नवरात्रि की दूसरी रात, वडोदरा के शारदा मैदान में बीच वाला दीया जलते ही वीर ने कैमरा उठाया — और व्यूफ़ाइंडर में पहली बार उसे देखा।
घेरे के बिल्कुल किनारे, रोशनी की आख़िरी रेखा पर — मोरपंखी नीले चनिया चोली में एक लड़की, डांडिया हवा में, और आँखें सीधी उसके लेंस में।
वीर ने शटर दबाया। क्लिक।
कैमरा नीचे किया — वो नाच रही थी, नज़रें घेरे पर। जैसे उसने कभी उसकी तरफ़ देखा ही न हो।
इकतीस साल का वीर — अहमदाबाद का इवेंट फ़ोटोग्राफ़र — शारदा मैदान की नवरात्रि शूट करने आया था। कमेटी मैदान के नब्बे साल पर किताब छाप रही थी — "नौ रातें, नब्बे साल"।
पहली रात की तस्वीरों में वो हर दूसरी-तीसरी फ़्रेम में थी — वही लड़की, नीली चनिया चोली, घेरे के किनारे। आँखें लेंस में।
"ये हर फ़्रेम में मुझे देख रही है," वो बुदबुदाया।
तीसरी रात वो जल्दी पहुँचा। मैदान में दरी बिछ रही थी, बीच में पीतल का बड़ा दीया — कमर तक ऊँचा स्टैंड, ऊपर कटोरी।
कांतिभाई — अठहत्तर साल के, मैदान के रखवाले — दीया जला रहे थे। हाथ काँप रहे थे, पर बाती एक ही बार में पकड़ ली।
"काका, ये दीया रोज़ भरते हैं?" वीर ने पूछा।
कांतिभाई हँसे — वो हँसी जो पुराने पेड़ों से आती है। "भरता नहीं, बेटा। जलाता हूँ — पहली रात। उसके बाद नौ रातें, एक बाती। तेल जस का तस।"
"मतलब?"
"नब्बे साल से यही रिवाज़ है। मेरी घरवाली ने पहला दीया जलाया था — साठ साल पहले। उसके बाद हर नवरात्रि, यही दीया।"

उस रात वो फिर किनारे थी — गहरे नीले में, रात के रंग में। डांडिया की थाप पर वो घूमती, और हर घुमाव पर उसकी नज़र लेंस में। सीधी।
वीर ने कैमरा नीचे किया। वो नाच रही थी — नज़रें ज़मीन पर, होठों पर हल्की मुस्कान।
चौथी रात उसने ठान लिया — आज बात करेगा।
ढोल बजे। तीन घेरे बने — एक के अंदर एक, जैसे पानी में उठती लहरें। वो किनारे थी। वीर घेरे के बाहर-बाहर चला — और तभी भीड़ का एक रेला आया, और वो ओझल।
"किसे ढूँढ रहे हो, भाई?" — कमेटी के जयंतीभाई, हाथ में रजिस्टर।
"वो... नीली चनिया चोली वाली लड़की। हर रात किनारे नाचती है।"
"अरे, वो तो कांतिभाई की पोती है — मेघा। अट्ठाईस साल की है। पर वो घेरे के बीच में नहीं आती, बेटा। किनारे ही नाचती है — नौ की नौ रातें।"
"क्यों?"
"ये तो कांतिभाई ही बताएँगे।" जयंतीभाई मुस्कुराए। "पर जो किनारे नाचता है, वो घेरे को टूटने नहीं देता।"

पाँचवीं रात वीर ने कैमरा एक तरफ़ रखा — और सिर्फ़ देखा।
आधी रात का गरबा। मेघा घेरे में थी — किनारे, हमेशा की तरह। और तभी वीर की नज़र दीये पर पड़ी।
लौ सीधी नहीं जल रही थी। वो झुकी हुई थी — उसी तरफ़, जिधर मेघा नाच रही थी।
वीर दीये के पास गया। हवा नहीं थी — झालरें स्थिर, धूल तक नहीं उड़ रही। पर लौ झुकी थी — जैसे कोई अदृश्य उँगली उसे खींच रही हो।
दस मिनट बाद घेरा घूमा — मेघा दूसरी तरफ़। लौ भी घूमी। अब दूसरी तरफ़ झुकी।
वीर के हाथ ठंडे पड़ गए।
छठी रात वो सुबह मैदान पहुँचा — दीये की कटोरी देखने। तेल किनारे तक — उतना ही, जितना पहली रात था।
उसने उँगली से कटोरी छुई — तेल असली था, चिपचिपा, सरसों की महक वाला।
"काका," उसने पूछा, "लौ झुकती क्यों है?"
कांतिभाई चुप रहे। फिर बोले — "मेरी घरवाली कहती थी — ये लौ उसी की तरफ़ झुकती है, जिसका दिल इस घेरे से बँधा हो।"
"और मेघा किनारे क्यों नाचती है?"
"क्योंकि उसकी दादी बुढ़ापे में किनारे नाचती थी — घुटने जवाब दे गए थे, पर दिल नहीं।" उनकी आवाज़ नरम पड़ी। "दादी कहती थीं — घेरा टूटे न, इसलिए कोई तो किनारे रहे। मेघा ने वो जगह सँभाल ली। दादी के जाने के बाद से — हर साल, नौ की नौ रातें।"

