रात के तीन बजे विवान की आँख खुली — और उसे घर का हर पत्थर याद था।
समंदर के ऊपर चट्टान पर खड़ा वो अधूरा घर। आधी बनी दीवारें, गायब छत, हवा में नमक की खुशबू। और अंदर से आती एक औरत की गुनगुनाहट।
विवान ने बत्तीस साल की उम्र में हज़ारों इमारतों के नक्शे बनाए थे — मुंबई की एक आर्किटेक्चर फ़र्म में सीनियर आर्किटेक्ट था वो। पर ये घर किसी नक्शे में नहीं था। ये उसके सपनों में था। तीसरी रात से, लगातार।
अंधेरी के उसके स्टूडियो अपार्टमेंट की खिड़की पर अक्टूबर की बारिश दस्तक दे रही थी। विवान बिस्तर से उठा, टेबल लैंप जलाया, और स्केचबुक उठा ली। बिना सोचे उसका हाथ चलने लगा — चट्टान, दीवारें, वो अधूरी सीढ़ियाँ जो कहीं नहीं जाती थीं।
स्केच के नीचे उसने लिखा: "फिर वही घर।"
छह सौ किलोमीटर दूर, बेंगलुरु में, तीस साल की काव्या भी उसी वक़्त जाग रही थी।
बच्चों की किताबों की इलस्ट्रेटर काव्या के स्टूडियो में एक स्केचबुक खुली पड़ी थी — और उसके हर पेज पर वही घर था। छह हफ़्तों से। वो नहीं जानती थी क्यों बनाती है। बस हर सुबह उठकर वो उसमें कुछ नया जोड़ देती — कभी एक खिड़की, कभी दरवाज़े पर नक्काशी, कभी छत की मुंडेर।
"ये घर मुझे बुला रहा है," उसने अपनी डायरी में लिखा था। "पता नहीं कहाँ है। पर है।"
चौथी रात सपने में कुछ बदला।
विवान घर के अंदर खड़ा था — तभी उसने देखा, कोई दीवार पर रंग लगा रहा है। एक लड़की। हाथ में पेंटब्रश, चेहरे पर रंग की छींटें, और होंठों पर वही गुनगुनाहट जो तीन रातों से उसके कानों में थी।
"तुम्हें इतनी देर क्यों लगी?" उसने बिना पलटे कहा, जैसे वो बरसों से उसका इंतज़ार कर रही हो।
विवान का गला सूख गया। "मैं... तुम्हें जानता हूँ?"
"सपने में सब एक-दूसरे को जानते हैं," वो हँसी। "यहाँ नाम पूछने का रिवाज़ नहीं।"
उस रात उन्होंने साथ मिलकर काम किया। विवान ने — आर्किटेक्ट की आदत से — एक ढीला पत्थर दीवार में जमाया। लड़की ने उस पर नीले रंग की एक लहर बना दी।
"समंदर यहीं नीचे है," उसने कहा। "दीवारों पर भी होना चाहिए।"
रातें गुज़रती गईं। सपने में घर धीरे-धीरे आकार लेने लगा — और दोनों के बीच कुछ और भी।
एक रात चाँदनी में, अधूरी सीढ़ियों पर, उनका हाथ एक ही ब्रश पर आ टिका। विवान ने उसका हाथ नहीं हटाया। उसने भी नहीं।
उनके चेहरे इतने क़रीब आ गए कि विवान को उसकी साँसों में चमेली की खुशबू महसूस हुई।
"अगर ये सपना है," उसने फुसफुसाते हुए कहा, "तो मैं कभी जागना नहीं चाहता।"
"तो मत जागो," उसने कहा — और उस रात सपने में पहली बार उसने अपना नाम बताया। "काव्या।"
विवान जागा तो तकिए पर चमेली की खुशबू थी। असली। उसने तकिया उठाकर सूँघा, फिर खुद पर हँस पड़ा — और डर भी गया।
दफ़्तर में वो दिन भर बेचैन रहा। मीटिंगों में उसका ध्यान नहीं लगा। शाम को जब प्रोजेक्ट हेड ने नई फ़ाइल उसके टेबल पर रखी, तो विवान की साँस रुक गई।
"अलीबाग में एक पुराना विला है," हेड ने कहा। "खंडहर हो चुका है। क्लाइंट चाहता है रिस्टोरेशन — हेरिटेज स्टाइल में। साइट की तस्वीरें देख लो।"
विवान ने फ़ाइल खोली। और उसके हाथ काँपने लगे।
वो घर। वही चट्टान। वही समंदर। वही अधूरी सीढ़ियाँ।
"ये... ये तस्वीरें कब की हैं?" उसकी आवाज़ भर्राई।
"पिछले हफ़्ते की। क्यों? कुछ गड़बड़?"
