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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

साठ सेकंड का जादू

तंबू के अंदर घुसते ही इशिता की नज़र ऊपर गई — और वहीं अटक गई।

तीस फ़ीट ऊपर, बिना किसी जाल के, एक आदमी हवा में उल्टा लटका था — और मुस्कुरा रहा था।

नासिक शहर से बाहर, गोदावरी के किनारे फैले मैदान में "रौनक सर्कस" का तंबू अपने आख़िरी हफ़्ते में खड़ा था। पचास साल पुराना सर्कस, अब बस तीन दिन का मेहमान।

उनतीस साल की इशिता पुणे से आई थी — एक मैगज़ीन के लिए "मरती हुई कलाओं" पर फोटो-निबंध। कैमरा उसका हथियार था, और उदासी उसका असाइनमेंट।

"नीचे देखो!" किसी ने चिल्लाया।

वो आदमी हवा में पलटा — दो कलाबाज़ियाँ — और अपने साथी के हाथों में आ गिरा। तंबू तालियों से गूँज उठा। इशिता का कैमरा अपने आप चल पड़ा।

शो के बाद वो बैकस्टेज गई। वो आदमी रस्सी से उतर रहा था, पसीने में भीगा, कंधे पर तौलिया।

"तुम पागल हो," इशिता ने कहा। "बिना जाल के?"

"तैंतीस साल से पागल हूँ," वो हँसा। "आर्यन। तीसरी पीढ़ी का कलाबाज़। और तुम?"

"इशिता। वो, जो तुम्हारे पागलपन की तस्वीरें खींचेगी।"

उस शाम चाय की टपरी पर आर्यन ने जेब से एक पुरानी घड़ी निकाली — पीतल की, चेन वाली, दादाजी के ज़माने की।

"ये घड़ी ख़ास है," उसने कहा।

"ख़ास कैसे?"

"ये साठ सेकंड पीछे कर सकती है। वक़्त को।"

इशिता हँस पड़ी। "और मैं चाँद पर घर बनाना चाहती हूँ।"

आर्यन ने कुछ नहीं कहा। उसने इशिता के सामने रखा चाय का गिलास जानबूझकर गिरा दिया — काँच टूटा, चाय बिखरी।

फिर उसने घड़ी का बटन दबाया।

जो हुआ, उसे इशिता कभी नहीं भूली — जैसे किसी ने फ़िल्म की रील उल्टी चला दी हो। चाय की बूँदें हवा में ऊपर उठीं, गिलास के टुकड़े जुड़े, टपरी की आवाज़ें उल्टी बजीं — और गिलास मेज़ पर साबुत खड़ा था, भाप उठती हुई।

पूरे साठ सेकंड। फिर सब रुक गया।

"ये… ये कैसे?" इशिता की साँस अटकी थी।

"दादाजी सर्कस के जादूगर थे," आर्यन ने घड़ी जेब में रखी। "कहते थे — असली जादू हाथ की सफ़ाई नहीं, वक़्त की होती है।"

"तो तुम अमीर क्यों नहीं? लॉटरी के नंबर—"

"हर रिवाइंड की क़ीमत है," उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "मेरी एक याद। जितनी बार घड़ी घुमाई, उतना अतीत धुँधला। इसीलिए मैं अपने बचपन के बारे में ज़्यादा नहीं बता सकता — वो सब क़ीमत में चला गया।"

तीन दिन बीत गए। इशिता ने बूढ़े शेरों के ख़ाली पिंजरे, रंग-बिरंगे ट्रेलर, बूढ़े जोकर की आँखों का काजल — सब कैद किया। पर उसका लेंस बार-बार आर्यन पर लौटता।

गोदावरी के किनारे रात की सैर, ट्रेलर के बाहर जलती लालटेन, आधी रात को सुनाई देती रियाज़ की आवाज़ — दोनों के बीच कुछ पक रहा था, धीमी आँच पर।

एक रात नदी किनारे आर्यन ने उसका हाथ थामा। चाँद पानी पर टूट रहा था।

वो इतना क़रीब आया कि इशिता को उसकी साँसों में इलायची की खुशबू आई। उसके होंठ उसके होंठों से एक साँस की दूरी पर ठहरे — और ठहरे रहे, जैसे वक़्त ने खुद साँस रोक ली हो।

