूरज था — सनराइज़ पॉइंट से लिया गया, ख़ाली, सुनसान। और कल की तारीख़ वाली तस्वीर में वही सूरज, वही पॉइंट — पर दो छोटी-छोटी आकृतियाँ। एक औरत। एक आदमी। पास-पास खड़े।
प्राची की धड़कन एक पल को रुक गई।

उसने दोनों अख़बारों को बार-बार मिलाया। दो आकृतियाँ। साफ़-साफ़। कोई धब्बा नहीं, कोई ग़लती नहीं।
"ये... ये कैसे?" वो बुदबुदाई।
फ़्लैटबेड मशीन कोने में खड़ी थी — काली, भारी, ख़ामोश। जैसे कुछ जानती हो और बता न रही हो।
अगली सुबह उसने दोनों अख़बार धनीराम के सामने रख दिए।
धनीराम ने तस्वीरें देखीं — और एक अजीब-सी मुस्कान उसके चेहरे पर आई। "सेठजी कहते थे — मशीन जिसे पसंद करती है, उसकी तस्वीर एक दिन पहले छाप देती है।"
"और आप मानते हैं ये?" प्राची ने हँसने की कोशिश की।
"चालीस साल में मैंने तीन बार देखा है, बिटिया।" धनीराम ने चश्मा उतारा। "तीनों बार..."
"तीनों बार क्या, काका?"
"तीनों बार तस्वीर सच हुई।"
प्राची कुछ न बोली। पर उस शाम उसने अलार्म लगाया — सुबह पाँच बजे का।
भोर का अल्मोड़ा। हल्की धुंध। सनराइज़ पॉइंट पर वो पहुँची — और ठिठक गई।
रेलिंग के पास कोई खड़ा था। एक आदमी — कंधे पर कैमरा, हाथ में स्केचबुक — उगते सूरज की तरफ़ देख रहा था।
"आप भी...?" उसने प्राची को देखकर कहा।
"मैं प्राची — 'पर्वत प्रभात' से।"
"अनय।" वो मुस्कुराया। "दिल्ली से।"
बत्तीस साल का अनय। आँखों में नींद की कमी और चेहरे पर पहाड़ों की ताज़गी — अजीब-सा मेल।
"इतनी सुबह यहाँ?"
"आपके प्रेस के टाइप देखने आया हूँ।" उसने स्केचबुक बंद की। "मैं टाइप डिज़ाइनर हूँ — अक्षर बनाता हूँ। आपके प्रेस का 1928 वाला देवनागरी टाइप... वो ख़ज़ाना है, प्राची जी। मैं उसे डिजिटल फ़ॉन्ट में ढालना चाहता हूँ — ताकि सौ साल पुराने अक्षर फ़ोन की स्क्रीन पर भी जिएँ।"
प्राची की आँखों में कुछ चमका। महीनों बाद कोई ऐसा मिला था जो प्रेस को रद्दी नहीं समझता था। दिल्ली के एक डीलर ने तो पुराने टाइप के वज़न के हिसाब से दाम लगाया था।
"तो आप... अक्षरों को बचाने आए हैं?"
"कह सकते हैं।" अनय ने सूरज की तरफ़ देखा — पहली किरण चोटियों को छू रही थी। "वैसे आज का सूरज भी बुरा नहीं।"
दोनों हँस पड़े। दो आकृतियाँ। तस्वीर जैसी।

