डिब्बा गलत पते पर पहुँचा था — इस हफ़्ते तीसरी बार।
रुख़सार ने कैंटीन में डिब्बा खोला — अंदर बैंगन का भर्ता था, और रुख़सार को बैंगन से सख़्त नफ़रत थी। ढक्कन की पर्ची पर नाम, पता, कोड — सब उसी के। फिर भी खाना किसी और का था।
"ये डिब्बा-सेवा वाले भी ना," बग़ल वाली डेस्क से तान्या बोली। "कल मेरा डिब्बा चौथे माले पहुँच गया था।"
पर ये पहली बार नहीं था — तीन दिन से उसका डिब्बा रोज़ कहीं और उतर रहा था। और अजीब बात — जब सही डिब्बा लौटकर मिलता, तो खाना कुछ ज़्यादा ही अच्छा लगता था।
उस रात उसने ढक्कन के अंदर एक पर्ची रखी: "मेरा डिब्बा सही पते पर पहुँचाइए। — रुख़सार"
अगली दोपहर डिब्बा सही वक़्त पर, सही डेस्क पर था। अंदर अरहर की दाल, जीरे वाले चावल, और एक छोटी-सी कटोरी में आम का अचार। रुख़सार ने पहला निवाला मुँह में रखा — और उसकी आँखें भर आईं।
ये स्वाद वो जानती थी। नौ साल की उम्र से पहले का स्वाद। अम्मी के हाथ का।
अम्मी — सकीना — रुख़सार के नौवें जन्मदिन के दो महीने बाद चली गई थीं। चेहरा धुँधला पड़ गया था, आवाज़ भूल चुकी थी — पर दाल का ये स्वाद, हल्दी-हींग का वो अनुपात, जैसे कल की बात हो।
उनतीस साल की रुख़सार शेख़ — बांद्रा की एक विज्ञापन एजेंसी में कॉपीराइटर — उस दिन कैंटीन में बैठी, गला भर आया था।
ढक्कन के अंदर एक पर्ची थी — उसी के जैसी, पर दूसरी लिखावट में: "डिब्बा जानता है — कहाँ जाना है।"
रुख़सार ने कैंटीन में इधर-उधर देखा। डिब्बा देने वाला जा चुका था।
नदीम बत्तीस साल का था — बारह साल से चर्चगेट-अंधेरी रूट पर डिब्बे पहुँचाता आया था। उसके हाथ में जो डिब्बा आता, वो सही पते पर ही उतरता। बारह साल में एक भी ग़लती नहीं। उसके उस्ताद कहते थे — "डिब्बा सिर्फ़ खाना नहीं होता, नदीम। किसी का भरोसा होता है।"

पर पिछले हफ़्ते उसके थैले में एक अजीब डिब्बा आया था — पीतल का, पुराना, ढक्कन पर घिसा हुआ "स." खुदा हुआ। चर्चगेट के गुम-नाम सामान वाले ढेर में उसे ये आठ साल पहले मिला था। कोई लेने नहीं आया था। नदीम ने उसे रख लिया था — क्योंकि उसकी अपनी अम्मी के पास भी बिल्कुल ऐसा ही एक डिब्बा था।
उस डिब्बे पर टैग था — "रुख़सार शेख़, अंधेरी।"
पहले दिन नदीम ने उसे सही पते पर पहुँचाया। दूसरे दिन — वो खुद नहीं जानता क्यों — उसका हाथ रुक गया था। डिब्बे के ढक्कन पर एक पर्ची थी: "मेरा डिब्बा सही पते पर पहुँचाइए। — रुख़सार"
और वो "स." — सकीना? नदीम की साँस थम गई थी। उसकी अम्मी का नाम भी तो सकीना ही था।
नहीं — ये इत्तेफ़ाक़ था। पर उस रात नदीम ने बरसों से बंद पड़ी अम्मी की रेसिपी वाली कॉपी निकाली और पहला पन्ना खोला।
अगले दिन रुख़सार ने ढक्कन पर लिखा: "आज का खाना... अम्मी जैसा लगा। तुम कौन हो?"
जवाब आया — छोटी-सी पर्ची, ढक्कन के नीचे दबी हुई: "कोई नहीं। बस डिब्बा पहुँचाने वाला।"
"झूठ," उसने लिखा। "डिब्बा पहुँचाने वाले दाल में हींग का इतना सही अंदाज़ा नहीं लगाते।"
"तुम्हारी अम्मी लगाती थीं," जवाब आया। "मेरी भी।"
रुख़सार की उँगलियाँ काँप गईं। उसने लिखा — "तुम्हारी अम्मी का नाम?"
"सकीना।"
कैंटीन की भीड़, ट्रे की खनक — सब धुँधला गया। रुख़सार ने डिब्बा बंद किया — पहली बार, इतने सालों बाद, किसी अजनबी के हाथ के खाने पर आँखें नम हुई थीं।
ये सिलसिला चल पड़ा। रोज़ दोपहर — एक पर्ची, एक जवाब, एक स्वाद।
रुख़सार लिखती — "आज ऑफ़िस में दिन बुरा गया।" जवाब आता — गर्म फुल्कों के साथ: "बुरे दिन भी गुज़र जाते हैं। दाल गर्म खाना।"
वो लिखती — "तुमने कभी अपनी अम्मी को बताया था — कि तुम उनसे कितना प्यार करते हो?" जवाब — "रोज़ बताता था। आख़िरी दिन भूल गया। अब रोज़ डिब्बों में लिखता हूँ।"
रुख़सार ने उसे कभी देखा नहीं था — डिब्बा ग्यारह बजे आता, वो मीटिंग में होती। एक दिन उसने जानबूझकर ग्यारह बजे कैंटीन में इंतज़ार किया —

