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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

सफ़ेद कमरा

शिमला के उस पुराने अस्पताल में रात के बारह बजे वार्ड नंबर सात का ताला अपने आप खुलता था।

मीरा ने पहली बार ये बात अपनी आँखों से देखी थी — छब्बीस साल की, नर्सिंग की डिग्री लिए, पहाड़ी रातों की ठंड से दोस्ती कर चुकी मीरा, जिसने तीन साल में हर तरह के मरीज़ देखे थे, मगर ऐसा वार्ड कभी नहीं।

"वहाँ मत जाना," वार्ड बॉय रघुवीर ने उसे पहले ही दिन चेताया था। रघुवीर पैंतालीस का था, अस्पताल की हर दीवार से वाकिफ़। "सात नंबर वार्ड बाईस साल से बंद है। आग लगी थी — पूर्णिमा की रात। डॉक्टर अर्जुन..." वो रुक गया था। "बस, मत जाना।"

मीरा ने पूछा था, "डॉक्टर अर्जुन कौन थे?"

रघुवीर ने सिर्फ़ इतना कहा था, "जो आख़िरी मरीज़ तक रुके थे।"

उस रात पूर्णिमा थी।

मीरा दवाई की ट्रे लेकर गलियारे से गुज़र रही थी, जब उसने सुना — वार्ड नंबर सात के दरवाज़े के पीछे से स्ट्रेचर के पहियों की आवाज़। धीमी। लयबद्ध। जैसे कोई बहुत सावधानी से किसी को ले जा रहा हो।

वो ठिठक गई।

ताला लगा था। सील लगी थी — सरकारी मुहर, बाईस साल पुरानी, धूल में धँसी। मगर अंदर से आ रही थी वो आवाज़। और उसके साथ एक मद्धम रोशनी, दरवाज़े की दरार से, चाँदनी जैसी सफ़ेद।

मीरा का हाथ काँप रहा था, फिर भी वो आगे बढ़ी। दरवाज़े के हैंडल को छुआ — और ताला खुल गया। अपने आप।

दरवाज़ा खुला।

अंदर — एक सफ़ेद कमरा।

छह बिस्तर, सफ़ेद चादरें, हर बिस्तर पर मरीज़। और उनके बीच खड़ा एक युवक — सफ़ेद कोट, स्टेथस्कोप गले में, उम्र उन्नतीस के आसपास। उसके चेहरे पर ऐसी शांति थी जैसी मीरा ने कभी किसी डॉक्टर के चेहरे पर नहीं देखी थी।

"आप..." मीरा की आवाज़ टूट गई।

युवक ने मुड़कर देखा। उसकी आँखों में कोई डर नहीं था। सिर्फ़ थकान — बहुत पुरानी थकान।

"मैं डॉक्टर अर्जुन," उसने कहा, जैसे ये सबसे सामान्य बात हो। "और आप आज की नर्स हैं। आइए — राउंड बाक़ी है।"

मीरा के पैर अपने आप अंदर चले गए। दरवाज़ा पीछे से बंद हो गया।

अंदर की हवा अलग थी — ठंडी, मगर दमघोंटू नहीं। चाँदनी खिड़कियों से आ रही थी, और हर बिस्तर के ऊपर एक छोटा-सा नाम का कार्ड लगा था। अर्जुन हर मरीज़ के पास रुकता, नब्ज़ देखता, कुछ लिखता। मीरा ने देखा — उसके हाथ के काग़ज़ पर तारीख़ लिखी थी। बाईस साल पुरानी तारीख़।

"ये सब..." मीरा ने फुसफुसाया।

"ये सब उसी रात के हैं," अर्जुन ने बिना मुड़े कहा। "आग वाली रात। मैं इन्हें छोड़कर नहीं गया था। और अब..." वो रुका। "अब हर पूर्णिमा को ये वार्ड खुलता है, ताकि मैं अपना राउंड पूरा कर सकूँ। बस एक राउंड बाक़ी है — आख़िरी।"

मीरा की साँस अटक गई। "आख़िरी?"

"हर पूर्णिमा मैं एक बिस्तर ख़ाली करता हूँ," अर्जुन ने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ टूटा। "पाँच बिस्तर ख़ाली हो चुके। आज छठा है। उसके बाद..." उसने मीरा की ओर देखा। "उसके बाद मैं जा सकूँगा।"

मीरा ने उस रात अर्जुन का साथ दिया।

वो हर बिस्तर पर रुकी, हर मरीज़ का नाम पढ़ा, अर्जुन के साथ दवाइयाँ दीं — दवाइयाँ जो बाईस साल पुरानी शीशियों से आ रही थीं, मगर असर आज का था। एक बूढ़ी औरत ने मीरा का हाथ पकड़ा और कहा, "बेटी, इस डॉक्टर को अब जाने दो। बहुत थक गया है बेचारा।"

