जिस रात बरगद ने धागा खोला, उस रात बेरछा गाँव की सारी बत्तियाँ एक साथ बुझ गईं।
सान्या ने अपनी रिकॉर्डर की लाल बत्ती देखी — घुप्प अँधेरे में वही एक जल रही थी, जैसे किसी ने जानबूझकर उसे छोड़ दिया हो।
सत्ताईस साल की सान्या दिल्ली से आई थी — एक डॉक्यूमेंट्री के लिए बुंदेलखंड के सावन के कजरी गीत रिकॉर्ड करने। वो गीत जो औरतें बारिश की पहली फुहार के साथ गाती हैं, और आख़िरी बूँद के साथ भूल जाती हैं।
गाँव के किनारे, तालाब के पार, खड़ा था वो बरगद — चार सौ साल पुराना, इतना फैला कि उसकी छाँह में पूरा मेला लग जाता था।
उसकी हर डाली पर लाल धागे बँधे थे। हज़ारों। हवा में लहराते हुए, बारिश में भीगते हुए — जैसे पेड़ ने सावन की चुनरी ओढ़ रखी हो।
"मनोकामना के धागे हैं," तीस साल के रुद्र ने कहा था, पहली ही शाम। वो गाँव का स्कूल मास्टर था, और सरपंच ने उसी को सान्या का "गाइड" बनाया था। "जो माँगा जाता है, पेड़ रख लेता है।"
"और जो नहीं मिलता?" सान्या ने पूछा था।
रुद्र मुस्कराया था। बारिश की बूँदें उसके चश्मे पर ठहर गई थीं। "उसके लिए पेड़ के पास एक और रिवाज़ है। हर सावन, वो एक धागा खुद खोल देता है।"
"खुद?"
"उस इश्क़ का धागा जो कभी कहा नहीं गया। पेड़ उसे खोलता है, हवा उसे उठाती है — और वो उसी तक पहुँचता है जिसके लिए बाँधा गया था।"
अगले दस दिन सान्या ने गाँव की औरतों के बीच बिताए — कजरी, झूला-गीत, दादियों की लोरियाँ रिकॉर्ड करते हुए। और हर शाम, रिकॉर्डर बंद करके, वो रुद्र के साथ तालाब किनारे बैठती।
वो कम बोलता था। पर उसकी आवाज़ में कोई चुंबक था — सान्या का रिकॉर्डर अपने आप उसकी तरफ़ घूम जाता था।
एक शाम उसने पूछा, "तुमने कभी धागा बाँधा?"
रुद्र ने तालाब के पानी को देखा। "एक बार।"
"किसके लिए?"
"जो लौटी नहीं।"
सान्या ने मज़ाक में बात पलट दी — "तो मैं भी बाँधती हूँ। देखते हैं, पेड़ मेरा धागा खोलता है या नहीं।"
उसने कलाई से लाल धागा निकाला और सबसे निचली डाली पर बाँध दिया। गाँठ लगाते हुए उसके होंठों पर मुस्कान थी, पर उँगलियाँ काँप रही थीं — क्यों, ये वो खुद नहीं जानती थी।
"किसके लिए बाँधा?" रुद्र ने पूछा।
"पता नहीं," उसने कहा। "शायद उस लड़के के लिए जो कभी आया ही नहीं।"
रुद्र ने उसे बहुत देर तक देखा। फिर बोला, "पेड़ नए धागे नहीं खोलता, सान्या। वो सिर्फ़ पुराने खोलता है — जो पक चुके हों।"
उस रात आँधी आई — बरगद की डालियाँ ज़मीन छूने लगीं, हज़ारों धागे पागलों की तरह उड़ रहे थे। सान्या खिड़की से देख रही थी।
तभी बत्तियाँ बुझीं — और उसने देखा।
एक धागा, बाक़ी सबसे अलग: उड़ नहीं रहा था, तैर रहा था — सीधा उसकी खिड़की की तरफ़, जैसे कोई अदृश्य हाथ थामे हो।
सान्या ने खिड़की खोली। धागा अंदर आया और उसके रिकॉर्डर पर ठहरा — ठीक उस लाल बत्ती पर जो अँधेरे में जल रही थी।
धागा पुराना था। रंग उड़ा हुआ, गाँठ ढीली। और उस पर — नौ साल पुरानी स्याही में, बारिशों में धुली हुई, फिर भी पढ़ी जा सकने वाली लिखावट:
"दिल्ली वाली सान्या — लौट आओ।"
नौ साल पहले — अठारह की सान्या दादी के साथ कजरी मेले में आई थी। एक इक्कीस साल के लड़के ने उसे ये बरगद दिखाया था; उसने दादी के फ़ोन पर अपनी ज़िंदगी की पहली रिकॉर्डिंग की थी।
जाते हुए कहा था, "अगले सावन आऊँगी।"
वो कभी नहीं आई — दादी गुज़र गईं, दिल्ली ने उसे निगल लिया।
और वो लड़का —
दरवाज़े पर दस्तक — रुद्र, भीगा हुआ, हाथ में लालटेन, आँखों में पुराना राज़ खुलने का डर।
"पेड़ ने खोला?" उसने पूछा।
सान्या ने धागा उसकी तरफ़ बढ़ाया। "तुमने... नौ साल..."