फिर उसने उसका माथा चूमा — धीरे से — और हाथ छोड़ दिया। "आख़िरी शो तक रुक जाओ," उसने कहा। "उसके बाद जो होगा, देखा जाएगा।"

इशिता की धड़कनें उस रात सोने नहीं आईं।

चौथे दिन ख़बर आई — मुंबई का एक स्पॉन्सर आख़िरी शो देखने आ रहा है। अगर तंबू भरा और शो जमा, तो सर्कस को नई ज़िंदगी मिल सकती है।

"तुम्हारी तस्वीरें," मैनेजर ने कहा, "अख़बार में छपेंगी तो भीड़ आएगी।"

इशिता ने उस रात अपनी सबसे अच्छी तस्वीरें भेजीं — हवा में उल्टा लटका आर्यन, रोशनी में नहाया तंबू।

आख़िरी शो की शाम तंबू खचाखच भरा था।

इशिता ने सोचा — सबसे शानदार शॉट ऊपर से आएगा। लाइटिंग रिग पर चढ़ने की इजाज़त उसने पहले ही ले रखी थी — आर्यन ने मना किया था, "वो रिग पुरानी है," पर उसने हँसकर टाल दिया था।

शो चरम पर था। आर्यन हवा में था — तीन कलाबाज़ियाँ, एक के बाद एक। नीचे हज़ार साँसें रुकी थीं।

तभी — कड़ाक।

रिग का एक बोल्ट टूटा। इशिता का पैर फिसला — और वो तीस फ़ीट की ऊँचाई से नीचे की ओर गई।

नीचे खड़े आर्यन ने जेब में हाथ डाला।

टिक।

दुनिया हकलाई — आवाज़ें उल्टी बजीं, रोशनी पीछे हटी, गिरती हुई इशिता ऊपर उठी — साठ सेकंड, पूरे साठ सेकंड पीछे।

और इस बार, जब बोल्ट टूटा, आर्यन पहले से रिग के नीचे खड़ा था। उसने इशिता को बाँहों में थाम लिया — हवा में, रोशनी के घेरे में, हज़ार आँखों के सामने।

तंबू तालियों से फट पड़ा — सबने समझा, ये शो का हिस्सा था।

पर आर्यन की आँखों में कुछ टूटा था। उसने इशिता को नीचे उतारा और फुसफुसाया —

"तुम्हारा नाम… क्या था?"

सन्नाटा। इशिता का दिल बैठ गया। क़ीमत वसूल हो चुकी थी।

"इशिता," उसने उसका चेहरा हाथों में लिया। "मेरा नाम इशिता है।"

आर्यन मुस्कुराया — धीरे, जैसे कोई पुरानी रील फिर से चल पड़ी हो। "तो ये हमारी पहली मुलाक़ात है। और इस बार… इस बार मैं कैमरा नहीं देख रहा।"

उस रात शो के बाद स्पॉन्सर ने हाथ मिलाया — सर्कस बचेगा। इशिता की तस्वीरें अख़बार के पहले पन्ने पर थीं।

आधी रात को, आख़िरी लालटेनों की रोशनी में, आर्यन ने घड़ी इशिता की हथेली पर रख दी।

"इसमें अब एक भी रिवाइंड नहीं बचा," उसने कहा। "आख़िरी वाला तुम्हारे नाम था। और अच्छा है — अब हमें कल की ज़रूरत नहीं।"

इशिता ने घड़ी मुट्ठी में बंद की। "और जो यादें गईं?"

"नई बना लेंगे," उसने कहा — "साठ-साठ सेकंड करके नहीं। पूरी-पूरी ज़िंदगी।"

फिर उसने इशिता को अपनी ओर खींचा। उनके होंठ मिले — धीरे, गहरे — जैसे कोई पुरानी धुन पहली बार सही सुर में बजे। लालटेनों की रोशनी में दोनों की परछाइयों एक हो गईं।

रात का बाक़ी हिस्सा तंबू की परछाइयों के बीच रह गया — और सुबह तक किसी ने उसे नहीं छेड़ा।

सुबह तंबू नहीं उखड़ा। इशिता ने मैगज़ीन को लिखा — "असाइनमेंट पूरा। कहानी अभी बाक़ी है।"

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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