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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

रातरानी

शीशी सत्तर साल से बंद थी — और उस रात, बिना किसी के छुए, उसका डाट खुद खुल गया।

पूरी हवेली रातरानी की खुशबू से भर गई — जैसे किसी ने सत्तर साल पुरानी दुल्हन का घूँघट उठा दिया हो।

सत्ताईस साल की आयशा मुंबई से कन्नौज आई थी — खुशबू पर लिखने वाली। एक फ्रांसीसी परफ्यूम घराने ने उसे भारत के मरते हुए इत्र-कला पर किताब लिखने का काम सौंपा था, और कन्नौज — इत्र की नगरी — उसकी किताब का पहला अध्याय था।

रहने का इंतज़ाम "नज़ीर इत्र भवन" में हुआ — डेढ़ सौ साल पुरानी हवेली, जिसकी दीवारों में भी चंदन और केवड़े की महक बसी थी। हवेली के मालिक — तीस साल के अरमान — चौथी पीढ़ी के इत्रसाज़ थे। उनके परदादा ने ये भवन बनवाया था, उनके दादा — उस्ताद नज़ीर अहमद — ने इसे नाम दिया था।

पहली ही शाम अरमान ने उसे भट्टी-खाना दिखाया — ताँबे के बड़े-बड़े देग, जिनमें भाप उठती थी; बाँस की नलियों से टपकता इत्र; और चारों तरफ़ फैली फूलों की टोकरियाँ।

"ये है देग-भपका," अरमान ने कहा, हथेली से भाप को चेहरे की ओर खींचते हुए। "पाँच सौ साल पुरानी तकनीक। आग, पानी, फूल — और सब्र। मशीनें ये नहीं बना सकतीं।"

"और ये?" आयशा की नज़र कोने की लकड़ी की अलमारी पर पड़ी — शीशे के पीछे एक क्रिस्टल की शीशी, मोम से सीलबंद, जिस पर पीला पड़ा काग़ज़ चिपका था — "रातरानी, 1952"।

अरमान का चेहरा नरम पड़ गया। "दादा की आख़िरी शीशी। उनकी शादी की रात उतारा गया इत्र — आधी रात को चुनी रातरानी के फूलों से। कभी बेची नहीं, कभी खोली नहीं।"

"क्यों?"

"दादा कहते थे — 'जिस रात ये शीशी खुद खुलेगी, समझ लेना — इत्र ने अपना जोड़ा चुन लिया।'"

आयशा हँस दी। "खुशबू भी जोड़े चुनती है?"

"कन्नौज में," अरमान ने कहा, "खुशबू सबसे बड़ा सच बोलती है।"

उस रात आयशा को नींद नहीं आई। आधी रात के करीब उसके कमरे में एक महक तैरने लगी — गहरी, मीठी, नशीली — रातरानी की। उसने खिड़की खोली — बाहर हवेली का आँगन चाँदनी में डूबा था, देग ठंडे पड़े थे, कोई भट्टी नहीं जल रही थी। फिर ये खुशबू कहाँ से?

सुबह उसने अरमान से पूछा। वो ठिठक गया।

"तुम्हें भी आई?" उसने धीरे से कहा। "मुझे तीन रातों से आ रही है — सिर्फ़ तब, जब तुम पास होती हो।"

आयशा के रोंगटे खड़े हो गए। "मतलब?"

"मतलब ये," अरमान ने देग की ओर इशारा किया, "कि कल रात बारह बजे ये देग छूने पर गरम थे — जबकि आग नौ बजे बुझा दी थी।"

अगली रातों में खुशबू और गहरी होती गई। आयशा सपने देखने लगी — चाँदनी में डूबा आँगन, भाप उठते ताँबे के देग, और कहीं दूर किसी औरत की हँसी — चेहरा नहीं, सिर्फ़ हँसी, और हाथों में फूलों की टोकरी। वो जागती तो तकिए पर रातरानी की दो-चार पंखुड़ियाँ मिलतीं — जबकि उसके कमरे में कोई फूल नहीं था।

चौथी रात वो डरकर दादी फ़िरदौस के कमरे में पहुँची — अठासी साल की फ़िरदौस, उस्ताद नज़ीर की बेवा, 1952 की वही दुल्हन, जिनकी याददाश्त आज भी कमाल की थी।

"दादी... ये खुशबू... ये सपने..."

फ़िरदौस ने उसकी हथेली थाम ली। "डरो मत, बिटिया। खुशबू कभी डराती नहीं — वो सिर्फ़ सच बताती है।"

"कैसा सच?"