"मैं हर सावन आता था," रुद्र की आवाज़ टूट रही थी। "देखने — कहीं पेड़ ने खोल तो नहीं दिया। हर साल वो नहीं खुलता था, और मैं ख़ुश होता था... क्योंकि खुलने का मतलब होता — अब वो कभी नहीं आएगी।"
"और इस साल?"
"इस साल तुम खुद आ गईं। पेड़ को खोलना ही था।"
तभी आँधी का एक और झोंका — खिड़की से दूसरा धागा अंदर आया। नया, चमकदार लाल — वही जो सान्या ने मज़ाक में बाँधा था।
वो सीधा रुद्र के पैरों पर गिरा।
पीछे से आवाज़ आई — पंडित दीनदयाल, बयासी साल के दादा, लालटेन लिए।
"दो धागे... एक साथ। पहली बार।"
"इसका मतलब?" रुद्र ने पूछा।
"पेड़ एक धागा खोलता है — जो एक तरफ़ से बँधा हो," पंडित जी मुस्कराए। "दो धागे वो तभी खोलता है, जब दोनों तरफ़ से बँधे हों।"
सान्या ने रुद्र का ठंडा, काँपता हाथ पकड़ा।
"नौ साल," वो बोली। "तुमने इंतज़ार किया?"
"पेड़ ने किया," रुद्र ने कहा। "मैं तो बस रोज़ आकर देख जाता था... कि तुम आईं या नहीं।"
उसने उसके चश्मे से बारिश पोंछी; उँगलियाँ उसके गाल पर ठहर गईं। रुद्र ने उसका चेहरा हाथों में लिया — धीरे, जैसे गाँठ खोलता हो।
उनके होंठ मिले — बारिश की बूँदें, नौ साल का इंतज़ार, सब एक पल में घुल गया।
बारिश ने पर्दा डाल दिया।
उसके बाद सिर्फ़ बारिश की आवाज़ रही। और दो धड़कनें — जो नौ साल से एक-दूसरे को ढूँढ रही थीं।
सुबह चाय की खुशबू से आँख खुली — सान्या बरामदे में थी, रुद्र के कंधे पर सिर रखे, हाथ में कुल्हड़। उसके गले में एक नया लाल धागा था।
"ये कब बाँधा?" उसने पूछा, मुस्कराते हुए।
"जब तुम सो रही थीं," रुद्र बोला। "इस बार पेड़ से पूछकर नहीं — खुद से।"
उसने अपना रिकॉर्डर उठाया। रात भर वो चलता रहा था — आँधी, बारिश, और ठीक तीन बजकर तैंतीस मिनट पर... एक कजरी। किसी बूढ़ी औरत की आवाज़ में।
सान्या के हाथ काँपे। वो आवाज़... दादी की थी।
"रिकॉर्डर तो खिड़की के पास था," वो फुसफुसाई। "वहाँ कोई नहीं था।"
रुद्र ने उसे गले लगाया। "कुछ गीत," उसने कहा, "सिर्फ़ उन्हीं के लिए गाए जाते हैं जो लौट आते हैं।"
एक साल बाद — फिर सावन, फिर मेला। सान्या इस बार रिकॉर्डर लेकर नहीं, दुल्हन के जोड़े में आई थी।
शाम को पंडित दीनदयाल बरगद के नीचे डालियाँ देख रहे थे।
"दादा — इस बार पेड़ ने कोई धागा खोला?"
"इस बार खोलने को कुछ था ही नहीं," बूढ़ा मुस्कराया। "इस सावन पेड़ के पास कोई अधूरी बात नहीं आई।"
सान्या ने ऊपर देखा — सबसे निचली डाली पर दो धागे, एक ही गाँठ में बँधे: एक नौ साल पुराना, एक नया।
हवा चली, और दोनों एक साथ लहराए — जैसे दो हाथ, जो आख़िरकार एक-दूसरे को थाम चुके हों।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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