मिट्टी के दो हाथ
भोर के साढ़े पाँच बजे चाक अपने आप घूम रहा था — और उस पर कोई नहीं बैठा था।
देव दहलीज़ पर ठिठक गया। गीली मिट्टी का लोंदा चाक पर नाच रहा था, ऊपर उठता हुआ — जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उसे छू रखा हो।
उसने रात को चाक पर मिट्टी रखी थी, सोचा था सुबह गढ़ेगा। पर ये... ये तो खुद गढ़ रही थी।
मिट्टी ऊपर उठी, फैली, और दो प्यालों में बँट गई — जुड़वाँ प्याले, होंठ से होंठ जुड़े हुए। देव की साँस अटक गई।
दादाजी की नोटबुक का वो पन्ना याद आया, जिसे वो दस साल से नहीं पलटा था: "भोर की मिट्टी झूठ नहीं बोलती।"
और कल शाम से उसके ज़ेहन में सिर्फ़ एक चेहरा था — वो मुंबई वाली लड़की, जो कल दोपहर उसकी दहलीज़ पर आकर खड़ी हो गई थी।
अनाया उनतीस की थी — मुंबई की आर्किटेक्ट, कच्छ की मिट्टी-वास्तुकला पर रिसर्च के लिए आई थी। भुज से एक घंटे की दूरी पर, सफ़ेद रण के किनारे बसे इस गाँव में वो तीन हफ़्तों से डेरा डाले थी।
"मैं अनाया। डिज़ाइन फाउंडेशन से — कच्छ के क्राफ्ट क्लस्टर पर किताब बन रही है।" उसने कैमरा नीचे किया था। "आपके आँगन की तस्वीरें चाहिए थीं — ये भुंगी, ये चाक..."
"तस्वीरें ले लो," देव ने कहा था — चौंतीस का कुम्हार, हाथ मिट्टी में सने। "पर छूना मत कुछ।"
वो हँसी थी — खुली, बेपरवाह। "मिट्टी छूने से डरते हो, कुम्हार?"
"मिट्टी से नहीं," उसने कहा था। "भोर से।"
तीन दिन वो आती रही — सुबह आँगन की रोशनी नापती, दोपहर छाँव में बैठकर स्केच बनाती, शाम को चाय के बहाने रुक जाती।
देव ने देखा — वो मिट्टी को देखती थी जैसे कोई पुराना गीत सुन रहा हो।
चौथी शाम वो चाक के पास बैठ गई। "एक बार... बस छूने दो?"
"मना किया था।"
"कुम्हार होकर मिट्टी से इतना डर — ये कैसी बात?" उसने हथेली बढ़ा दी।
देव ने कुछ नहीं कहा। उसने उसका हाथ पकड़ा — धीरे से, जैसे मिट्टी पकड़ता है — और चाक पर रख दिया।
चाक घूमा — पानी-सा चिकना, बिना एक अटकन। गीली मिट्टी उसकी उँगलियों के नीचे साँस लेने लगी।
देव का चेहरा बदल गया। दस साल में चाक ने किसी और के हाथ में ऐसा नहीं गाया था।
"देखा?" अनाया की आँखें चमक रही थीं। "डरने की कोई बात नहीं।"
"तुम्हें नहीं पता," वो फुसफुसाया, "तुमने अभी क्या किया।"
उस रात देव ने दादाजी की नोटबुक निकाली — चमड़े की जिल्द, पन्ने पीले।
"भोर की मिट्टी झूठ नहीं बोलती। जिसके बारे में सोचकर हाथ चलाओ, मिट्टी उसी का हाथ बना देती है।"
अगला पन्ना: "चाक उसी के हाथ में गाता है, जिसे मिट्टी ने चुन लिया हो।"
और आख़िरी पन्ना, काँपती लिखावट में: "मैंने छोड़ा था। उम्र भर पछताया। जो मिट्टी चुन ले, उसे थाम लेना — छोड़ना नहीं।"
देव ने नोटबुक बंद कर दी। बाहर चाँदनी में जुड़वाँ प्याले सूख रहे थे — होंठ से होंठ जुड़े।
कल शाम से उसके ज़ेहन में सिर्फ़ अनाया थी। मिट्टी ने सुन लिया था।
अगले दिन अनाया शेड में घुसी — "ये कपड़े में लिपटा क्या है?"