दादी ने अलमारी से एक पुरानी डायरी निकाली — नज़ीर की लिखावट। एक पन्ना खोला: "इत्र झूठ नहीं बोलता। ये सिर्फ़ सच्चे जोड़े के पास खिलता है। 1952 की रातरानी मेरी शादी की रात खिली थी — और अब ये सत्तर साल से अगले जोड़े का इंतज़ार कर रही है।"

"दादा मानते थे," फ़िरदौस ने कहा, "कि उस रात के फूलों ने दो दिलों की धड़कन सोख ली थी। इत्र ने वो धड़कन याद रखी। अब वो उसी धड़कन को ढूँढ रहा है — इस हवेली में, इस वक़्त।"

आयशा का दिल ज़ोर से धड़का। "पर... मैं तो मेहमान हूँ। कुछ हफ़्तों में चली जाऊँगी।"

"खुशबू मेहमान-पराया नहीं देखती, बिटिया। वो सिर्फ़ दिल देखती है।"

उसी हफ़्ते पेरिस से फ़ोन आया — घराने के निदेशक चाहते थे कि आयशा सिर्फ़ किताब ही न लिखे, बल्कि "रातरानी, 1952" का नुस्खा और वो सीलबंद शीशी भी खरीद ले — किसी भी क़ीमत पर। "वो शीशी हमारी प्रयोगशाला में खुलेगी," उन्होंने कहा। "इतिहास बिकेगा।"

आयशा ने फ़ोन रख दिया और देर तक आँगन में बैठी रही। एक तरफ़ उसके करियर का सबसे बड़ा मौक़ा था — दूसरी तरफ़ एक परिवार का सत्तर साल का भरोसा, और एक खुशबू... जो अब उसके नाम से महकती थी।

शरद पूर्णिमा की रात थी। अरमान ने कहा — "आज रात हम साथ उतारेंगे। पूर्णिमा की चाँदनी में रातरानी का इत्र सबसे सच्चा उतरता है।"

आधी रात को दोनों भट्टी-खाने में थे। आयशा ने पहली बार अपने हाथों से फूल चुने — नरम, ओस से भीगी पंखुड़ियाँ। अरमान ने उसके हाथों के ऊपर अपने हाथ रखकर सिखाया — कैसे पंखुड़ियों को मसलना है, कब देग में डालना है। उसकी साँसें उसकी गर्दन पर थीं; उसके हाथों की गर्मी उसकी उँगलियों में उतर रही थी।

"देखो," अरमान फुसफुसाया, "चाँदनी देग पर पड़ रही है — दादा कहते थे, ये शुभ होता है।"

ठीक बारह बजे — अलमारी की ओर से एक हल्की सी "पॉप" की आवाज़ आई।

दोनों ने मुड़कर देखा।

1952 की शीशी का मोम-सीलबंद डाट — सत्तर साल से बंद शीशी का डाट — खुद खुलकर फ़र्श पर गिरा था। और शीशी से उठती खुशबू की एक लहर पूरे भट्टी-खाने में फैल गई — इतनी गहरी, इतनी ज़िंदा, जैसे सत्तर साल की दुल्हन ने आख़िरकार अपना घूँघट उठा दिया हो।

अरमान की आँखें भर आईं। "दादा सही कहते थे... इत्र ने अपना जोड़ा चुन लिया।"

आयशा ने उसकी ओर देखा — चाँदनी में उसका चेहरा, भाप के पीछे धुँधला, आँखों में आँसू और कुछ और भी — वो जो दिनों से दोनों के बीच बिना कहे तैर रहा था।

वो एक क़दम पास आई। उसके हाथ अब भी फूलों की महक से सने थे। उसने उसके गाल को छुआ — और फिर उनके होंठ मिले — धीरे, जैसे कोई पुराना इत्र पहली बार साँस लेता है।

भाप उठती रही। चाँदनी देग पर पड़ती रही। और उस रात के बाद की कहानी — सिर्फ़ कन्नौज की वो हवेली जानती है।

सुबह आयशा जागी तो उसकी कलाई पर अब भी रातरानी की महक थी — हालाँकि वो नहा चुकी थी। खिड़की पर 1952 की शीशी खुली रखी थी — आधी खाली।

"रात ने खुद पिया था," फ़िरदौस दादी ने मुस्कुराकर कहा। "सत्तर साल की प्यास थी।"

उसी दोपहर आयशा ने पेरिस फ़ोन किया। "नुस्खा नहीं बिकेगा," उसने कहा। "और शीशी भी नहीं। पर किताब ज़रूर लिखूँगी — कला पर, भरोसे पर, और उस खुशबू पर जो बिकती नहीं।"

एक साल बाद। उसी आँगन में — चाँदनी, देग, फूलों की टोकरियाँ — और आयशा दुल्हन बनी बैठी थी। मेहमानों को छोटे-छोटे शीशों में नया इत्र बाँटा गया — "रातरानी — 2026"।

और 1952 वाली शीशी? वो अब हर पूर्णिमा की रात खुद खुल जाती है — कुछ घंटों के लिए — फिर सुबह बंद मिलती है।

फ़िरदौस दादी कहती हैं — "जैसे घर की कोई बुज़ुर्ग, दुआएँ देने आती हो।"

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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