"नहीं," विवान ने झूठ बोला। "बस... डिज़ाइन दिमाग़ में आ रहा है।"
तीन दिन बाद वो अलीबाग की उस चट्टान पर खड़ा था। हवा में वही नमक की खुशबू। लहरों की वही गर्जना। और सामने — उसका सपना, पत्थर और सीमेंट में।
वो अंदर दाखिल हुआ। दीवारें सच में अधूरी थीं — जैसे कोई काम बीच में छोड़कर चला गया हो। और तभी उसकी नज़र अंदर वाली दीवार पर पड़ी।
ताज़ा चारकोल से बना एक स्केच। समंदर की लहरें। बिल्कुल उसके सपने जैसी।
और नीचे कोने में, छोटे अक्षरों में लिखा था — "K."
विवान का दिल इतनी ज़ोर से धड़का कि उसे लगा दीवारें सुन लेंगी। उसने स्केच को छुआ — चारकोल उसकी उँगलियों पर लग गया। ताज़ा था। घंटों पुराना, ज़्यादा से ज़्यादा।
"यहाँ कोई आया था," उसने फुसफुसाया। "आज।"
तभी गेट की चरमराहट सुनाई दी।
विवान पलटा — और वक़्त थम गया।
गेट पर खड़ी थी वही लड़की। हाथ में पेंटब्रश। चेहरे पर रंग की छींटें। तीस साल की। बिल्कुल वैसी, जैसी सपने में।
"काव्या," उसके मुँह से निकला।
"तुम्हें मेरा नाम कैसे—" वो रुक गई। उसकी आँखों में पहले हैरानी, फिर पहचान, फिर आँसू। "विवान।"
दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए। समंदर गरजता रहा।
"मैंने ये घर अपनी स्केचबुक में छह हफ़्तों से बनाया है," काव्या ने काँपती आवाज़ में कहा। "आज सुबह आखिरी पेज पर एक पता लिखा था। मेरी लिखावट में। पर मैंने नहीं लिखा था।"
उसने स्केचबुक बढ़ाई। आखिरी पेज पर — अलीबाग का यही पता।
"और तुम?" उसने पूछा।
"मैं इसे तीन हफ़्तों से सपने में देख रहा हूँ," विवान ने कहा। "हर रात। तुम्हारे साथ।"
तभी आसमान गरजा — अक्टूबर की आखिरी बौछार शुरू हो गई।
दोनों भीगते रहे। न वो हिला, न वो।
"सपने में तुमने मुझसे कुछ कहा था," विवान ने धीरे से कहा, उसके चेहरे से गीली लट हटाते हुए। उसकी उँगलियाँ उसके गाल पर ठहर गईं।
"क्या?" काव्या की साँसें तेज़ हो गईं।
"कि जब घर पूरा हो जाएगा... तो हम मिलेंगे।"
"घर तो अभी भी अधूरा है," काव्या ने कहा, और उसके होंठ काँप रहे थे।
"तो हम इसे साथ पूरा करेंगे," विवान ने कहा — "हक़ीक़त में।"
और फिर उनके होंठ मिले।
बारिश की बूंदें, समंदर की गर्जना, और हफ़्तों का इंतज़ार — सब एक पल में पिघल गया। काव्या की उँगलियाँ उसके गीले बालों में उलझ गईं। विवान ने उसे अपनी बाँहों में भींच लिया, जैसे डर हो कि वो फिर सपने में खो जाएगी।
उस रात चट्टान वाले घर ने दो दिलों की धड़कनें सुनीं — और सुबह तक बारिश थम चुकी थी।
सुबह जब धूप निकली, तो विला के आँगन में दोनों खड़े थे। घर अभी भी अधूरा था।
पर इस बार उसे पूरा करने वाले दो हाथ नहीं थे — चार थे।
और काव्या की स्केचबुक के नए पेज पर, ताज़ी स्याही से लिखा था — "घर नंबर एक: हमारा।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]




Comments
Post a Comment