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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

प्लेटफ़ॉर्म ज़ीरो

प्लेटफ़ॉर्म नंबर ज़ीरो पर ट्रेन रुकती नहीं — ठहरती है।

इकतीस साल के आरव ने ये फ़र्क़ तीन पूर्णिमाओं में सीखा था।

आरव मुंबई लोकल का मोटरमैन था — आख़िरी लोकल, रात बारह बजकर सैंतालीस मिनट, सीएसएमटी से कर्जत। ख़ाली डिब्बे, और पटरियों की वो गूँज जो सिर्फ़ आधी रात को सुनाई देती है।

उसके दादा हरिराम 1975 में इसी लाइन पर मोटरमैन थे। उनके जाने के बाद मिली स्टील की पेटी में एक लॉगबुक थी।

सिर्फ़ आख़िरी पन्ने के हाशिये पर दादा की काँपती लिखावट थी — "ज़ीरो हॉल्ट — सिर्फ़ चाँदनी रात। कभी रोका नहीं, कभी छोड़ा नहीं।"

पुराने ड्राइवर हँसे — "ऐसा कोई हॉल्ट शेड्यूल में नहीं, छोरे।"

पर पहली पूर्णिमा को सिग्नल ने कुछ और ही कहा।

हरा — पर रुकने का इशारा किसी शेड्यूल में नहीं था। आरव ने ब्रेक दबाया — और कोहरे के बीच एक प्लेटफ़ॉर्म उभरा।

हाथ से पेंट की हुई तख़्ती — "प्लेटफ़ॉर्म ०"। सोडियम लैंपों की पीली रोशनी, चाय की टपरी, दीवार पर 1975 का कैलेंडर।

कैब के शीशे पर उसने साँस रोकी — शीशा धुंधला गया। उसने उँगली से लिखा — "मैं जाग रहा हूँ।"

और तभी वो चढ़ी।

सरसों के रंग का कुर्ता, हाथ में टिन की अटैची। उम्र अट्ठाईस के आसपास, चेहरे पर अजीब-सा ठहराव।

वो सीधे कैब के पास आई। उसने खिड़की से एक चिट्ठी बढ़ाई — ठाणे का पता: "राधा निवास, फूल गली, ठाणे।"

"वहाँ तक छोड़ दोगे?" उसने पूछा।

"ये ट्रेन कर्जत जाती है," आरव ने कहा — पर उसकी आवाज़ में यक़ीन नहीं था।

"आज नहीं," वो बोली — और मुस्कुराई। "आज पूर्णिमा है।"

आरव ने ब्रेक नहीं छुआ — ट्रेन ने ख़ुद रास्ता चुना। भोर से ठीक पहले — ठाणे का सुनसान प्लेटफ़ॉर्म।

वो उतरी। कोहरे में घुल गई। टिन की अटैची के पीतल के कोने लैंप की रोशनी में एक पल चमके — फिर सब धुंध।

आरव कैब में बैठा रहा — हाथ काँप रहे थे। लॉगबुक का वो पन्ना उसकी जेब में था।

दिन में वो ठाणे में पूछताछ करता रहा। आख़िर एक बूढ़े कुली ने वाडे की तरफ़ इशारा किया — "वो नीले दरवाज़े वाला..."

दरवाज़ा खुला — चौरासी साल की राधा दादी। सफ़ेद जूड़ा, शांत आँखें। आरव को देखते ही वो ठिठकीं — "तुम... हरिराम के पोते हो न? आँखें वही हैं।"

अंदर अदरक वाली चाय के साथ दादी ने 1975 की वो रात खोली।

उनका मंगेतर मोहन — उसी हॉल्ट पर टिकट कलेक्टर। शादी से एक रात पहले उसने चिट्ठी लिखी थी — "कल सुबह की पहली ट्रेन से आऊँगा — बारात नहीं, अकेला। सबसे पहले तुझे देखना है, राधा।"

उसी रात घाट के पास डिरेलमेंट हुआ। मोहन ड्यूटी पर था — लौटा नहीं। चिट्ठी कभी पहुँची नहीं।

"ब्याह तो बाद में हुआ — एक मास्टर जी से। पर दिल..." दादी ने प्याला नीचे रखा — "दिल वहीं रह गया। उस प्लेटफ़ॉर्म पर।"

"और वो लड़की — जो अटैची लेकर आती है?"

दादी की आँखें नम हुईं — "मेरी पोती — रोशनी। अट्ठाईस साल की। हर पूर्णिमा को वो मेरी टिन की अटैची लेकर आख़िरी लोकल में चढ़ती है।"

"और फिर?"

