रात के दो बजकर सैंतालीस मिनट पर, तानसेन संगीत विद्यालय के बंद कमरे में सारंगी ख़ुद बज उठी।
कोई हाथ नहीं थे — तारों पर कोई उँगली नहीं। फिर भी ठुमरी की वो पुरानी धुन कमरे में तैरने लगी, जैसे चाँदनी खिड़की से उतरकर फ़र्श पर बैठ गई हो। चौकीदार ने दीये की लौ के सामने हाथ जोड़े — ये रोज़ का तमाशा था, पिछले चालीस साल से।
तीस साल की नियति दिल्ली से ग्वालियर आई थी — साउंड आर्काइव की रेस्टोरर। उसका काम था 1940 के दशक के शेलैक रिकॉर्ड्स को डिजिटल करना, जो इस डेढ़ सौ साल पुराने संगीत विद्यालय की अलमारी में धूल खा रहे थे। विद्यालय की मरम्मत चल रही थी; सरकार इसे दोबारा खोलना चाहती थी।
"ये सारंगी..." नियति ने पहले ही दिन पूछा था, शीशे की अलमारी में रखे पुराने साज़ की तरफ़ इशारा करके।
"उस्ताद फ़िरोज़ ख़ान की," चौंतीस साल के आदित्य ने कहा था। वो वाद्य-मरम्मत का कारीगर था — टूटे सितार, फटे तबले, बेसुरी सारंगियाँ, सब उसके हाथों में दोबारा साँस लेते थे। "1947 के बाद इस कमरे में किसी ने इसे हाथ नहीं लगाया। पर रात को..."

"रात को क्या?"
आदित्य मुस्कुराया — वो मुस्कुराहट जो राज़ छिपाती है। "आप ख़ुद सुन लीजिएगा। ग्वालियर में आधी रात को 'मधी रात' कहते हैं — और मधी रात को यहाँ संगीत होता है।"
पहली रात नियति गेस्ट रूम में थी, जब दो बजकर सैंतालीस मिनट पर नींद खुली। धुन खिड़की के उस पार से आ रही थी — संगीत कक्ष से। वो दबे पाँव गई। दरवाज़ा बंद था, ताला लगा था। और अंदर — सारंगी बज रही थी।
सुबह उसने आदित्य को पकड़ा। "ताला लगा था! अंदर कोई नहीं था!"
"मैं जानता हूँ," आदित्य ने कहा। "बचपन से सुन रहा हूँ। मेरे दादा इस विद्यालय के चौकीदार थे। हमारी दीवार उस कमरे से सटी थी। दादा कहते थे — 'ये सारंगी जिसका इंतज़ार कर रही है, वो आएगा। तब ये पूरी बजेगी।'"
"पूरी? मतलब?"
"सुनिएगा ध्यान से। धुन हमेशा एक ही जगह रुकती है — अंतरे से ठीक पहले। जैसे कोई साँस रोककर रह गया हो।"
उस शाम दोनों रिकॉर्ड्स की अलमारी साफ़ कर रहे थे। धूल भरे शेलैक डिस्क, पीले पड़े लेबल, टूटी सुइयाँ। नियति ने एक डिस्क उठाई — उस पर ख़ूबसूरत उर्दू ख़त में कुछ लिखा था।
"आपको संगीत से इतना लगाव क्यों है?" नियति ने पूछा, कपड़े से डिस्क पोंछते हुए।
आदित्य ने एक पुराना फ़ोटो दिखाया — दीवार से सटी कोठरी के सामने खड़ा एक बूढ़ा, हाथ में झाड़ू। "दादा। आख़िरी दिनों में वो रात को इस कमरे के बाहर बैठे रहते थे। कहते थे — 'जिस रात ये धुन पूरी बजेगी, उस रात मैं चैन से सोऊँगा।' वो सोए — पर धुन अधूरी ही रही।"
तीन रातें नियति ने वो अधूरी ठुमरी सुनी। चौथी रात उसने अपना रिकॉर्डर चालू रखा। सुबह उसने धुन को बार-बार सुना — और उसके रोंगटे खड़े हो गए।
ये धुन वो जानती थी।
बिना बोल की लोरी — जो उसकी दादी मालती उसे बचपन में सुनाती थीं, थपकी देते हुए। दादी कहती थीं — "ये मेरे पहले घर की धुन है, बिटिया। ग्वालियर की।"
नियति के हाथ काँपने लगे। उसने लेबलों का बंडल खँगाला। एक लेबल पर लिखा था — "ठुमरी — गायिका: मालती देवी, सारंगी: उस्ताद फ़िरोज़ ख़ान, रिकॉर्डिंग तिथि: 15 अगस्त 1947।" और नीचे लाल स्याही में — "रिकॉर्डिंग नहीं हुई।"
पुराने अख़बारों के बंडल में उसे वो रात मिल गई। 14 अगस्त 1947 — बँटवारे की आँधी ग्वालियर तक पहुँच गई थी। शहर में आग थी, सड़कों पर डर। मालती देवी को उसी रात शहर छोड़ना पड़ा — हमेशा के लिए। रिकॉर्डिंग कभी नहीं हुई।