"मत छूओ—" पर देर हो चुकी थी। कपड़ा सरका, और निकला एक प्याला — अकेला, गर्दन झुकी हुई, अंदर एक उँगली का निशान।
"दादाजी का आख़िरी बर्तन," देव ने धीरे से कहा। "तीस साल से बिना बिका, बिना छुआ।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये किसी के लिए बना था — और वो कभी आई नहीं।" वो रुका। "एक गायिका थीं। गाँव में तीन रात रुकी थीं। दादाजी ने भोर में ये प्याला गढ़ा — उनके बारे में सोचकर। मिट्टी ने उनका हाथ बना दिया। पर दादाजी ने देने की हिम्मत नहीं की।"
अनाया ने प्याला ध्यान से देखा — अंदर उँगली का निशान, जैसे कोई छूकर गया हो।
"और नोटबुक में लिखा — 'मैंने छोड़ा था'?"
देव ने हामी भरी। "उम्र भर हर भोर वो इसी शेड में आते थे। कहते थे — मिट्टी ने चुन लिया था, पर मैंने थामने की हिम्मत नहीं की।"
उस शाम अनाया नहीं गई। वो आँगन में बैठी रही, जब तक तारे नहीं निकले।
"देव," उसने कहा, "तुम्हें डर किस बात का है? मिट्टी से — या मुझसे?"
उसने जवाब नहीं दिया। बस भट्ठी में लकड़ी डाली, और आग की रोशनी में उसका चेहरा तमतमा उठा।
"कल सुबह," वो बोला, "भोर में आना। चाक पर बैठना — मेरे साथ।"
"क्यों?"
"क्योंकि अकेले बैठा, तो मिट्टी फिर तुम्हारा हाथ बनाएगी।" वो रुका। "और मैं अब छिपना नहीं चाहता।"
भोर के पाँच बजे — आँगन में धुंध, रण की ओर से ठंडी हवा।
अनाया चाक पर बैठी। देव उसके पीछे — उसके हाथों पर अपने हाथ।
चाक घूमा। मिट्टी उठी — चार हाथों के बीच, एक साँस की तरह।
जो बना, वो पहले कभी नहीं बना था — एक सुराही, दो गर्दनों वाली, दोनों गर्दनें एक-दूसरे की ओर झुकीं, होंठ बस छूने को।
अनाया की साँस थम गई। देव के हाथ उसके हाथों पर काँप रहे थे।
"ये..." वो बोली, "ये तो—"
"हम हैं," उसने कहा। और पहली बार, उसने छिपाया नहीं।
दिन भर भट्ठी जली। शाम को जब बर्तन निकला — एक भी दरार नहीं।
भट्ठी की आग के सामने वो दोनों खड़े थे — सुराही बीच में, आग की रोशनी दोनों चेहरों पर।
अनाया ने उसकी ओर देखा। देव ने उसकी ओर।
चेहरों के बीच बस एक साँस का फ़ासला था —
तभी भट्ठी की घंटी बजी — पकाव पूरा। दोनों हँस दिए, और वो हँसी आग से भी गर्म थी।
उस रात तारे रण पर उतर आए थे। देव ने जुड़वाँ प्याले — वही, जो उस भोर को खुद बने थे — धोकर रखे।
"ये तुम्हारे लिए बने थे," उसने कहा। "उस रात मैं तुम्हारे बारे में सोचता रहा था। मिट्टी ने पहले चुन लिया था — मैंने बस थामने में देर की।"
अनाया ने प्याला उठाया — होंठ से होंठ जुड़े दो प्याले। "तो अब?"
"अब देर नहीं।" उसने उसका हाथ थामा — मिट्टी सने हाथ से, धीरे से, जैसे सबसे नाज़ुक बर्तन थामते हैं।
वो झुका — और इस बार बीच में कोई बूँद नहीं गिरी, कोई घंटी नहीं बजी।
उसके होंठ उसके माथे को छू गए — धीरे, जैसे मिट्टी को पहली बार छूते हैं।
फिर रात ने अपनी चादर तान दी — और कहानी सुबह तक सो गई।
भोर हुई — रण पर सोना बिखरा था। आँगन में दो प्यालों में चाय — जुड़वाँ प्याले, होंठ से होंठ जुड़े।
देव ने एक प्याला अनाया की ओर बढ़ाया। उसने लिया — और उसकी उँगलियाँ उसकी उँगलियों पर ठहर गईं।
"मुंबई की फ्लाइट?" उसने पूछा।
"तीन हफ़्ते और," अनाया मुस्कुराई। "किताब अधूरी है — और कोई मुझे भोर की चाय पिलाने वाला भी चाहिए।"
देव हँसा — दस साल में पहली बार इतना खुलकर। "मिट्टी के दो हाथ — और दो हाथ चाय के।"
दूर रण पर सूरज उठ रहा था। चाक आँगन में खड़ा था — ख़ामोश, पर जैसे मुस्कुरा रहा हो।
कहते हैं, उस गाँव में अब भी भोर की मिट्टी झूठ नहीं बोलती। और कहते हैं — जो मिट्टी चुन ले, उसे थाम लेना चाहिए। छोड़ना नहीं।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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