"फिर वो उस रात के लिए मेरी जवान राधा बन जाती है — वो चिट्ठी लेकर, जो पचास साल से अनडिलीवर है।" दादी रुकीं — "पचास साल से वो रात ख़त्म नहीं हुई, बेटा।"

दो दिन बाद आरव लॉगबुक लेकर वाडा लौटा — और वहाँ दिन के उजाले में रोशनी मिली।

हँसती हुई, बालों में गजरा — बिल्कुल असली। ठाणे की टपरी पर कटिंग चाय — उसकी हँसी में घंटी जैसी खनक थी।

पर जब उसने पूर्णिमा का ज़िक्र किया, रोशनी ख़ामोश हो गई। "जो हर पूर्णिमा को अतीत में जाता है, वो वर्तमान में किसी का नहीं होता, आरव।"

आरव ने लॉगबुक का वो पन्ना खोला। "शायद इसीलिए दादा ने लिखा था — ताकि पचास साल बाद कोई रुककर देखे कि घंटी के उस पार कोई इंतज़ार कर रहा है।"

रोशनी ने पन्ने को देर तक देखा। फिर नज़रें उठाईं — "अगली पूर्णिमा को... तुम आओगे?"

"कहाँ?"

"मेरे साथ। उस प्लेटफ़ॉर्म पर।"

दूसरी पूर्णिमा को आरव ने कैब से देखा — रोशनी अटैची लेकर चढ़ी। उसने उसकी तरफ़ देखा — एक पल — फिर नज़रें फेर लीं।

वो पीछे नहीं गया — अभी नहीं। उसे पहले देखना था — वो रात आख़िर होती क्या है।

रात एक बजकर सैंतालीस मिनट पर घंटी बजी — दूर से, जैसे पानी के नीचे से।

भोर में वो लौटी — आँखें भीगी हुईं। "फिर नहीं पहुँची," उसने सिर्फ़ इतना कहा — और चली गई।

तीसरी पूर्णिमा से एक शाम पहले आरव वाडा गया। दादी आँगन में बैठी थीं — चाँद आधा था, बढ़ रहा था।

"इस बार वो अकेले नहीं जाएगी," आरव ने कहा।

दादी ने उसकी कलाई पर लाल धागा बाँधा। "मोहन के नाम का है — 1975 का।" उनकी आवाज़ टूटी — "पहुँचा देना, बेटा।"

पूर्णिमा की रात। आख़िरी लोकल। बारह बजकर सैंतालीस मिनट।

कोहरा — और फिर वो प्लेटफ़ॉर्म। आरव रोशनी के साथ उतरा — मोटरमैन की वर्दी में।

भाप। सीटी। चाय की टपरी। और टपरी के पास — जवान राधा। रोशनी का चेहरा, पर आँखों में पचास साल पुरानी दुल्हन की चमक।

टिकट खिड़की पर मोहन — मुहर लगाता हुआ, गाना गुनगुनाता हुआ। सत्ताईस साल का। बिल्कुल वैसा, जैसा दादी ने बताया था।

"वो... असली है?" रोशनी ने फुसफुसाकर पूछा।

"आज रात सब असली है," आरव ने कहा — और उसका हाथ थाम लिया।

फिर घंटी बजी — एक बजकर सैंतालीस मिनट।

रोशनी का हाथ काँपा — "वक़्त ख़त्म..."

"इस बार घंटी अकेले नहीं सुनोगी," आरव ने कहा। वो दोनों खिड़की तक गए — धुंध के बीच से।

आरव ने चिट्ठी बढ़ाई। "मोटरमैन की ड्यूटी है, मोहन जी — हर यात्री अपनी मंज़िल तक पहुँचे। पचास साल देर से ही सही।"

मोहन ने चिट्ठी पढ़ी। उसके हाथ रुके। फिर वो मुस्कुराया — वैसी ही मुस्कुराहट, जैसी दादी की कहानियों में थी।

उसने टिकट पर मुहर लगाई। "कहना राधा से..." वो रुका — "...अब मैं इंतज़ार नहीं करूँगा।"

घंटी आधी आवाज़ में रुक गई — जैसे किसी ने उसका गला दबा दिया हो।

प्लेटफ़ॉर्म ने गहरी साँस छोड़ी। और 1975 — पटरियों से उठती धुंध की तरह घुल गया।

उनके बीच चाँदनी थी — और फिर सिर्फ़ वो दोनों।

उनके होंठ मिले — पचास साल का इंतज़ार, तीन पूर्णिमाएँ, और एक अनडिलीवर चिट्ठी — सब एक पल में पूरा हो गया।

उसके बाद की रात — वो सिर्फ़ पटरियों की गूँज जानती है।

भोर में वो असली पटरियों पर खड़े थे। टिन की अटैची में अब 1975 की एक स्टाफ़ फ़ोटो थी — मोहन उसमें सीधे कैमरे में देखकर मुस्कुरा रहा था।

वाडा में दादी ने फ़ोटो को सीने से लगाया — "पचास साल बाद डाक पहुँची, बिटिया।"

एक साल बाद। पूर्णिमा।

आरव और रोशनी — अब पति-पत्नी। आख़िरी लोकल उस साइडिंग के पास से गुज़री — कोई हॉल्ट नहीं, शेड्यूल साफ़।

घर पर एक पार्सल था — टिन की अटैची। ख़ाली। अंदर दादी की चिट्ठी — "अब ये सफ़र तुम्हारा है।"

और उस रात पहली बार चाँदनी में कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं था — सिर्फ़ दो लोग, एक घर, और एक ट्रेन जो वक़्त पर चली।

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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