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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

नियॉन वाली रात

रात के दो बजकर सत्रह मिनट पर कैफ़े दस्तूर की 'O' जल उठी — ग्यारह साल में पहली बार। इनाया ने हेडफ़ोन उतारे और खिड़की की तरफ़ देखा। सामने गली के उस पार, बंद शटर वाले ईरानी कैफ़े के ऊपर लगी नियॉन साइन रोज़ की तरह गुलाबी-नारंगी रोशनी में नहाई थी — CAFE DASTOOR। बस एक फ़र्क़ था। DASTOOR का पहला 'O', जो कैफ़े बंद होने की रात से बुझा हुआ था, आज जल रहा था। पूरा। गोल। जैसे ग्यारह साल की नींद से जागा हो। उनतीस साल की इनाया वॉइस-ओवर आर्टिस्ट थी। दिन में सोती थी, रात में जीती थी — काला घोड़ा की इस पुरानी इमारत की दूसरी मंज़िल पर उसका छोटा-सा होम स्टूडियो था। डबिंग, विज्ञापन, डॉक्यूमेंट्री नैरेशन — उसकी आवाज़ रात के सन्नाटे में सबसे साफ़ सुनाई देती थी। और हर रात, रिकॉर्डिंग के बीच के ब्रेक में, उसकी नज़र उसी साइन पर टिकती थी। कैफ़े दस्तूर ग्यारह साल पहले बंद हुआ था। बोमन दस्तूर — सफ़ेद बालों वाले, हमेशा मुस्कुराते पारसी सेठ — एक सर्द रात में कैफ़े के अंदर ही सो गए थे, और सुबह उठे नहीं। उसके बाद शटर कभी नहीं उठा। पर साइन? साइन हर रात जलती रही। गली के लोग कहते थे — कोई आता है, कभी-कभार, रात को। सीढ़ी लगाता है, ट्यूबें साफ़ करता है, चला जाता है। उस रात इनाया नीचे उतरी। वजह? शायद वो 'O'। शायद नींद न आना। शटर के सामने सीढ़ी लगी थी, और सीढ़ी पर बत्तीस साल का एक आदमी — हाथ में स्क्रूड्राइवर, कंधे पर टूल-बैग, माथे पर पसीना। साइन की भिनभिनाहट के बीच उसने इनाया को देखा और मुस्कुराया।
"आप रोज़ खिड़की से देखती हैं न?" उसने कहा। "मैं अर्सलान। ये साइन मेरी ज़िम्मेदारी है।" "ज़िम्मेदारी? कैफ़े तो बंद है।" "सेठ बोमन मेरे उस्ताद थे। बारह साल की उम्र में मैं यहाँ सीढ़ी पकड़ता था।" अर्सलान ने जलती ट्यूबों की तरफ़ देखा। "वो कहते थे — बत्ती बुझी, तो गली सो जाएगी। तो मैं आने देता नहीं।" इनाया ने ऊपर देखा। 'O' अब भी जल रहा था। "और ये? ये तो ग्यारह साल से बुझी थी।" अर्सलान का हाथ ठहर गया। उसने ऊपर देखा — और उसकी आँखें फैल गईं। "ये... ये कैसे?" वो सीढ़ी से उतरा, साइन के ठीक नीचे आकर खड़ा हुआ। 'O' की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी। "ग्यारह साल, मैडम। ग्यारह साल में पहली बार।" "शायद ट्रांसफ़ॉर्मर—" "ट्रांसफ़ॉर्मर चालीस साल पुराना है।" अर्सलान ने सिर हिलाया। "पर मरी हुई ट्यूब अपने आप नहीं जलती।" फिर इनाया एक क़दम पीछे हटी — गली की तरफ़। और 'O' बुझ गया। जैसे किसी ने स्विच दबा दिया हो। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। इनाया वापस साइन के नीचे आई — 'O' जल उठा। अर्सलान अपनी बाइक की तरफ़ बढ़ा — बुझ गया। वो लौटा — जल उठा। "ये..." इनाया की आवाज़ में हैरानी थी, "ये हम दोनों के साथ जलती है।"
