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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

सारस की जोड़ी

उस सुबह कोहरे में सिर्फ़ एक सारस खड़ा था।

लंबा, सलेटी, सिर पर सुर्ख़ लाल निशान — और वो पुकार रहा था। एक आवाज़, फिर ख़ामोशी। फिर वही आवाज़, जैसे कोई नाम लेकर बुला रहा हो, जिसका जवाब कभी नहीं आता।

ईशा ने कैमरा नीचे कर लिया। अट्ठाईस साल की उम्र में, दिल्ली की वाइल्डलाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र ईशा ने बहुत-सी सुबहें देखी थीं — पर ये सुबह कुछ और थी।

केवलादेव नेशनल पार्क, भरतपुर। अक्टूबर की शुरुआत। मानसून अभी-अभी गया था, झीलें किनारों तक भरी थीं। पानी पर तैरता कोहरा, और उस कोहरे के बीच — वो अकेला सारस।

"राजा है," पीछे से आवाज़ आई। "बारह साल से हर अक्टूबर में यहीं आता है। इसी टापू पर।"

ईशा पलटी। खाकी वर्दी, कंधे पर दूरबीन, उम्र इकतीस के आसपास। आँखों में सुबह जैसी साफ़गोई।

"और रानी?" उसने पूछा।

वो एक पल रुका। "रानी इस साल नहीं आई।"

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समर्थ — फ़ॉरेस्ट गार्ड, आठ साल से केवलादेव में। ईशा टापू की तरफ़ बढ़ी तो उसने रस्सी की बाड़ के पास रोक दिया।

"आगे निषेध क्षेत्र है।"

"मैं सिर्फ़ दो क़दम—"

"दो क़दम भी नहीं।" आवाज़ में नरमी थी, इरादा पत्थर जैसा। "एक ग़लत क़दम, और अगले साल शायद राजा भी न आए।"

बहस का मन था, पर उसकी आँखों की फ़िक्र नकली नहीं थी।

"ठीक है, गार्ड साहब। आपकी झील, आपके नियम।"

"समर्थ," वो पहली बार हल्का-सा मुस्कुराया। "नाम है मेरा।"

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ईशा भरतपुर आई थी "वाइल्डफ़्रेम्स" नेशनल कॉन्टेस्ट के लिए — इस साल की थीम थी "वापसी"। पर रानी के बिना "वापसी" कैसी?

उस शाम उसने राजा की अकेली तस्वीरें लीं। फ़्रेम सुंदर था, पर अधूरा।

"सारस अकेला नाचता है, तो वो प्रेम नहीं होता," समर्थ पास खड़े होकर बोला। "वो मातम होता है।" वो कब आया, पता ही नहीं चला। "कल सुबह पाँच बजे वॉचटावर आ जाना। कोहरा छँटने से पहले का नज़ारा कैमरे में क़ैद करने लायक़ होता है।"

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सुबह साढ़े चार बजे ईशा वॉचटावर पहुँची — लकड़ी का पुराना ढाँचा, झील के किनारे। समर्थ दो कुल्हड़ चाय के साथ पहले से मौजूद था।

"रामकिशन चाचा की दुकान से," उसने एक कुल्हड़ बढ़ाया। "चालीस साल से पार्क के गेट पर चाय बेचते हैं।"

जैसे नाम लिया, सीढ़ियों पर खाँसी गूँजी। छिहत्तर साल के रामकिशन, कमर झुकी हुई, पर आँखों में अब भी पूरी झील। "तो पहले उनकी कहानी सुन लो, बिटिया। कैमरा बाद में।"

कोहरे के पार राजा की पुकार गूँजी।

"गौरी गाँव की सबसे सुंदर लड़की थी, पर उसका प्यार बिरादरी से बाहर का था। घरवालों ने शादी कहीं और तय कर दी — और बारात निकलने से पहले बाढ़ आ गई।"

रामकिशन की आवाज़ धीमी हो गई। "गौरी दुल्हन के जोड़े में घर से निकली — अपने प्यार के पास जाने के लिए। दोनों नाव में बैठे। नाव पलटी। दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे डूब गए।"

सिर्फ़ पानी की छपछप। "अगले अक्टूबर में, पहली बार, इस टापू पर सारस की एक जोड़ी उतरी। तब से हर साल — वही जोड़ी। बुज़ुर्ग कहते हैं — सारस जोड़ी में जीते हैं, जोड़ी में मरते हैं। ये दोनों... ये वही हैं, बिटिया।"

"तुम मानते हो ये सब?" ईशा ने धीरे से पूछा।

समर्थ ने उसकी आँखों में देखा। "मैंने बारह साल में इस जोड़ी को कभी अलग नहीं देखा।" वो रुका। "कुछ कहानियाँ मानने की नहीं होतीं, ईशा। महसूस करने की होती हैं।"

उसके नाम का इस तरह लिया जाना — ईशा के सीने में कुछ हिला।

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अगले दो दिन ईशा ने राजा के साथ बिताए — पुकार रिकॉर्ड की, अकेले नृत्य के फ़्रेम लिए। पर हर फ़्रेम में वही कमी — आधी कहानी।

