अक्टूबर की एक नरम शाम थी। अहमदाबाद के पुराने शहर में, एक पुरानी पोल-हवेली की छत पर अट्ठाईस साल की नैना एक लकड़ी का संदूक खोल रही थी — दादी की पुरानी चीज़ों वाला संदूक, जिसमें बचपन की यादें धूल की चादर ओढ़े सो रही थीं।
पुराने कपड़ों, पीले पड़े ख़तों और टूटी चूड़ियों के बीच उसे कुछ नरम-सा छुआ। उसने बाहर निकाला — एक फटी हुई पतंग। लाल-पीली, काग़ज़ जगह-जगह से उधड़ा हुआ, बाँस की कमान एक ओर से टूटी। और उसके किनारे पर कलम से लिखा था — "उत्तरायण — अर्जुन"।
नैना की उँगलियाँ उस लिखावट पर ठहर गईं। और देखते ही देखते, नौ महीने पुरानी वो जनवरी की सुबह उसकी आँखों के सामने जीवंत हो उठी।
वो सुबह उत्तरायण से एक दिन पहले की थी। नैना — मुंबई की एक टेक्सटाइल डिज़ाइनर — दादी के बुलावे पर पुराने शहर आई थी। दादी कहती थीं, "उत्तरायण अहमदाबाद में नहीं मनाई, तो ज़िंदगी में क्या मनाया!"
पोल की छतों पर सुबह से ही हलचल थी। कबूतरों की गुटरगूँ, नीचे गली से पतंग बेचने वालों की आवाज़ें — "पतंग ले लो! मांझा ले लो!" — और हर छत पर बँसवारी की खटपट। आसमान अभी साफ़ था, मगर नैना जानती थी — कल यही आसमान रंगों से भर जाएगा।
दादी ने उसे एक पुरानी थैली थमाई। "जा, गली के नुक्कड़ से अच्छी पतंगें ले आ। और हाँ — मांझा तेज़ धार का लेना, वरना पेंच में कट जाओगी।"
नुक्कड़ पर पतंगों की दुकान सजी थी — सैकड़ों पतंगें, जैसे रंगों का बाज़ार। दुकान पर बत्तीस के आसपास का एक आदमी बैठा था — साँवला चेहरा, हाथों में मांझे के निशान, आँखों में कारीगर वाली चमक।
"पहली बार पतंग ले रही हैं?" उसने मुस्कुराकर पूछा।
"इतना साफ़ दिखता है?" नैना ने हैरानी से पूछा।
"आपने सबसे चमकीली पतंग उठाई है — जो उड़ाना नहीं जानता, वही सबसे चमकीली चुनता है," वो हँसा। "मैं अर्जुन हूँ। ये पतंगें मेरे ही हाथ की बनी हैं।"
नैना ने पलटकर देखा — दुकान के पीछे एक छोटा-सा कारख़ाना, जहाँ बाँस की कमानें और रंगीन काग़ज़ बिखरे थे। "तीन पीढ़ियों से," अर्जुन ने गर्व से कहा। "मेरे दादा कहते थे — पतंग काग़ज़ नहीं, इरादा होती है।"
उसने नैना को तीन पतंगें चुनीं — एक लाल-पीली "रानी", एक नीली, एक हरी। "ये रानी सबसे तेज़ है। इसे सँभालना आसान नहीं।"
"चुनौती मंज़ूर," नैना ने थैली उठाई। पीछे से आवाज़ आई — "कल छत पर मिलते हैं! पेंच लड़ाना हो, तो मांझा ढीला मत रखना!"
उस दोपहर नैना ने दादी की छत से पहली पतंग उड़ाई। रानी आसमान में ऐसे उठी, जैसे बरसों से उड़ने का इंतज़ार कर रही हो।
तभी बग़ल वाली छत से आवाज़ आई — "अरे वाह! रानी तो उड़ गई!" नैना ने मुड़कर देखा — अर्जुन अपनी छत पर खड़ा था, हाथ में चरखी, उसकी काली-लाल धारीदार पतंग शान से लहरा रही थी। "तो ये आपकी छत है!" नैना हँस पड़ी। "पड़ोसी निकले हम!"
कुछ ही देर में दोनों छतों के बीच पतंगों की दोस्ती हो गई। नीचे गली में शोर था, ऊपर आसमान में रंग — और बीच में दो अजनबी, जो अब अजनबी नहीं रहे थे।
शाम ढलते-ढलते आसमान में पेंच शुरू हो गए। एक बड़ी-सी हरी पतंग ने नैना की नीली पतंग काट दी। "घबराओ मत!" अर्जुन चिल्लाया। "रानी को ऊपर लाओ — मैं तुम्हारी तरफ़ से लड़ता हूँ!" उसकी काली-लाल पतंग ने हरी से पेंच लिया — मांझा खिंचा — और "काटा!" की आवाज़ के साथ हरी पतंग लहराती हुई नीचे गई। दोनों छतों पर तालियाँ बजीं।
रात को दादी ने छत पर ही खाना लगवाया — उंधियू, जलेबी, बाजरे की रोटी। खाने की ख़ुशबू में अर्जुन भी शामिल हो गया — दादी ने उसे भी बुला लिया था।
"बेटा, तुम्हारे दादा की पतंगें तो पूरे शहर में मशहूर थीं," दादी ने कहा। "ये कला अब कौन सीखेगा?"
