दुकान की घड़ी रात के साढ़े बारह बजाती, और रेकॉर्ड खुद बज उठता।
आयशा ने सुना — इस बार उस आवाज़ में एक नया नाम था।
कॉलेज स्ट्रीट पर बारिश की बूंदें टिन की छत पर ताल दे रही थीं, और 'मेलोडी हाउस' की आधी खुली शटर के भीतर पीली रौशनी में धूल के कण तैर रहे थे। आयशा छब्बीस साल की थी, और पिछले आठ महीनों से ये दुकान उसका पूरा जहाँ थी।
उसके पिता महेश ने ये दुकान उन्नीस सौ चौहत्तर में खोली थी। शहर के हर पुराने संगीत-प्रेमी को पता थी ये जगह — लकड़ी की अलमारियों में हज़ारों रेकॉर्ड, कैसेट, और वो ख़ुशबू जो सिर्फ़ पुराने काग़ज़ और विनाइल से आती है। पिता के जाने के बाद आयशा ने बैंक की नौकरी छोड़ दी थी। दुकान चलाना आसान नहीं था, पर ये आख़िरी चीज़ थी जो उसे पिता से जोड़ती थी।
उस शाम दुकान में एक अजनबी आया।
"मैं आदित्य हूँ," उसने कहा, अपनी गीली जैकेट झाड़ते हुए। "साउंड रिस्टोरर हूँ। आपके पिता से बात हुई थी — पुराने आर्काइव को डिजिटल करने की।"
आदित्य तीस साल का था। उसकी आँखों में वो चमक थी जो आयशा ने सिर्फ़ उन लोगों में देखी थी, जिन्हें पुरानी चीज़ों से सच्चा इश्क़ होता है। दोनों ने उस रात तीन घंटे तक अलमारियाँ खंगालीं। और तभी आदित्य के हाथ में एक काला रेकॉर्ड आया।
"माला — उन्नीस सौ अड़सठ," उसने लेबल पढ़ा। "टेस्ट प्रेसिंग। सिर्फ़ एक ही कॉपी बनी होगी।"
लेबल पर लिखा था — सात गाने।
रात के साढ़े बारह बजे, दुकान की घड़ी ने बारह बार घंटी बजाई — और रेकॉर्ड खुद बज उठा।
आयशा की साँस रुक गई। आदित्य का हाथ स्टाइलस की ओर बढ़ा, पर रेकॉर्ड तो पहले से ही घूम रहा था। स्पीकर से एक गहरी, पुरानी आवाज़ आई — जैसे किसी ने सत्तावन साल पहले माइक्रोफ़ोन में फुसफुसाया हो।
"माला... तुम आई नहीं।"
ये गाना नहीं था। ये इक़बाल था।
"रणजीत," आदित्य ने बुदबुदाया। "उन्नीस सौ साठ के दशक का गुमनाम गायक। कहते हैं, उसने सिर्फ़ एक बार रिकॉर्ड किया था — और फिर गायब हो गया।"
आवाज़ आगे बोली — "सियालदह स्टेशन पर भीड़ थी। मैंने हर औरत के चेहरे में तुम्हें ढूँढा। आख़िरी ट्रेन छूट गई, माला। और मैं वहीं खड़ा रह गया।"
आयशा के रोंगटे खड़े हो गए। "ये... ये ट्रैक लेबल पर नहीं है।"
"आठवाँ ट्रैक," आदित्य की आवाज़ काँप रही थी। "जो मौजूद ही नहीं होना चाहिए था।"
उस रात दोनों घर नहीं गए।
अगली रात, ठीक साढ़े बारह बजे, रेकॉर्ड फिर बजा। और इस बार इक़बाल लंबा था।
"आज बारिश हुई, माला। तुम्हें बारिश से डर लगता था, याद है? तुम मेरी बाँह पकड़ लेती थीं। मैंने सोचा, शायद तुम आओगी..."