— और डिब्बा वहाँ पहले से रखा था। देने वाला जा चुका था। हमेशा की तरह।
बारिश का मौसम आ गया था। एक शाम रुख़सार ने ढक्कन पर लिखा: "कल मैं छुट्टी पर हूँ। डिब्बा मत लाना।"
जवाब नहीं आया। डिब्बा भी नहीं आया। पर शाम को उसके फ़्लैट के दरवाज़े पर एक थैला था — अंदर वही पीतल का डिब्बा, और एक पर्ची: "छुट्टी वाले दिन भी भूख लगती है।"
रुख़सार ने डिब्बा खोला — अंदर अम्मी वाली खिचड़ी थी, घी में तली हुई। और ढक्कन के अंदर — एक छोटा-सा काग़ज़: "ये डिब्बा तुम्हारा है, रुख़सार।"
उसका दिल धड़क उठा। उसने पलटकर लिखा — "मतलब?"
जवाब अगले दिन आया — सिर्फ़ तीन लफ़्ज़: "कल गेट पर।"
अगली सुबह वो ऑफ़िस नहीं गई। बिल्डिंग के गेट पर, बारिश में छाता लिए, वो ग्यारह बजे से खड़ी थी।
ग्यारह बजकर दस मिनट पर एक साइकिल आई — पीछे डिब्बों का थैला। साइकिल वाला बत्तीस-तैंतीस का, साँवला। उसने थैले से एक डिब्बा निकाला — पीतल का, पुराना।
रुख़सार सामने आ गई। "नदीम?"
वो ठिठक गया। "आप... यहाँ?"
"ये डिब्बा," रुख़सार की आवाज़ काँप रही थी, "ये मेरी अम्मी का है। ढक्कन पर 'स.' खुदा है — सकीना। बीस साल पहले घर बदलते वक़्त खो गया था। तुम्हें कहाँ से मिला?"
नदीम ने डिब्बा उसकी तरफ़ बढ़ाया। "चर्चगेट के गुम-नाम ढेर में — आठ साल पहले। कोई लेने नहीं आया। मैंने रख लिया।" वो रुका। "परसों जब तुम्हारी पर्ची पढ़ी — 'मेरा डिब्बा सही पते पर पहुँचाइए' — और टैग पर नाम देखा — रुख़सार शेख़ — तो..." उसकी आवाज़ भर आई। "डिब्बे घर लौट आते हैं, रुख़सार। बस कोई उन्हें पहचानने वाला चाहिए।"
"और गलत पते?" रुख़सार ने पूछा। "तीन दिन डिब्बा गलत जगह क्यों गया?"
नदीम हल्का हँसा — शर्मीली हँसी। "वो ग़लती नहीं थी। मैं डर गया था। इतने सालों बाद डिब्बा अपनी मालकिन के घर जा रहा था — मैंने तीन दिन उसे घुमाया, ताकि..." वो नज़रें झुकाए बोला, "ताकि वापसी थोड़ी लंबी हो।"
बारिश तेज़ हो गई थी — दोनों शेड के नीचे आ गए। रुख़सार ने डिब्बा थामा — बीस साल बाद, अम्मी के हाथ का निशान लिए, हल्का गर्म।
"तुमने मेरी अम्मी का खाना कैसे बनाया?" उसने धीरे से पूछा। "वो स्वाद... बिल्कुल वैसा..."
"मेरी अम्मी भी सकीना थीं," नदीम बोला। "और शायद सारी अम्मियाँ एक ही रसोई में सीखती हैं — वो रसोई जो किताबों में नहीं होती।"
वो एक-दूसरे के क़रीब थे — इतने कि बारिश की बूँदें उनके बीच से गुज़र रही थीं। नदीम ने उसके गाल से पानी की एक बूँद पोंछी — हल्के से, जैसे कोई कीमती चीज़ छूता है। रुख़सार ने आँखें बंद कर लीं।
बाक़ी बारिश ने अपने पास रख ली।

सुबह रुख़सार ने डिब्बा खोला। खाने के अलावा, ढक्कन के अंदरूनी हिस्से पर, "स." के नीचे, नई खरोंच से लिखा था:
"अब घर।"
और नीचे — छोटी-सी पर्ची: "कल से डिब्बा सही वक़्त पर आएगा। देने वाला भी साथ आएगा — अगर इजाज़त हो।"
रुख़सार मुस्कुराई। उसने पर्ची पलटी और लिखा — सिर्फ़ दो लफ़्ज़:
"इजाज़त है।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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