नैना का बादल
उस सुबह चेरापूंजी में धूप खिली थी — सिर्फ़ नैना के सिर के ऊपर एक बादल था।
तीस साल की नैना खासी पहाड़ियों में ऑर्किड पर रिसर्च करती थी — उन धुंध भरे जंगलों में जहाँ बादल अक्सर ज़मीन पर उतर आते हैं। पर उसका बादल सबसे अलग था। छोटा-सा, गोल-मटोल, हमेशा उससे ठीक दस फ़ीट ऊपर तैरता हुआ। धूप में वो उसकी छतरी बन जाता; और बारिश... बारिश तो उस पर हमेशा ही होती थी।
गाँव वाले उसे "बादल वाली" कहते थे। बच्चे उसके पीछे दौड़ते — उसके दो मीटर के घेरे में घुसकर भीगने के लिए। क्योंकि घेरे के बाहर धूप होती थी, और घेरे के अंदर सिर्फ़ उसी की बारिश।
ये कहानी तेईस साल पुरानी थी। सात साल की नैना जंगल में भटक गई थी — अचानक आए तूफ़ान में। अँधेरा, फिसलन, डर। तभी तूफ़ान से एक छोटा-सा बादल अलग हुआ, उसके ऊपर ठहरा — छतरी की तरह — और धीरे-धीरे गाँव की ओर बहने लगा। नैना उसके पीछे चली। घर पहुँच गई।
उस दिन के बाद बादल कभी नहीं गया। गाँव के बुज़ुर्ग कहते — "बादल ने उसे चुन लिया।"
पर चुनाव की क़ीमत भी थी। बादल घाटी नहीं छोड़ सकता था। अठारह की उम्र में जब नैना शिलॉन्ग दाख़िले के लिए निकली, बादल घाटी के मुहाने पर रुक गया — और ख़ुद को बरसाकर हल्का करने लगा, जैसे कह रहा हो — मत जाओ। नैना लौट आई। उसके बाद दो फ़ेलोशिप के ख़त आए। दोनों का जवाब "न" गया।
और फिर एक दिन कबीर आया।
तैंतीस साल का कबीर पुणे से आया था — एटमॉस्फ़ेरिक फ़िज़िसिस्ट, किसी क्लाइमेट इंस्टीट्यूट की फ़ंडिंग पर। साथ में इंस्ट्रूमेंट्स, सेंसर, और एक ड्रोन। "परसिस्टेंट लोकलाइज़्ड ऑरोग्राफ़िक अनॉमली" — उसने अपने प्रपोज़ल में लिखा था। गाँव वालों ने पढ़ा और हँस दिए — "साहब, हमारी बादल वाली को नापने आए हैं।"
पहली मुलाक़ात लिविंग रूट ब्रिज पर हुई। कबीर ने ड्रोन उड़ाया — बादल की 3D मैपिंग के लिए। बादल ने ड्रोन को देखा... और खिसक गया। दाएँ। बाएँ। ऊपर। ड्रोन हर बार चूकता, बादल हर बार बचता — जैसे कोई शरारती बच्चा आँख-मिचौली खेल रहा हो।
कबीर का मुँह खुला रह गया। "ये... ये तो इम्पॉसिबल है।"
"चेरापूंजी में इम्पॉसिबल की स्पेलिंग अलग है, डॉक्टर साहब," नैना ने हँसकर कहा। वो पहली बार किसी अजनबी से अपने बादल पर हँस रही थी।
कबीर बिमला दी के होमस्टे में ठहरा। दिन में वो सेंसर लगाता, शाम को नैना के साथ चाय पीता। वो नापता, वो चिढ़ाती।
"तुम्हारा बादल आज कितना पानी बरसाएगा?" वो पूछता।
"जितना उसका मूड," वो कहती। "आज वो खुश है — देखो, हल्की फुहार।"
"बादलों का मूड नहीं होता, नैना।"
"तो फिर तुम्हारा ड्रोन उससे हार क्यों गया?"