अर्जुन की आँखों में एक पल को उदासी आई। "कोई नहीं, दादी। सब तैयार पतंगें लेते हैं। हाथ की बनी पतंग की क़द्र कम होती जा रही है।"
नैना ने धीरे से कहा, "मैं टेक्सटाइल डिज़ाइनर हूँ। हाथ की बनी चीज़ की क़ीमत मैं जानती हूँ। आपकी पतंगों के डिज़ाइन — ये तो कला है, अर्जुन।"
खाने के बाद अर्जुन उसे अपने कारख़ाने ले गया। लालटेन की रोशनी में उसने दिखाया — बाँस की कमान को आग पर सेंककर मोड़ना, काग़ज़ पर गोंद, मांझे पर काँच का बुरादा। उसकी उँगलियों पर मांझे के पुराने निशान थे — कारीगर के हाथ, जो अपनी कला की क़ीमत अपने शरीर पर लिखते हैं। "पतंग उड़ाना ज़िम्मेदारी है, खेल नहीं," उसने कहा। नैना के दिल में उसके लिए इज़्ज़त और गहरा गई।
अगली सुबह — उत्तरायण का दिन। आसमान में हज़ारों पतंगें। "काईपो छे!" की गूँज हर छत से उठ रही थी। नैना ने रानी को आसमान में छोड़ा, अर्जुन अपनी काली-लाल के साथ उसके साथ हो लिया। दोपहर तक नैना तीन पेंच जीत चुकी थी — चरखी घुमाते हुए, हवा को पढ़ते हुए, वो अब नौसिखिया नहीं लग रही थी।
तभी आसमान में एक विशाल पतंग आई — क़रीब चार फ़ीट की, "बादशाह"। उसने एक के बाद एक पाँच पतंगें काट दीं। अब उसकी नज़र रानी पर थी।
"नैना, सावधान!" अर्जुन चिल्लाया। "ये बहुत भारी है — तुम्हारी रानी कट जाएगी!"
बादशाह ने रानी पर झपट्टा मारा। मांझा खिंचा — और ठीक उसी पल, अर्जुन की काली-लाल पतंग बीच में आ गई। उसने बादशाह से पेंच लिया, अपनी पतंग दाँव पर लगाकर रानी को बचा लिया। लंबी लड़ाई के बाद "काटा!" — मगर कटी पतंग अर्जुन की थी। काली-लाल लहराती हुई नीचे चली गई। रानी सलामत थी।
नैना की आँखों में आँसू आ गए। "तुमने अपनी पतंग क्यों गँवाई?"
अर्जुन मुस्कुराया। "पतंगें फिर बन जाएँगी, नैना। कुछ चीज़ें एक बार कट जाएँ, तो फिर नहीं जुड़तीं।"
शाम को सूरज ढल रहा था। आसमान नारंगी-सुनहरा था, हज़ारों पतंगें अब भी लहरा रही थीं। दोनों अपनी-अपनी छत पर खड़े थे — बीच में सिर्फ़ एक छोटी-सी गली।
अर्जुन ने अपनी सबसे क़ीमती पतंग निकाली — वही लाल-पीली रानी, अपने हाथों से बनाई हुई। उसने उसे नैना की ओर बढ़ाया। "ये मेरी सबसे अच्छी पतंग है। आज से ये तुम्हारी।"
नैना ने पतंग ली — उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने पतंग की दुम पर अपना मुंबई का नंबर लिखा; अर्जुन ने अपनी पतंग पर अपना। "अगली उत्तरायण," अर्जुन ने कहा, "यहीं, इसी छत पर। पेंच फिर होगा।" "और हारने वाला जलेबी खिलाएगा," नैना ने हँसकर कहा।
वो जनवरी की रात नैना कभी नहीं भूली — छत पर जलती लालटेन, दूर कहीं ढोल की थाप, और तारों के बीच अटकी आख़िरी पतंगें।
अक्टूबर की इस शाम, नैना ने उस फटी पतंग को सीने से लगाया। नीचे से दादी की आवाज़ आई — "नैना! चाय ठंडी हो रही है!" उसने पतंग को संदूक में सबसे ऊपर रखा — धूल की चादर के बिना — और मुँडेर पर आकर आसमान को देखा। पतंगें नहीं थीं, मगर उसके दिल में एक डोर अब भी खिंची थी — नौ महीने लंबी, मुंबई से अहमदाबाद तक।
कुछ इश्क़ पतंगों जैसे होते हैं — डोर हाथ में हो या न हो, उड़ान हमेशा दिल में रहती है। और कुछ वादे उत्तरायण जैसे होते हैं — साल में एक बार आते हैं, मगर इंतज़ार पूरे साल का होता है।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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