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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

नगाड़े की आख़िरी थाप

उस रात नगाड़ा ख़ुद बजा।

तेजस की डंडियाँ उसके हाथ में ही थीं, मगर थाप किसी और हाथ की थी — धीमी, भारी, और ठीक उतनी ही जानी-पहचानी जितनी दादी की कोई भूली हुई लोरी।

कोटा के पुराने शहरपाना दरवाज़े पर वो नगाड़ा तीन सौ साल से टंगा था। आदमी से बड़ा, ताँबे की देग जैसा गोल, और उसकी खाल पर सूरज की हर शाम की परछाईं जमी हुई थी। तेजस, तैंतीस साल का, चौथी पीढ़ी का नगाड़ची था — उसके परदादा ने इसी दरवाज़े पर अंग्रेज़ों के ज़माने में थाप दी थी।

शहरपाना दरवाज़े पर टंगा तीन सौ साल पुराना नगाड़ा

हर शाम सूरज डूबने से ठीक दस मिनट पहले वो सीढ़ियाँ चढ़ता, डंडियाँ दोनों हाथों में तौलता, और नगाड़े को "जगाता"।

"ये बजता नहीं है," वो नए लोगों से कहता, "ये बोलता है। बस सुनने वाला चाहिए।"

उस अक्टूबर की शाम सुनने वाली आ गई।

रिया — अट्ठाईस साल की, पुणे से आई साउंड आर्काइविस्ट — दरवाज़े के नीचे रिकॉर्डर ताने खड़ी थी। उसका काम था मरते हुए लोक-वाद्यों की आवाज़ें सहेजना।

"मैं सिर्फ़ रिकॉर्ड करूँगी," उसने कहा। "आपको कुछ बदलना नहीं होगा।"

तेजस मुस्कुराया। "बदलना तो ये ख़ुद बदलता है। आज देख लेना।"

सूरज चंबल के उस पार डूबा। पहली थाप गूँजी — दरवाज़े की ईंटें काँपीं, कबूतरों का झुंड एक साथ उड़ा।

नगाड़े की खाल पर डंडी

रिया के रिकॉर्डर की सुई लाल निशान पर नाचने लगी।

तीसरी थाप के बाद तेजस रुका — और तभी नगाड़े की खाल के भीतर से जवाब आया।

धम्म... धम्म-धम्म... धम्म...

वो थाप उसने नहीं बजाई थी।

रिया की आँखें फैल गईं। "ये... ये आपने बजाया?"

तेजस ने डंडियाँ नीचे रख दीं। "नहीं। ये इसकी अपनी थाप है। कुछ शामों को ये ख़ुद बोलता है।"

"मतलब?"

"मतलब," तेजस ने नगाड़े की खाल पर हथेली रखी, "चमड़ा पुरानी थापें भूलता नहीं। जो इस पर एक बार बजा, वो इसमें हमेशा के लिए रह जाता है।"

उस रात रिया सो नहीं सकी। होटल के कमरे में उसने रिकॉर्डिंग बार-बार सुनी। वो "जवाबी थाप" — धीमी, जैसे कोई बारात बहुत दूर से आ रही हो, या बहुत दूर जा रही हो।

अगली शाम वो जल्दी पहुँची। तेजस उसे दरवाज़े के ऊपर वाले कमरे में ले गया, जहाँ लोहे के संदूक में बही-खाते रखे थे — तीन सौ साल के रजिस्टर, हर शाम की थाप का हिसाब।

"परदादा लिखते थे," तेजस ने एक पन्ना खोला। "कब क्या बजा, क्यों बजा।"

रिया की उँगलियाँ 1944 के पन्ने पर ठहरीं। स्याही फीकी पड़ चुकी थी, मगर अक्षर साफ़ थे:

"सावन सुदी तीज। ठाकुर साहब की बिटिया की बारात इसी द्वार से निकली। ब्याह की थाप बजाई।"

अगले पन्ने पर सिर्फ़ एक पंक्ति थी, काँपते हाथ से लिखी:

"आज के बाद ब्याह की थाप नहीं बजेगी।"

"क्यों?" रिया ने पूछा।

तेजस खिड़की से चंबल की ओर देखने लगा। "बारात लौटी नहीं। सावन की बाढ़ में चंबल ने रास्ता निगल लिया। पूरी बारात — दूल्हा, बाराती, बाजे वाले। मेरे परदादा ने उस शाम थाप दी थी। उसके बाद उन्होंने कभी ब्याह की थाप नहीं बजाई। कहते थे — थाप अधूरी रह गई।"

रिया के हाथ काँपने लगे। उसने अपना फ़ोन निकाला, एक पुरानी रिकॉर्डिंग चलाई — उसकी दादी की आवाज़, बचपन में सुनाई लोरी का एक टुकड़ा।

वही धुन। वही थाप का लहजा।

"मेरी दादी," रिया की आवाज़ भर्रा गई, "कहती थीं — उनकी सहेली की बारात इसी दरवाज़े से निकली थी। वो खुद दुल्हन की सहेली थीं। उस रात वो यहीं खड़ी रहीं, बारात के लौटने का इंतज़ार करती रहीं। बारात नहीं लौटी। दादी हर तीज को यहाँ आती थीं... चुपचाप... और लौट जाती थीं।"