सातवीं रात वीर ने तस्वीरें देखीं — हाथ काँपने लगे। हर फ़्रेम में मेघा लेंस में देख रही थी। जैसे वो फ़्रेम के बाहर नहीं, फ़्रेम के लिए नाच रही हो।
आठवीं रात — आरती के वक़्त दीये की लौ फड़फड़ाई। नब्बे साल में पहली बार, लौ बुझने को हुई।
भीड़ में सन्नाटा। किसी ने "हे माँ" कहा।
और तभी घेरे के किनारे से एक नीली लहर उठी — मेघा घेरे के बीच की ओर बढ़ रही थी। आठ रातों में पहली बार, वो किनारा छोड़ रही थी।
वो दीये के सामने रुकी। हाथ जोड़े। फिर बीच वाले घेरे में शामिल हो गई।
लौ ठहर गई — सीधी, ऊँची। जैसे किसी ने उसे सहारा दे दिया हो।
वीर ने कैमरा उठाया — पर शटर नहीं दबाया। कुछ पल तस्वीरों में नहीं, आँखों में क़ैद होते हैं।
नौवीं रात — आख़िरी रात। मैदान खचाखच। और घेरे के बीच — मेघा, डांडिया हाथ में।
वीर ने कैमरा असिस्टेंट को थमाया। "आज शूट तुम करोगे" — और घेरे की ओर बढ़ गया।
कांतिभाई मुस्कुराए — वो मुस्कुराहट, जो सब समझती है।
वीर घेरे में उतरा। मेघा के सामने रुका। डांडिया की एक जोड़ी उसकी तरफ़ बढ़ाई।
"नाचोगी?" — इतनी धीमी आवाज़ में कि सिर्फ़ वो सुने।
मेघा ने डांडिया थाम लिए। उसकी आँखों में वही नज़र थी — जो आठ रातों से उसके लेंस में थी — अब सीधी, बिना किसी शीशे के।
"तुम्हें कैसे पता था कि मैं तुम्हें देख रही हूँ?"
"तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं," वीर ने कहा। "और लौ भी नहीं।"
ढोल बजे। डांडिया टकराए — ठक। ठक। ठक।
घेरा घूमा। और बीच में दीया — लौ सीधी, ऊँची, स्थिर — जैसे आशीर्वाद दे रही हो।
नाचते-नाचते उनके हाथ एक पल को ठहरे — डांडिया के ऊपर, उँगलियाँ छू गईं। मेघा ने हाथ नहीं हटाया। वीर ने भी नहीं।
उसके चेहरे पर दीये की रोशनी थी, आँखों में नौ रातों की थकान और कुछ और भी — वो जो आठ रातों से दोनों के बीच बिना कहे तैर रहा था।
वीर झुका — उसके माथे को छूने को — हलके से, जैसे कोई वादा हो।
बाक़ी रात ढोल की थाप में घुल गई।
सुबह — दसवाँ दिन। मैदान ख़ाली। वीर दीये के पास गया — तेल अब भी किनारे तक।
कांतिभाई आए — दो कुल्हड़ चाय। एक वीर को बढ़ाया।
"काका, लौ मेघा की तरफ़ ही क्यों झुकती थी?"
"क्योंकि उसका दिल इस घेरे से बँधा है, बेटा। और अब..." उन्होंने वीर को देखा, "शायद तुम्हारा भी।"
गेट पर मेघा खड़ी थी — सादा सलवार में। हाथ हिलाया।
वीर ने कैमरा उठाया — आख़िरी फ़्रेम। क्लिक। इस बार वो लेंस में नहीं देख रही थी। वो मुस्कुरा रही थी — उसकी तरफ़।
कहते हैं, शारदा मैदान का दीया अब भी हर नवरात्रि नौ रातें जलता है — एक बाती, तेल जस का तस।
और लौ... लौ अब दो तरफ़ झुकती है।
कुछ लौएं तेल से नहीं, इंतज़ार से जलती हैं।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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