आयशा ने आदित्य की ओर देखा। "ये हर रात बढ़ रहा है। जैसे... जैसे ये अभी रिकॉर्ड हो रहा हो।"
"ये नामुमकिन है," आदित्य ने कहा। पर उसकी आँखें रेकॉर्ड से हट नहीं रही थीं।
तीसरी रात उन्होंने रेकॉर्ड के स्लीव को खोला। अंदर से एक पीला पड़ा लिफ़ाफ़ा निकला — 'माला के नाम'।
आयशा ने काँपते हाथों से चिट्ठी पढ़ी। "चौदह अगस्त, उन्नीस सौ अड़सठ। सियालदह स्टेशन, आख़िरी ट्रेन। मैं इंतज़ार करूँगा। — रणजीत।"
और तभी आयशा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"मेरी नानी का नाम..." उसने धीरे से कहा, "माला था।"
आदित्य चुप रहा।
"वो उन्नीस सौ अट्ठानवे में गुज़र गईं — मेरे जन्म से दो साल पहले। माँ ने कभी किसी रणजीत का ज़िक्र नहीं किया। पर..." आयशा ने लिफ़ाफ़े को उल्टा किया, "ये पता — ये मेरी नानी का ही पुराना पता है।"
बाहर बारिश तेज़ हो गई। दुकान की पीली रौशनी में दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे, और बीच में वो काला रेकॉर्ड घूम रहा था — जैसे कोई तीसरा शख़्स उनकी बातें सुन रहा हो।
चौथी रात, रेकॉर्ड ने वो कहा जिसने दोनों की दुनिया हिला दी।
रणजीत की आवाज़ आई — "आज दुकान पर वो लड़की हँसी।"
आदित्य का चेहरा पीला पड़ गया। आयशा की साँस थम गई।
"उस लड़के ने उसकी तरफ़ देखा," आवाज़ आगे बोली, धीमी, गर्म। "और उसने नज़रें नहीं झुकाईं।"
"ये... ये हम हैं," आयशा ने फुसफुसाया।
रेकॉर्ड उन्नीस सौ अड़सठ की कहानी नहीं सुना रहा था। वो अभी लिख रहा था — उनकी कहानी। सत्तावन साल से अधूरी पड़ी एक मोहब्बत इस दुकान में, इन दो अजनबियों के बीच, अपना अंजाम ढूँढ रही थी।
"माला कभी नहीं आई, रणजीत," आयशा ने रेकॉर्ड से कहा, उसकी आवाज़ भर्रा गई। "पर मैं यहाँ हूँ।"
पाँचवीं रात।
बारिश की बूंदें शटर पर थिरक रही थीं। दुकान में सिर्फ़ एक लैंप जल रहा था। ठीक साढ़े बारह बजे रेकॉर्ड बजा।
"और फिर वो रुकी," रणजीत की आवाज़ बोली। "उसने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया।"
आदित्य ने आयशा की ओर देखा। उसकी आँखों में वही चमक थी — वो चमक जो पुरानी चीज़ों से इश्क़ करने वालों में होती है। पर इस बार वो चमक सिर्फ़ रेकॉर्ड के लिए नहीं थी।
उसने धीरे से आयशा का हाथ थामा।
उसके हाथ गर्म थे। आयशा के दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि उसे लगा, रेकॉर्ड की सुई भी उसे सुन लेगी। आदित्य ने उसके गाल को छुआ — हल्के से, जैसे कोई पुराना रेकॉर्ड छूता है, टूटने के डर से।
और फिर उनके होंठ मिले।
बाहर बारिश, अंदर लैंप की रौशनी, और बीच में घूमता वो काला रेकॉर्ड — जैसे सत्तावन साल का इंतज़ार एक साँस में पूरा हो रहा हो। आयशा ने महसूस किया, आदित्य की बाँहें उसे घेर रही हैं, और वो इस पल को कभी ख़त्म नहीं होने देना चाहती।
रेकॉर्ड की सुई उठी — या शायद उन्होंने ही उसे उठा दिया। आयशा को याद नहीं।
सुबह दोनों कोने की चाय की दुकान पर थे। भोर की रौशनी में कॉलेज स्ट्रीट धुली हुई लग रही थी। आदित्य ने दो कुल्हड़ उठाए।
"तुम्हें पता है," आयशा ने कहा, चाय की भाप में देखते हुए, "माँ कहती थीं — नानी की शादी अचानक तय हुई थी। चौदह अगस्त, उन्नीस सौ अड़सठ को ही उन्हें दिल्ली भेज दिया गया था।"
"तो माला आना चाहती थी," आदित्य ने धीरे से कहा। "बस आ नहीं सकी।"
आयशा ने उसका हाथ थामा। "और रणजीत ने इंतज़ार करना नहीं छोड़ा। उसने अपना इंतज़ार इस रेकॉर्ड में छिपा दिया — ताकि एक दिन कोई उसे पूरा करे।"
"हमने पूरा किया," आदित्य मुस्कराया।
"हमने," आयशा ने कहा।
एक साल बाद।
उनकी शादी की रात।
आदित्य ने अपने नए घर के छोटे से कमरे में वही पुराना टर्नटेबल रखा था — पिता की दुकान से लाया हुआ। ठीक रात के साढ़े बारह बजे उसने सुई उठाई और उस काले रेकॉर्ड पर रखी।
स्पीकर से रणजीत की आवाज़ आई — आख़िरी बार।
"माला आई थी," वो बोला, और उसकी आवाज़ में सत्तावन साल का सुकून था। "तुम दोनों आए। शुक्रिया।"
फिर ख़ामोशी।
रेकॉर्ड अब सिर्फ़ सात गाने बजाता है। आठवाँ ट्रैक — वो इक़बाल, वो इंतज़ार — हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया।
पर आयशा जानती है — कुछ कहानियाँ ख़त्म नहीं होतीं। वो बस अपना अंजाम ढूँढ लेती हैं।
उनकी कहानी अभी शुरू हुई थी।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



Comments
Post a Comment