तेजस ने रजिस्टर का वो पन्ना फिर देखा। नीचे छोटे अक्षरों में सहेलियों की सूची थी —

पहला नाम रिया की दादी का था।

दोनों के बीच एक लंबी ख़ामोशी उतर आई। नगाड़ा ऊपर अँधेरे में चमक रहा था, जैसे कोई बूढ़ा गवाह।

"तो ये जवाबी थाप..." रिया ने धीरे से कहा।

"ब्याह की थाप है," तेजस ने पूरा किया। "अधूरी वाली। अस्सी साल से ये नगाड़ा हर शाम उसे पूरा करने की कोशिश करता है।"

अगले दिन नगर निगम का नोटिस आया — नगाड़े को संग्रहालय में शिफ्ट करने का आदेश।

तेजस ने नोटिस एक ओर रख दिया। "ये नगाड़ा यहाँ से हिला, तो थाप हमेशा के लिए मर जाएगी।"

रिया ने उसका हाथ थामा — पहली बार, बिना सोचे। "तो हम इसे मरने नहीं देंगे।"

"कैसे?"

रिया की आँखों में वो चमक थी जो सिर्फ़ उन लोगों में होती है जिन्हें कोई धुन सोने नहीं देती। "अधूरी थाप को पूरा करके।"

उसने अपनी दादी की लोरी की रिकॉर्डिंग तेजस को सुनाई — बार-बार, जब तक वो थाप उसकी उँगलियों में न उतर गई। ब्याह की थाप — धम्म... धम्म-धम्म... धम्म — वही लहजा, वही रफ़्तार, जो नगाड़ा हर शाम ख़ुद बजाता था।

"परदादा ने लिखा था — 'आज के बाद ब्याह की थाप नहीं बजेगी'," तेजस ने कहा। "मैं उसे तोड़ूँगा। अस्सी साल बाद, इसी दरवाज़े पर, ब्याह की थाप बजेगी।"

तीज की शाम को उन्होंने तैयारी की।

तेजस ने शहर के बूढ़े बाजे वालों को बुलाया — ढोलक, ताशा, बाँकिया। रिया ने दरवाज़े के दोनों ओर मशालें लगवाईं। और ठीक सूरज डूबने से दस मिनट पहले, तेजस ने वो किया जो उसके ख़ानदान में अस्सी साल से किसी ने नहीं किया था।

उसने ब्याह की थाप बजाई।

धम्म... धम्म-धम्म... धम्म...

पहली बार जवाब नहीं आया। नगाड़ा ख़ामोश रहा, जैसे साँस रोके सुन रहा हो।

तेजस ने फिर बजाया — इस बार रिया की दादी की लोरी की धुन के साथ, धीमी और पूरी।

और तभी दरवाज़े की गूँज में कुछ बदला। नगाड़े की खाल काँपी — और अंदर से, अस्सी साल पुरानी थाप ने जवाब दिया। दोनों थापें मिलीं, गूँथीं, और एक हो गईं।

नीचे खड़े बाजे वालों ने अनायास ही साथ दे दिया। मशालों की रोशनी में दरवाज़ा जैसे जाग उठा। रिया ने अपनी दादी की तस्वीर चौखट पर रखी — जिसमें दादी दुल्हन की सहेली के जोड़े में मुस्कुरा रही थीं।

"दादी," रिया ने धीरे से कहा, "बारात लौट आई।"

तेजस बजाता रहा — पसीना, धड़कन, और अस्सी साल का इंतज़ार सब उस थाप में था। आख़िरी थाप पर उसने डंडियाँ हवा में उठाईं और रोक दीं।

सन्नाटा।

फिर नगाड़े के भीतर से एक आख़िरी गूँज आई — धम्म — गहरी, पूरी, संतुष्ट। जैसे किसी ने लंबी साँस छोड़कर कहा हो: बस।

दरवाज़े की छत पर तेजस और रिया

वो "जवाबी थाप" उस रात के बाद फिर कभी नहीं बजी।

मशालों की रोशनी में तेजस ने डंडियाँ नीचे रखीं। रिया उसके पास आई। दोनों के हाथ एक साथ डंडियों पर पड़े — और इस बार कोई नहीं हटा।

दरवाज़े की छत पर, चंबल की हवा में, दोनों देर तक खड़े रहे। नीचे शहर सो रहा था, ऊपर तारे थे, और बीच में वो नगाड़ा — अब ख़ामोश, अब पूरा।

बाक़ी रात सिर्फ़ नगाड़े की गूँज जानती है।

अगली सुबह अफ़सर आए। तेजस ने उन्हें रजिस्टर दिखाया, रिया ने रिकॉर्डिंग सुनाई। आदेश वापस हो गया — नगाड़ा वहीं रहेगा, जहाँ तीन सौ साल से है।

रिया का काम पूरा हो गया था, मगर वो रुकी रही। हर शाम वो दरवाज़े पर आती — अब रिकॉर्डर नहीं, सिर्फ़ अपने कानों के साथ।

और हर शाम, सूरज डूबने से ठीक दस मिनट पहले, तेजस नगाड़ा जगाता।

कुछ थापें अधूरी रह जाती हैं — जब तक कोई उन्हें पूरा न कर दे।

नगाड़ा सिर्फ़ वक़्त नहीं बताता। वो इंतज़ार भी बताता है।

[समाप्त — Raat Ke Afsane]


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