भोर के साढ़े पाँच बजे विराट की छेनी आख़िरी बार गिरी — और ग्रेनाइट के उस चेहरे ने जैसे आँखें खोल दीं।
नहीं। पत्थर की आँखें नहीं खुलतीं। पर उस एक पल में चौंतीस साल के विराट को लगा, ये चेहरा उसे पहचानता है।
छह महीने से वो इसी चेहरे को तराश रहा था — एक ऐसा चेहरा जो उसने ज़िंदगी में कभी देखा नहीं था, सिवाय सपनों में।
महाबलीपुरम की उस गली में सुबह छेनी की खनक से होती है — विराट की वर्कशॉप, दादाजी के ज़माने की, गली के आख़िरी सिरे पर।

वो तीसरी पीढ़ी का शिल्पकार था — और पिछले छह महीनों से ग्रेनाइट के एक ही टुकड़े से लड़ रहा था।
वो टुकड़ा उसने खदान से ख़ुद चुना था — पहाड़ी की उस तरफ़ से जहाँ पुराने महल के खंडहर हैं।
पर सच ये था कि उसने पत्थर नहीं चुना था। पत्थर ने उसे चुना था।
जिस पहली रात वो टुकड़ा वर्कशॉप आया, विराट ने सपना देखा — धुंध में एक औरत, चेहरा आधा छिपा: "मुझे बाहर निकालो।"
सुबह उसने छेनी उठाई — हाथ जैसे ख़ुद चलने लगे।
"अभ्यास है," वो सबसे कहता। "बस अभ्यास का टुकड़ा।"
पर अभ्यास के टुकड़ों को कोई रात को कपड़े से ढककर नहीं सोता।
उस सुबह वर्कशॉप के बाहर एक ऑटो रुका — उसमें से एक लड़की उतरी, कंधे पर लैपटॉप बैग, हाथ में फ़ाइलों का डिब्बा।
"विराट शिल्पकार?" उसने पूछा। "मैं आस्था — तटीय धरोहर ट्रस्ट से।"
उन्तीस साल की आस्था — ट्रस्ट की नई दस्तावेज़ीकरण अधिकारी। उसके डिब्बे में रानी चन्द्रप्रभा का प्रोजेक्ट था — नए संग्रहालय के आँगन के लिए रानी की आदमक़द मूर्ति।
"रानी चन्द्रप्रभा — डेढ़ सौ साल पहले इस तट की आख़िरी रानी," आस्था ने फ़ाइल खोली। "पर उनका एक ही दरबारी चित्र बचा है। और उसमें..."
उसने तस्वीर निकाली — रानी का चेहरा ख़ुरचा हुआ था, जैसे किसी ने दर्द से मिटा दिया हो।
"कोई मूर्तिकार बिना चेहरा देखे मूर्ति कैसे बनाएगा?" आस्था ने पूछा। "इसीलिए ट्रस्ट ने आपको चुना। कहते हैं, आपके हाथ पत्थर में जान डाल देते हैं।"
विराट कुछ न बोला। उसकी नज़र अपने "अभ्यास के टुकड़े" पर थी — जिसे उसने जल्दी से कपड़े से ढक दिया था।
पर आस्था की नज़र तेज़ थी। "वो कपड़े के नीचे क्या है?"
"कुछ नहीं। अधूरा काम।"
"मैं अधूरे काम ही देखती हूँ," वो मुस्कुराई। "मेरा पूरा काम ही अधूरी चीज़ों को पूरा करना है।"
विराट ने कपड़ा नहीं हटाया। उस शाम आस्था गेस्ट हाउस चली गई। पर जाते-जाते कह गई, "कल सुबह मैं रानी के दरबारी शिल्पी की डायरी लाऊँगी — डेढ़ सौ साल पुरानी। शायद उसमें चेहरे का कोई निशान मिले।"
रात को फिर सपना — वही धुंध, वही औरत। इस बार उसने चेहरा पूरा दिखाया, और विराट की साँस रुक गई।
वो चेहरा — वो आस्था का चेहरा था।
सुबह वो जल्दी वर्कशॉप पहुँचा — हाथ काँप रहे थे। छह महीने से वो जिसे तराश रहा था, वो कोई कल्पना नहीं थी।
तभी आस्था आई — हाथ में चमड़े की जिल्द वाली डायरी, पन्ने पीले, स्याही धुंधली।
"पढ़िए," उसने कहा। "आख़िरी पन्ना।"
डायरी में लिखा था — "रानी साहिबा का हुक्म — मेरी सूरत इस चित्र से ख़ुरच दो।" और नीचे, काँपते अक्षरों में — "वो चले गए, तो चेहरा भी साथ ले गए।"
"वो — यानी दरबारी शिल्पी," आस्था ने धीरे से कहा। "इतिहास कहता है, रानी के शिल्पी की मौत के बाद ही रानी ने अपना चेहरा मिटवाया था।"
"अब?" विराट ने पूछा।
"अब," आस्था ने बैग से एक पुराना लिफ़ाफ़ा निकाला, "मेरी नानी की संदूक़ से ये तस्वीर मिली — रानी चन्द्रप्रभा की। परिवार में कोई इस बारे में बात नहीं करता था।"
उसने तस्वीर विराट के हाथ में रखी — धुंधली, डेढ़ सौ साल पुरानी।
विराट के हाथ से तस्वीर छूटते-छूटते बची। तस्वीर में — आस्था थी। हूबहू आस्था।
"मैं उनकी वंशज हूँ," आस्था की आवाज़ काँपी। "शायद इसीलिए ट्रस्ट ने मुझे भेजा। या शायद..."
"या शायद पत्थर ने बुलाया," विराट ने कपड़ा हटाया।
ग्रेनाइट का चेहरा धूप में चमका — और आस्था दो क़दम पीछे हट गई। वो चेहरा उसका था। हर रेखा, हर मोड़ — जैसे आईने में देखा हो।