उस रात ग्यारह बजे — फ़्लैटबेड ने फिर खाँसा।
कल की तारीख़ वाला अख़बार। पहले पन्ने पर सनराइज़ पॉइंट — दो आकृतियाँ, कल से थोड़ी पास।
प्राची ने अख़बार सीने से लगा लिया।
दिन गुज़रने लगे। कल के अख़बार उसकी कुंडली बन गए — सनराइज़ पॉइंट, फिर लाला बाज़ार की पुरानी गली, फिर प्रेस का अपना दरवाज़ा। हर तस्वीर में दो आकृतियाँ। हर तस्वीर में वो दोनों।
अनय अब रोज़ प्रेस आता। पुराने टाइप साफ़ करता, हर अक्षर की तस्वीर लेता, नोट्स बनाता। उसके हाथ स्याही से काले हो जाते — और प्राची हँसती।
"ये दाग़ नहीं जाएगा," उसने एक शाम कहा।
"जाने भी न दूँ," अनय बोला। "ये इस हफ़्ते की सबसे अच्छी कमाई है।"
एक शाम प्राची ने पूछा, "तुम्हें अक्षरों से इतना प्यार क्यों है?"
अनय ने एक पुराना टाइप उठाया — 'अ'। "हर अक्षर की अपनी आवाज़ होती है, प्राची। ये 'अ' देखो — सौ साल से 'अनार' भी छापता आया है, 'आसमान' भी। मैं बस इनकी आवाज़ को आगे पहुँचाना चाहता हूँ।"
प्राची ने अपने पिता की कुर्सी की तरफ़ देखा। "पापा मशीन से बातें करते थे। मैं हँसती थी।"
"अब?"
"अब लगता है — मशीन भी बातें करती है। बस अख़बार में।"
फिर एक सुबह प्राची ने फ़ैसला किया — आज सनराइज़ पॉइंट नहीं जाऊँगी। देखती हूँ — कल की तस्वीर झूठी होती है या मैं।
पूरा दिन बेचैनी में कटा। रात के ग्यारह बजे मशीन खाँसी।
कल की तारीख़। पहले पन्ने पर सनराइज़ पॉइंट — दो आकृतियाँ।
अगली भोर वो पॉइंट पर थी। और वो वहाँ था — ठंड में पैर पटकता, इंतज़ार करता।
"तुम नहीं आईं..." अनय बोला, "तो मैं रुक गया। सोचा — शायद आज मशीन से ग़लती हो गई।"
प्राची हँस पड़ी — और उसकी हँसी में धुंध भी हिली।
"और अगर मैं सच में न आती?"
"तो मैं अकेला खड़ा रहता — और मशीन झूठी पड़ जाती।" अनय उसके पास आया। "पर तुम आ गईं। अब मशीन सच्ची है।"
सूरज ने चोटियों को छुआ। दो आकृतियाँ — एक हो गईं।
उसके बाद ग्यारह बजे का इंतज़ार उनका त्योहार बन गया। दोनों प्रेस में बैठते — चाय के दो कुल्हड़, ट्यूबलाइट की रोशनी — और मशीन के खाँसने का इंतज़ार करते। जैसे कोई तोहफ़ा खुलने वाला हो।
एक रात तस्वीर में प्रेस का अंदरूनी हिस्सा था — ट्यूबलाइट के नीचे दो आकृतियाँ, बहुत पास।
अनय ने तस्वीर देखी। फिर प्राची को देखा।
"मशीन ने पहले ही छाप दिया," वो धीरे से बोला।
प्राची ने अख़बार एक तरफ़ रखा।
उनके चेहरे क़रीब आए। ट्यूबलाइट की रोशनी में स्याही की खुशबू थी, और दो धड़कनों की आवाज़।
बाक़ी रात प्रेस ने अपने पास रख ली।

सुबह प्रेस के दरवाज़े पर दोनों चाय पी रहे थे। धनीराम आया, दोनों को देखा — और बिना कुछ कहे मुस्कुराता हुआ अंदर चला गया।
"काका को सब पता चल गया," प्राची बोली।
"काका को मशीन ने पहले ही बता दिया होगा," अनय ने कहा। दोनों हँस पड़े।
पर हक़ीक़त दरवाज़े पर खड़ी थी। अनय का काम लगभग पूरा था — दो दिन और। सबसे पुराना टाइप साफ़ होना बाक़ी था, फिर दिल्ली वापसी।
उस रात प्राची चुप थी। अनय ने उसका हाथ थामा — स्याही लगा हाथ, उसके साफ़ हाथ में।
"एक हफ़्ता," वो बोला। "बस एक हफ़्ता और।"
ग्यारह बजे मशीन खाँसी।
कल की तारीख़ वाला अख़बार। पहले पन्ने पर सनराइज़ पॉइंट — दो आकृतियाँ।
प्राची की आँखें चमक उठीं। उसने अख़बार अनय की तरफ़ बढ़ाया।
"मशीन को पहले से पता था।"
अनय मुस्कुराया। "सबसे पुराने टाइप को साफ़ करने में एक हफ़्ता लगेगा। फ़ॉन्ट अधूरा नहीं छोड़ सकता।"
"और उसके बाद?"
"उसके बाद..." अनय ने अख़बार की तस्वीर की तरफ़ देखा — दो आकृतियाँ, उगते सूरज के सामने। "उसके बाद मशीन बताएगी।"
प्राची ने उसका हाथ थाम लिया।
कल का अख़बार आज ही छप जाता है — बस तस्वीर एक दिन पहले आती है। और कुछ तस्वीरें... कुछ तस्वीरें सच होने के लिए ही छपती हैं।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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