रात के तीन बजकर तैंतीस मिनट पर ज़ारा की आँख खुली — और शहर अब भी उसकी हथेलियों पर था।
आठवीं रात थी। वही शहर। वही नदी। वही हज़ार फ़ानूस।
अट्ठाईस साल की ज़ारा मुंबई में आर्किटेक्ट थी — दिन में इमारतें बनाती थी, और रातों में एक ऐसा शहर देखती थी जो किसी नक्शे पर नहीं था। सुबह उठते ही वो उसे स्केच करती — सफ़ेद संगमरमर के घाट, बीचों-बीच एक टूटी मीनार, घाटों पर जलते हज़ार फ़ानूस, और नदी पर एक नाव — जिसमें नाविक कभी बोलता नहीं था।
हर रात शहर बिल्कुल वैसा ही मिलता, जैसा पिछली रात छोड़ा था। जैसे वो कोई सपना न हो — कोई जगह हो, जो सिर्फ़ सोने पर खुलती हो।
नौवीं रात सब बदला।
घाट की सीढ़ियों पर कोई बैठा था — एक लड़का, करीब तीस-बत्तीस का, हाथ में बाँसुरी नहीं — फ़ोन था, जिसमें वो कुछ रिकॉर्ड कर रहा था। ज़ारा ठिठक गई। आठ रातों में शहर में उसने कभी किसी को नहीं देखा था।
"तुम..." लड़के ने ऊपर देखा और चौंक गया। "तुम भी?"
ज़ारा की साँस अटक गई। "तुम्हें भी ये शहर दिखता है?"
"तीन हफ़्तों से।" वो उठा। "मैं आदित्य — जयपुर में म्यूज़िक कंपोज़र हूँ। इकतीस का। और तुम्हें?"
"ज़ारा। मुंबई। आर्किटेक्ट। आठ रातें।"
दोनों एक-दूसरे को देखकर हँस पड़े — उस हँसी में डर कम, राहत ज़्यादा थी। पागलपन अकेले में डराता है; बाँटने पर कहानी बन जाता है।
उस रात वो घंटों घाट पर बैठे रहे। आदित्य ने अपने फ़ोन से एक धुन बजाई — बाँसुरी पर रिकॉर्ड की हुई, धीमी, उदास, और अजीब-सी जानी-पहचानी।
"ये धुन मुझे शहर ने सिखाई," उसने कहा। "पहली रात — मीनार के पास से आ रही थी। मैंने रिकॉर्ड कर ली।"
ज़ारा ने स्केचबुक खोली — आठ रातों के स्केच। "और ये शहर मुझे। देखो — हर रात एक ही जगह, एक ही नाव, वही नाविक जो कभी बोलता नहीं।"
आदित्य ने स्केचों को गौर से देखा। फिर चुपचाप बोला — "मेरी दादी यही धुन गुनगुनाती थीं। बचपन में, मुझे सुलाते वक़्त।"
"मेरी नानी," ज़ारा ने कहा, "मरने से पहले अपनी डायरी में एक शहर का ज़िक्र करती थीं — सफ़ेद घाटों वाला। कहती थीं — 'मेरा शहर, जो पानी में डूब गया।' मैंने कभी गंभीरता से नहीं लिया।"
आदित्य ने घाट के नीचे की दुकान की ओर इशारा किया — चाय की दुकान, जिसके बोर्ड पर धुँधली इबारत थी। दोनों झुके। पढ़ा — "नूरबाद"। और नीचे, छोटा-सा सन् — "1961"।
अगली सुबह ज़ारा ने नानी की डायरी निकाली — अलमारी के सबसे नीचे वाले डिब्बे से। पीले पन्ने, काँपती उर्दू लिखावट। एक पन्ने पर ठहरी —
"नूरबाद — मेरे बचपन का शहर। घाट, मीनार, फ़ानूसों वाली नदी। सन् 63 में बाँध का पानी आया, और शहर डूब गया। हम सब बिखर गए। शहर रह गया — पानी के नीचे।"
उसी शाम ज़ारा ने आदित्य को फ़ोन किया — सपने के बाहर, असली दुनिया में, पहली बार। नंबर? सपने में माँगा था — और हैरानी की बात, वो सही निकला।
"मेरी दादी का नाम मीरा था," आदित्य ने फ़ोन पर कहा। "और वो जयपुर की नहीं थीं। पापा कहते हैं — दादी किसी डूबे हुए शहर से आई थीं। नाम... नाम याद नहीं।"
"नूरबाद," ज़ारा ने कहा।
फ़ोन पर लंबी ख़ामोशी। फिर आदित्य की आवाज़ — धीमी, भरी हुई। "ज़ारा... दादी की एक पुरानी तस्वीर है। घाट पर, फ़ानूसों के बीच। पीछे बोर्ड पर कुछ लिखा है। मैं देखता हूँ।"
दो घंटे बाद तस्वीर आई — धुँधली, सन् 60 के आसपास की। घाट। फ़ानूस। और दुकान के बोर्ड पर साफ़ इबारत — "नूरबाद"।