"छह महीने से मैं ये चेहरा सपनों में देख रहा हूँ," विराट ने कहा। "मुझे लगा था — कल्पना है।"
"कल्पना नहीं," आस्था ने पत्थर को छुआ — धीरे से, जैसे वो ज़िंदा हो। "मेरे नानाजी कहते थे — पत्थर एक बार जो चेहरा देख ले, उसे कभी नहीं भूलता।"
"और ये पत्थर," उसने कहा, "आपने खदान के उसी हिस्से से चुना जहाँ रानी के महल के खंडहर हैं। उसी पहाड़ी का पत्थर।"
विराट ठिठक गया — दादाजी की स्केचबुक। बचपन में पेंसिल से बना एक चेहरा, और दादाजी के शब्द: "ये चेहरा इस मिट्टी का है।"
"पत्थर को चेहरा याद था," विराट बुदबुदाया। "कारीगर को भूल गया था।"
उसी दोपहर ट्रस्ट के सचिव मुरुगन (अट्ठावन साल) वर्कशॉप आए। ग्रेनाइट का चेहरा देखा, तस्वीर देखी, और कहा, "तो रानी ने अपना शिल्पी ख़ुद चुन लिया।" कमीशन पर मुहर लग गई।
अगले बीस दिन — छेनी की खनक, और काग़ज़ों की सरसराहट। आस्था रोज़ आती। विराट तराशता — जैसे कोई पुराना क़र्ज़ चुका रहा हो।
एक शाम — सूरज समंदर में डूब रहा था, वर्कशॉप में धूल सुनहरी हो गई थी — आस्था ने पूछा, "डर नहीं लगता? कि मूर्ति बनने के बाद... ये सब ख़त्म हो जाएगा?"
विराट ने छेनी रोकी — "कुछ चीज़ें बनने के बाद ख़त्म नहीं होतीं। वो शुरू होती हैं।"
वो दोनों ग्रेनाइट के चेहरे के दोनों तरफ़ खड़े थे — बीच में सिर्फ़ एक साँस की दूरी।
आस्था ने हाथ बढ़ाया — पत्थर के गाल पर, जहाँ अभी आख़िरी पॉलिश बाक़ी थी। विराट का हाथ अनजाने में उसके हाथ पर आ टिका।

दोनों में से कोई पीछे नहीं हटा।
बाहर समंदर गरज रहा था। अंदर — सिर्फ़ धड़कनें, और पत्थर की ख़ामोशी।
विराट ने कहा, "रानी ने चेहरा इसलिए मिटवाया था — ताकि कोई और उसे न तराश सके। पर पत्थर ने इनकार कर दिया।"
"पत्थर ज़िद्दी होता है," आस्था ने कहा — और उसकी आँखों में वो चमक थी जो डेढ़ सौ साल पहले किसी रानी की आँखों में रही होगी।
उस रात वर्कशॉप का दिया देर तक जला — बाक़ी शाम समंदर की हवा में घुल गई।
अनावरण की शाम — संग्रहालय का आँगन, दीयों की क़तार, आधा शहर।
कपड़ा हटा — भीड़ की साँस एक साथ अटकी। ग्रेनाइट की रानी — जीवंत, गर्वीली, आँखों में डेढ़ सौ साल का इंतज़ार।
किसी ने कहा — "तस्वीर से भी ज़्यादा।"
आस्था सबसे पीछे खड़ी थी। विराट ने भीड़ के बीच से उसे देखा — और मुस्कुराया।
बाद में — जब दीये बुझने लगे और आँगन ख़ाली हुआ — आस्था मूर्ति के पास आई। उसने पत्थर के गाल को छुआ।
"अब ये हम दोनों की है," विराट ने कहा — इतने क़रीब कि उसकी साँस उसके बालों को छू रही थी।
"हम दोनों की?" आस्था ने मुड़कर देखा।
"रानी की — और उस चेहरे की, जो डेढ़ सौ साल बाद लौट आया।"
समंदर की हवा ने दीयों की लौ हिलाई। दो परछाइयाँ पत्थर पर एक हो गईं।
कुछ चेहरे पत्थर में पहले से लिखे होते हैं — कारीगर बस उन्हें पढ़ता है।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
Comments
Post a Comment