दूसरी शाम एडिटर का फ़ोन आया। "एंट्री की आख़िरी तारीख़ परसों है, ईशा। जो है वही भेज दो।"

फ़ोन रखकर उसने सुबह की बस की टिकट बुक कर ली।

रात को वो बताने गई — समर्थ गेट के पास टॉर्च लिए गश्त पर था।

"कल सुबह की बस है मेरी," उसने कहा।

टॉर्च की रोशनी नीचे झुक गई। लंबी ख़ामोशी में झींगुर बोलने लगे।

"कल सुबह एक बार और," समर्थ ने कहा। "आख़िरी बार। चार बजे। वॉचटावर। मेरे लिए।"

उस नज़र में वो सब था जो वो कह नहीं पा रहा था। ईशा ने हामी भर दी।

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साढ़े तीन बजे उठकर वो चार बजे वॉचटावर पर थी — अकेली। घना कोहरा; पानी नहीं दिख रहा था, सिर्फ़ सफ़ेद चादर — और उस पार राजा की पुकार।

फिर... एक दूसरी आवाज़।

ईशा की साँस रुक गई। कोहरे के उस पार से जवाब आया था — वही पुकार, वही लय।

पंखों की फड़फड़ाहट। पानी की छपछप। कोहरा फटा — रानी उतरी थी।

बारह साल की साथिन लौट आई थी। दोनों की गर्दनें झुकीं, पंख फैले — और झील के बीचों-बीच वो नृत्य शुरू हुआ जो ईशा ने सिर्फ़ किताबों में पढ़ा था।

काँपते हाथों से उसने शटर दबाया। एक फ़्रेम। दूसरा।

तभी रानी ने उड़ान भरी — सीधी वॉचटावर की तरफ़। जेट्टी के किनारे उतरी, चोंच झुकाई — और कुछ चमकता हुआ छप से गिरा।

ईशा घुटनों के बल झुकी। पानी में हाथ डाला —

एक चाँदी की पायल। चालीस साल पुरानी। नक़्क़ाशी घिस गई थी, पर घुँघरू अब भी सलामत थे। जैसे किसी ने उसे सँभालकर रखा हो।

"ये..." पीछे से रामकिशन की आवाज़ आई। "चालीस साल पहले बाढ़ में गौरी के पैर से बह गई थी। मैंने खुद उसे सुनार की दुकान पर बनते देखा था — यही नक़्क़ाशी, यही घुँघरू।"

उन्होंने झील की तरफ़ देखा, जहाँ दोनों सारस साथ नाच रहे थे। "क़र्ज़ चुका दिया, बिटिया। जो चीज़ बाढ़ ने छीनी थी, वो लौटा दी। अब वो आज़ाद हैं।"

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सीढ़ियों पर आहट हुई — समर्थ, साँस फूली हुई। उसने झील को देखा, फिर ईशा के हाथ की पायल को, फिर ईशा को।

कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी।

वो उसके पास आया — इतना पास कि दोनों की साँसें एक हो गईं। झील पर दोनों सारस नाच रहे थे; यहाँ, जेट्टी पर, दो इंसान।

समर्थ ने उसका हाथ थामा — धीरे से, जैसे कोई नाज़ुक तस्वीर पकड़ता है।

"ईशा," वो फुसफुसाया, "कुछ कहानियाँ मानने की नहीं होतीं..."

"...महसूस करने की होती हैं," उसने पूरा किया।

फिर वो दूरी भी नहीं रही।

(यहाँ कहानी ने पर्दा गिरा दिया — बाकी रात सिर्फ़ उनकी थी।)

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सुबह बरामदे में दो कुल्हड़ थे — एक में चाय, दूसरे में भी चाय। ईशा ने बस की टिकट रद्द कर दी; एडिटर को सिर्फ़ इतना कहा — "मेरी एंट्री मिल गई।"

रामकिशन ने पायल उसके हाथ में रख दी। "अब ये तुम्हारी अमानत है, बिटिया। गौरी की तरफ़ से।"

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एक साल बाद।

"वाइल्डफ़्रेम्स" का नेशनल अवॉर्ड — तस्वीर का नाम था "जोड़ी"। कोहरे में नाचते दो सारस, और जेट्टी पर खड़े दो साये — एक-दूसरे का हाथ थामे।

तस्वीर अब रेस्ट हाउस की दीवार पर टँगी है — नीचे पीतल की प्लेट पर लिखा है, "राजा और रानी के नाम।"

ईशा अब भरतपुर में ही रहती है। उसके दाएँ पैर में वही पुरानी पायल है — घुँघरू अब भी बजते हैं।

हर सुबह, ठीक पाँच बजे, टापू पर दो सारस नाचते हैं। और जेट्टी पर दो इंसान उन्हें देखते हैं — हाथ में हाथ डाले।

सारस जोड़ी में जीते हैं। और कुछ कहानियाँ — जोड़ी में ही पूरी होती हैं।

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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