अर्सलान देर तक साइन को देखता रहा। फिर धीरे से बोला, "सेठ कहते थे — बत्ती दिल से जलती है, करंट से नहीं। मैं हँसता था।" उस रात के बाद रातों का एक नया दस्तूर बन गया। इनाया का सेशन ख़त्म होता — वो नीचे उतरती। अर्सलान "मेंटेनेंस" के बहाने आता — हफ़्ते में दो बार से हर रात। वो चाय लाती — गली के नुक्कड़ वाले ठेले से, कुल्हड़ में। वो साइन की कहानियाँ सुनाता — कौन-सी ट्यूब कब बदली, कौन-सा ट्रांसफ़ॉर्मर किस साल आया। एक रात उसने कहा, "तुम्हारी आवाज़... रात के दो बजे जब तुम 'टेक थ्री' बोलती हो, खिड़की से सुनाई देता है। इस गली में सबसे सही आवाज़ तुम्हारी है।" इनाया ने उस रात उसके लिए एक लाइन रिकॉर्ड की — सिर्फ़ उसके लिए। "कैफ़े दस्तूर... जहाँ बत्तियाँ दिल से जलती हैं।" अर्सलान ने वो क्लिप हज़ार बार सुनी होगी। पर हर कहानी में एक उल्टी गिनती होती है। "ट्रांसफ़ॉर्मर अब गिनती के दिन जी रहा है," एक रात अर्सलान ने कहा। साइन हल्के-हल्के झिलमिला रही थी। "मैं नया लगा सकता हूँ। आधुनिक। पर..." वो रुका, "पर डर लगता है। नई वायरिंग में ये 'O'... क्या पता, फिर कभी न जले। या हमेशा जले — बिना मतलब के।" उसी हफ़्ते इनाया को एक ऑफ़र आया — एक बड़े स्टूडियो से फुल-टाइम डबिंग आर्टिस्ट की नौकरी। दोगुनी फ़ीस। पर शर्त — दिन की शिफ़्ट। रातें ख़त्म। "तीन दिन में जवाब चाहिए," उन्होंने कहा था। तीसरी रात — आख़िरी रात — साइन अचानक बुझ गई। पूरी। गली में अँधेरा छा गया। "ट्रांसफ़ॉर्मर गया," अर्सलान ने कहा। उसकी आवाज़ में वो दर्द था जो आदमी अपनी पुरानी बाइक के लिए महसूस करता है। "तो... नया लगाओ न।" "अभी। इसी रात।" उसने टूल-बैग खोला। "तुम टॉर्च पकड़ोगी?" वो रात इनाया कभी नहीं भूलेगी। अर्सलान सीढ़ी पर — तार, प्लायर, टेप। वो नीचे — टॉर्च की रोशनी, कुल्हड़ की चाय, और बीच-बीच में उसकी हिदायतें। "थोड़ा बाएँ... बस... रुक।" सुबह के पाँच बज रहे थे जब उसने आख़िरी तार जोड़ा। "तैयार?" उसने पूछा। इनाया ने साँस रोकी। अर्सलान ने स्विच दबाया। साइन जली — C-A-F-E — D-A-S-T — और फिर... 'O'। पूरा। गोल। गुलाबी।
दोनों हँसे — वो हँसी जो थकान और राहत के बीच फँसी होती है। फिर इनाया गली की तरफ़ बढ़ी — ये देखने कि 'O' बुझता है या नहीं। नहीं बुझा। वो बाइक तक गई। नहीं बुझा। वो नुक्कड़ तक गई और लौट आई। 'O' जल रहा था — स्थिर, पूरा, बेपरवाह। अर्सलान देर तक उसे देखता रहा। फिर बोला — धीरे से, जैसे कोई राज़ खोल रहा हो, "समझी? ग्यारह साल वो तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी। अब इंतज़ार ख़त्म। अब वो बस... जलती है।" इनाया की आँखों में आँसू थे — या शायद नियॉन की रोशनी थी। अर्सलान ने उसका हाथ थामा — तारों से खुरदरे हाथ, पर नरम पकड़। वो साइन के नीचे खड़े थे, गुलाबी रोशनी में नहाए। उसने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया। बाक़ी रात नियॉन की गुलाबी रोशनी ने अपने पास रख ली। सुबह इनाया ने स्टूडियो को फ़ोन किया। "मेरी आवाज़ रात की है," उसने कहा। "दिन की शिफ़्ट में वो सो जाएगी।" और तब से, हर रात दो बजकर सत्रह मिनट पर, गली के लोग एक ही नज़ारा देखते हैं — साइन के नीचे दो लोग, हाथों में हाथ, ऊपर जलता हुआ 'O'। दो बजकर सत्रह मिनट — अब उनका अपना दस्तूर था। [समाप्त — Raat Ke Afsane]

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