आधी रात के बाद, जब छठा बिस्तर ख़ाली हो गया — धीरे-धीरे, जैसे कोई सोते-सोते मुस्कुरा दे — अर्जुन खिड़की के पास खड़ा हो गया।

चाँदनी उसके चेहरे पर थी।

"तुम्हें डर नहीं लगा?" उसने पूछा।

"लगा था," मीरा ने सच कहा। "मगर फिर लगा — जो आदमी मरीज़ों को छोड़कर नहीं गया, वो मुझे क्या डराएगा।"

अर्जुन हँसा। पहली बार। और उस हँसी में बाईस साल की थकान पिघलती दिखी।

वो मीरा के क़रीब आया। इतना क़रीब कि मीरा को उसके कोट की ख़ुशबू आई — डेटॉल और पुरानी किताबों की। उसका हाथ उठा, मीरा के गाल को छूने के लिए — और रुक गया, हवा में।

"छू नहीं सकता," उसने धीरे से कहा। "मगर देख सकता हूँ।"

मीरा ने अपना हाथ उसके हाथ के पास ले जाकर हवा में रखा। दोनों हाथ, एक-दूसरे को छुए बिना, एक-दूसरे को महसूस करते हुए।

"ये भी तो छूना ही है," मीरा ने कहा।

उस रात उन्होंने बातें कीं — अर्जुन ने बताया कि वो उनतीस का था जब आग लगी थी, कि उसने इंटर्नशिप इसी अस्पताल से की थी, कि उसे पहाड़ों की रातें बहुत पसंद थीं। मीरा ने बताया कि वो छब्बीस की है, कि उसने नर्सिंग इसलिए चुनी थी क्योंकि उसकी माँ कहा करती थी — "जो दर्द बाँटता है, वो कभी अकेला नहीं रहता।"

"तुम्हारी माँ सही कहती थीं," अर्जुन ने कहा।

सुबह के चार बजे, जब चाँद ढलने लगा, वार्ड की रोशनी धीमी होने लगी।

"वक़्त हो गया," अर्जुन ने कहा।

मीरा की आँखों में आँसू थे। "क्या मैं तुम्हें फिर देख पाऊँगी?"

अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, "अगली पूर्णिमा को ये वार्ड नहीं खुलेगा। मेरा राउंड पूरा हो गया।" वो दरवाज़े की ओर बढ़ा, फिर रुका। "मगर तुमने जो किया — आज रात जो तुमने मेरे साथ राउंड किया — इसके लिए..."

उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा सफ़ेद फूल निकाला। रातरानी का। और उसे खिड़की की चौखट पर रख दिया।

"इसे रख लो। जब भी लगे कि कोई तुम्हें देख नहीं रहा — याद रखना, कोई देख रहा है।"

फिर वो बिस्तरों के बीच से गुज़रा — और धीरे-धीरे, चाँदनी में घुलता चला गया।

सुबह पाँच बजे मीरा वार्ड नंबर सात के बाहर खड़ी थी। ताला लगा था। सील लगी थी। अंदर अँधेरा।

सब कुछ वैसा ही, जैसा बाईस साल से था।

सिर्फ़ उसकी मुट्ठी में एक सफ़ेद फूल था — रातरानी का, ताज़ा, खुशबूदार।

✦ ✦ ✦

एक महीना बीता।

अस्पताल के नोटिस बोर्ड पर एक ऐलान लगा — किसी अनाम दानदाता ने बच्चों के नए वार्ड के लिए बड़ी रक़म दी है। शर्त सिर्फ़ एक थी — नए वार्ड का नाम होगा "डॉक्टर अर्जुन मेमोरियल वार्ड"।

रघुवीर ने मीरा को देखकर सिर्फ़ सिर हिलाया।

और उसी हफ़्ते अस्पताल में एक नया डॉक्टर आया — उनतीस साल का, इंटर्नशिप कहीं और से की हुई। पहली बार जब वो मीरा से मिला, तो उसने कहा, "आप नाइट शिफ़्ट में हैं? मुझे पहाड़ों की रातें बहुत पसंद हैं।"

मीरा ठिठक गई।

डॉक्टर ने मुस्कुराकर अपना हाथ बढ़ाया। उसकी कलाई पर एक हल्का-सा निशान था — जैसे पुराना जला हुआ।

"मैं अर्जुन," उसने कहा।

मीरा ने उसका हाथ थामा। इस बार — ये हाथ गर्म था।

बाहर पूर्णिमा का चाँद निकल रहा था।

और मीरा ने पहली बार महसूस किया — कुछ कहानियाँ ख़त्म नहीं होतीं। वो बस अगली पूर्णिमा का इंतज़ार करती हैं।

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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