उस्ताद फ़िरोज़ ख़ान हर रात दो बजकर सैंतालीस मिनट पर — वही वक़्त जब रिकॉर्डिंग होनी थी — वो अधूरी ठुमरी बजाते रहे, सारी उम्र। कहते थे — "जिस रात ये पूरी बजेगी, मेरा इंतज़ार ख़त्म।"
उस्ताद 1985 में गए। पर सारंगी नहीं रुकी।
नियति ने आदित्य को रिकॉर्डर सुनाया। आदित्य का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "ये... ये वही धुन है जो मेरे दादा गुनगुनाते थे। उन्होंने उस्ताद से सीखी थी — सारंगी वाला हिस्सा। मेरे पिता ने मुझसे कहा था — 'ये हिस्सा कभी ख़त्म मत होने देना।'"
दोनों की नज़रें मिलीं। दो घराने, एक अधूरी धुन — और दादी की लोरी में छिपा अंतरा।
"आपकी दादी ने आपको अंतरा सिखाया?" आदित्य ने धीरे से पूछा।
"बिना बोल का," नियति बोली, गला भर आया। "पर सुर... सुर मुझे याद हैं। दादी कहती थीं — 'बिटिया, इस धुन का आख़िरी हिस्सा सिर्फ़ हमारे घर की औरतों को आता है।'"
मरम्मत के आख़िरी दिन की रात थी। चाँदनी संगीत कक्ष की ऊँची खिड़कियों से उतर रही थी। उस्ताद की सारंगी अपने स्टैंड पर थी — चालीस साल से जिसे किसी हाथ ने नहीं छुआ था। चौकीदार ने, पहली बार, कमरे का ताला खोला — "आज रात... आज ये कमरा आपका है।"
नियति ने आँखें बंद कीं — और गाया।
वो लोरी, वो अंतरा — दादी की थपकी वाली धुन, अब पूरी आवाज़ में, चाँदनी में घुलती हुई। आदित्य ने अपनी मरम्मत की हुई सारंगी उठाई — उस्ताद वाली को उसने छुआ तक नहीं — और दादा वाला हिस्सा बजाया। सुर इतने सधे थे, जैसे चालीस साल से इसी रात का रियाज़ हो।
और तभी — स्टैंड पर रखी उस्ताद की सारंगी के तार ख़ुद हिलने लगे।
तीन आवाज़ें, एक ठुमरी। अस्सी साल का इंतज़ार, एक कमरे में पूरा। चाँदनी फ़र्श पर थिरक रही थी। नियति की आँखों में आँसू थे, आदित्य के हाथ काँप रहे थे — पर एक सुर भी नहीं डगमगाया।
धुन जब आख़िरी सुर पर ठहरी, तो कमरे में वो सन्नाटा था — जो सिर्फ़ पूरी हुई चीज़ों के बाद होता है।
आदित्य ने सारंगी रखी। नियति उसके इतना क़रीब आई कि चाँदनी दोनों के चेहरों पर एक-सी पड़ने लगी। उसने नियति के गाल को छुआ — धीरे, जैसे कोई पुराना रिकॉर्ड उठाता है, टूटने के डर से।

उनके होंठ मिलने ही वाले थे —
बाक़ी रात सिर्फ़ चाँदनी जानती है।
सुबह जब चौकीदार ने संगीत कक्ष खोला, तो उस्ताद की सारंगी के तार ढीले पड़े थे — जैसे किसी ने बरसों का बोझ उतार दिया हो। वो फिर कभी नहीं बजी।
नियति ने दिल्ली वापसी का टिकट रद्द कर दिया। विद्यालय फिर खुलेगा — और पहले दिन की पहली छात्रा वो ख़ुद होगी, आदित्य से सारंगी सीखने वाली। दादी की लोरी अब किताबों में नहीं, ज़िंदा गलों में रहेगी।
कहते हैं, कुछ राग पूरे होने के लिए बरसों इंतज़ार करते हैं — और कुछ दिल भी।
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