और तस्वीर में दादी मीरा के बगल में एक लड़की थी — करीब सोलह-सत्रह की। ज़ारा ने तस्वीर को ज़ूम किया। लड़की के गले में वही लॉकेट था — जो ज़ारा की नानी की तस्वीर में था। वही लॉकेट, जो अब ज़ारा के पास था — नानी की निशानी।
दोनों की नानी-दादी एक ही शहर की थीं। एक ही घाट की। शायद एक-दूसरी को जानती भी थीं।
"हमें वहाँ जाना चाहिए," आदित्य ने कहा। "जहाँ शहर था।"
बाँध का जलाशय — शहर से छह घंटे। गर्मियों में पानी उतरता है, और पुराने लोग कहते हैं — कभी-कभी मीनार की नोक दिखती है।
वो पूर्णिमा से एक रात पहले पहुँचे। तंबू लगाया। और रात को — पहली बार — दोनों ने एक ही सपना देखा, एक-दूसरे के बगल में सोते हुए।
नूरबाद। लेकिन इस बार शहर अलग था। फ़ानूस ज़्यादा जगमगा रहे थे। नाविक नाव से उतरा — पहली बार — और घाट की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। ज़ारा और आदित्य उसके पीछे चले।
नाविक मीनार के पास रुका। और पहली बार बोला — आवाज़ पानी जैसी, दूर से आती हुई — "वापस आ गए?"
ज़ारा की आँखों में आँसू थे। "ये शहर... ये सच में था न?"
"था," नाविक ने कहा। "और है। जो शहर दिलों में डूबता है, वो सपनों में तैरता है। तुम्हारी नानी हर पूर्णिमा को यहाँ आती थीं — सपने में। तुम्हारी दादी भी। दोनों साथ बैठती थीं — यहीं, इन्हीं सीढ़ियों पर।"
सुबह पाँच बजे ज़ारा की आँख खुली — आदित्य पहले से जागा था, जलाशय की ओर देख रहा था।
पानी उतरा हुआ था। और बीचों-बीच — मीनार की नोक। टूटी हुई, काई लगी, पर खड़ी।
वो नाव लेकर गए। मीनार के पास — पत्थरों पर घिसी इबारतें। ज़ारा ने काई हटाई। एक नाम उभरा — "रुक़ैया"। उसकी नानी का नाम। उसके नीचे — "मीरा"।
दोनों नाम — एक ही पत्थर पर। साथ।
"वो दोस्त थीं," आदित्य ने धीरे से कहा। "सबसे अच्छी दोस्त।"
तभी हवा चली — और मीनार के अंदर से घंटी बजी। कोई घंटी नहीं थी वहाँ — पर आवाज़ आई, साफ़, दूर तक। वही घंटी, जो सपने में आधी रात को बजती थी।
आदित्य ने ज़ारा का हाथ थामा। जलाशय की सतह पर सुबह की पहली धूप — हज़ार टुकड़ों में बिखरी, जैसे फ़ानूस।
"तुम्हें पता है," ज़ारा ने कहा, "नानी डायरी में लिखती थीं — नूरबाद में जो दो लोग घाट की सीढ़ियों पर साथ बैठते हैं, शहर उन्हें कभी अलग नहीं करता।"
"तो बैठें?" आदित्य मुस्कुराया।
वो मीनार के पास वाली सीढ़ी पर बैठे — जो पानी के ऊपर थी। उसने उसके चेहरे को हाथों में लिया — और उनके होंठ मिले — धीरे, जैसे कोई पुराना सपना आख़िरकार सच हो रहा हो।
उसके बाद की रात — सिर्फ़ नूरबाद जानता है।
सुबह तंबू के बाहर दो कुल्हड़ चाय थी — चौकीदार रख गया था। और ज़ारा के स्केचबुक में — एक नया स्केच, जो उसने नहीं बनाया था। नूरबाद — पूरा शहर, पानी के ऊपर। नीचे लिखा था — उसी काँपती लिखावट में, जो नानी की डायरी जैसी थी — "शहर अब तुम्हारा है।"
छह महीने बाद — ज़ारा का डिज़ाइन जीता — जलाशय किनारे "नूरबाद स्मृति घाट"। आदित्य की वो धुन — नानी-दादी की लोरी — एक फ़िल्म का गाना बनी।
और हर पूर्णिमा की रात — दोनों एक ही सपना देखते हैं। नूरबाद। फ़ानूस। घाट। और अब नाविक बोलता है — हर बार एक ही बात —
"वापस आ गए?"
"आ गए," दोनों कहते हैं। "और अब यहीं रहेंगे।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



Comments
Post a Comment