कबीर के पास जवाब नहीं था। और जवाब न होना उसे अच्छा लगने लगा था।
उसी हफ़्ते कैम्ब्रिज का ख़त आया — फ़ेलोशिप, ऑर्किड जेनेटिक्स। दस दिन की डेडलाइन। नैना ने ख़त तीन बार पढ़ा। उस रात बादल काला पड़ गया — और उस पर इतनी ज़ोर से बरसा कि बिमला दी की छत टपकने लगी।
"वो डरा हुआ है," नैना ने धीरे से कहा।
"बादल डरते नहीं," कबीर ने कहा — पर उसकी आवाज़ में पहले जैसा यक़ीन नहीं था।
अगले दिन कबीर अपने टेंट में घुसा और शाम को बाहर आया तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। "नैना... तुम्हारा बादल वज़न खो रहा है। हर साल थोड़ा हल्का। मेरे मॉडल के हिसाब से..." वो रुका, "वो ख़ुद को ख़र्च कर रहा है। तुम्हें रोकने में।"
नैना की आँखों में आँसू आ गए — बारिश के बीच भी दिख गए। "मैं उसकी क़र्ज़दार हूँ, कबीर। उस रात जंगल में... अगर वो न होता—"
"तो तुम घर न पहुँचतीं। जानता हूँ।" कबीर ने उसका हाथ थामा — बादल की बारिश दोनों पर बरस रही थी। "पर नैना... बादल का काम बहना है, रुकना नहीं। तुमने उसे प्यार से क़ैद कर रखा है।"
उस रात पूर्णिमा थी। बादल चाँदनी में हल्का-सा चमक रहा था — जैसे साँस ले रहा हो। दोनों बरामदे में बैठे थे। बारिश की फुहार, चाय की भाप, और बीच में वो ख़ामोशी जो सिर्फ़ दो लोगों के बीच होती है।
कबीर उसके बारिश के घेरे में आ गया — पहली बार बादल ने किसी अजनबी को अंदर आने दिया। उनके चेहरों के बीच बस एक साँस का फ़ासला था। बारिश पत्तों पर बज रही थी।
"तुम्हारा बादल अब मुझसे जलता नहीं," कबीर ने फुसफुसाकर कहा।
"शायद उसे भी समझ आ गया," नैना की आवाज़ काँप रही थी, "कि कुछ लोग... रोकने नहीं, साथ चलने आते हैं।"
उनके होंठ मिलने ही वाले थे कि बादल ने एक शरारत की — ज़ोर की फुहार। दोनों हँस दिए, भीग गए — और उस हँसी में जो हुआ, वो चाँदनी ने देखा, बारिश ने सुना, और किसी ने नहीं बताया।
सुबह बरामदे में दो ख़ाली चाय के कुल्हड़ थे, और रस्सी पर कबीर की कमीज़ सूख रही थी — नैना की ओढ़नी के बग़ल में। बिमला दी ने देखा और मुस्कुराकर आँखें फेर लीं।
फ़ैसले वाली सुबह नैना अकेली पहाड़ी की चोटी पर गई। बादल उसके ऊपर था — हल्का, थका हुआ, पर वफ़ादार।
"सुनो," उसने आसमान की ओर देखा। "तेईस साल पहले तुमने मुझे घर पहुँचाया था। आज... मुझे जाने दो।"
बादल थरथराया।
"मैं लौटूँगी। वादा है। पर अब तुम्हारी बारी है — बहने की।"
और नैना ने एक क़दम बढ़ाया — अपने बारिश के घेरे से बाहर। तेईस साल में पहली बार वो खुली धूप में खड़ी थी। सूखी। आज़ाद।
एक पल सन्नाटा रहा। फिर बादल ऊपर उठा — ऊँचा, और ऊँचा — और फट पड़ा। ऐसी बारिश कि पूरी घाटी नहा गई। बच्चे घरों से निकले, बूढ़े बरामदों में आए। चेरापूंजी ने ऐसी खुश बारिश बरसों में नहीं देखी थी।
नीचे गाँव में कबीर भीग रहा था — हँस रहा था। उसने ऊपर देखा और चिल्लाया, "नैना! तुम्हारा बादल... वो तो पूरे आसमान का हो गया!"
नैना ने कैम्ब्रिज का ख़त उठाया और "हाँ" लिख दिया।
गुवाहाटी एयरपोर्ट पर, सिक्योरिटी के उस पार, काँच के बाहर बादल की एक छोटी-सी लट तैर रही थी — उसे देख रही थी। नैना ने हाथ हिलाया। लट धूप में घुल गई।
कबीर एक महीना और रुका — माप पूरे करने। जाते-जाते उसने कहा, "मॉनसून ख़त्म होते ही मैं कैम्ब्रिज आ रहा हूँ। बादलों का पीछा करना... अब मेरा भी काम है।"
कहते हैं, चेरापूंजी में अब भी कभी-कभी घाटी के मुहाने पर एक छोटा-सा बादल रुकता है — जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो। और जब नैना लौटती है, सबसे पहले वही उससे मिलने जाता है।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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