आधी रात को शहनाई ख़ुद बज उठी — और अनन्या के हाथ से ब्रश छूटकर फ़र्श पर गिर पड़ा।
गुलाबगढ़ हवेली का संगीत-कक्ष पिछले साठ साल से बंद था। उसकी दीवारों पर झूलती पुरानी तस्वीरों में भी कभी किसी ने शहनाई बजाते नहीं देखा था। मगर इस वक़्त, कमरे के बीचों-बीच रखी संदूक के अंदर से एक धुन उठ रही थी — मीठी, उदास और ऐसी जैसे कोई बहुत दूर से किसी का नाम पुकार रहा हो।

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हवेली का संगीत-कक्ष
अनन्या अट्ठाईस साल की थी — पुराने वाद्ययंत्रों की मरम्मत करने वाली। जोधपुर के बाहरी हिस्से में खड़ी गुलाबगढ़ हवेली को एक संग्रहालय में बदलने का काम उसे ही मिला था। हवेली के रखवाले काका रामसिंह ने पहले ही दिन उसे एक ही हिदायत दी थी।
“बिटिया, संगीत-कक्ष की संदूक मत खोलना। वहाँ जो रखा है, वह साठ साल से किसी का इंतज़ार कर रहा है।”
अनन्या ने हँसकर बात टाल दी थी। वह यंत्रों की मरम्मत करती थी, कहानियों की नहीं। मगर तीसरे दिन जब उसने धूल से ढकी संदूक का ताला खोला, तो अंदर एक शहनाई निकली — पीतल की, नक्क़ाशीदार, और इतनी चमकदार जैसे उसे कल ही किसी ने पोंछा हो।
उसकी उँगलियाँ शहनाई को छूते ही ठिठक गईं। धातु गरम थी। जैसे अभी-अभी किसी ने उसे बजाया हो।
आधी रात की धुन
उस रात अनन्या काम ख़त्म करके हवेली में ही रुक गई। ठीक बारह बजे, संदूक के अंदर से धुन उठी।
वह डरी नहीं — अजीब बात थी, पर डर नहीं लगा। धुन में डर था ही नहीं। धुन में इंतज़ार था। अनन्या ने संदूक खोली, शहनाई उठाई, और उसी पल आँगन में चाँदनी कुछ ज़्यादा ही उजली हो गई।
आँगन के बीचों-बीच एक आदमी खड़ा था।
तीस के करीब, हल्के पीले कुर्ते में, आँखों में ऐसी थकान जैसे वह साठ साल से जाग रहा हो। उसके हाथ में भी एक शहनाई थी — हूबहू वही।
“तुमने उसे छुआ,” उसने कहा। उसकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था, सिर्फ़ हैरानी थी। “साठ साल में किसी ने उसे छुआ नहीं।”
“मैं अनन्या हूँ। मैं इस हवेली के यंत्रों की मरम्मत कर रही हूँ। और तुम?”
“कबीर।” वह मुस्कुराया, और उसकी मुस्कान में आधी सदी की उदासी थी। “मैं इस धुन का रखवाला हूँ। जब यह शहनाई बजती है, मैं लौट आता हूँ। जब धुन रुकती है, मैं फिर उसी इंतज़ार में चला जाता हूँ।”
उस रात कबीर ने उसे हवेली की सबसे पुरानी कहानी सुनाई। साठ साल पहले इसी आँगन में एक शादी होनी थी — हवेली की बेटी की शादी। बारात रेगिस्तान के रास्ते आ रही थी, मगर आँधी ने रास्ता बंद कर दिया। बारात कभी पहुँची ही नहीं। और कबीर — उस शादी के लिए बुलाया गया शहनाई-वादक — सारी रात बजाता रहा, इस उम्मीद में कि बारात आ जाएगी। भोर हुई, आँगन ख़ाली था, और धुन का आख़िरी सुर कभी बजा ही नहीं।
“धुन अधूरी रह गई,” कबीर ने धीरे से कहा। “और अधूरी धुन अपने वादक को छोड़ती नहीं।”
सात रातों की सीख
अगली रात अनन्या फिर आई। फिर उसके बाद वाली रात भी।
हर आधी रात को शहनाई बजती, कबीर लौटता, और अनन्या उसके सामने बैठकर धुन सुनती। कभी-कभी कबीर उसे शहनाई पकड़ना सिखाता — उसकी उँगलियाँ अनन्या की उँगलियों पर रखकर सुरों की जगह बताता। उन पलों में अनन्या की साँसें थम जातीं। कबीर का स्पर्श गरम था, ज़िंदा था — जैसे वह कोई परछाईं नहीं, कोई इंसान हो जिसे वक़्त ने रोक रखा हो।

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पाँचवीं रात को चाँद पूरा था। कबीर ने धुन बीच में रोक दी और अनन्या की ओर देखा।
“तुम क्यों आती हो?” उसने पूछा। “यह धुन सुनने वाले तो बहुत आए, पर कोई रुका नहीं।”
“क्योंकि यह धुन अब मुझे अपनी लगती है,” अनन्या ने कहा। “और तुम भी।”
उस पल आँगन की सारी बत्तियाँ जैसे एक साथ झिलमिला उठीं। कबीर ने एक क़दम आगे बढ़ाया। उसकी साँसें अनन्या के चेहरे को छू रही थीं। उनके होंठ एक-दूसरे के इतने क़रीब आ गए कि बीच की हवा भी गरम लगने लगी — और फिर कबीर पीछे हट गया।
“अगर मैं तुम्हें छू लूँ,” उसने कहा, “तो धुन टूट जाएगी। और अगर धुन टूटी, तो मैं चला जाऊँगा।”
“तो धुन को पूरा करो,” अनन्या ने कहा। “बताओ, आख़िरी सुर क्या है?”
कबीर चुप रहा। फिर बोला, “आख़िरी सुर वादक नहीं बजा सकता। वह सुर उसे बजाना होता है जो वादक से प्यार करता हो।”
छठी रात को अनन्या ने पहली बार शहनाई अपने होंठों से लगाई। सुर बिगड़े, साँस उखड़ी, आँखों में पानी आ गया। कबीर ने हँसकर कहा, “शहनाई को ज़ोर से नहीं, दिल से बजाते हैं।” और पूरी रात वह उसे सिखाता रहा — सुर, ठहराव, और वह जगह जहाँ धुन को साँस लेनी होती है।
आख़िरी सुर
सातवीं रात को आँगन में वही चाँद था, वही बत्तियाँ थीं, वही इंतज़ार था। कबीर ने धुन शुरू की — वही धुन जो साठ साल से अधूरी थी। अनन्या उसके सामने बैठी थी, शहनाई हाथों में।
धुन ऊँचाई पर पहुँची। कबीर की आँखें बंद थीं। अनन्या ने देखा — उसके चेहरे पर वही उम्मीद थी जो साठ साल पहले रही होगी।
और तभी, ठीक उस जगह जहाँ धुन हमेशा रुक जाती थी, अनन्या ने शहनाई उठाई और आख़िरी सुर बजा दिया।
एक पल के लिए पूरी हवेली में सन्नाटा छा गया। फिर हवा में जैसे किसी ने मोमबत्तियाँ जला दीं — आँगन की हर बत्ती, हर दिया, हर रोशनी एक साथ जगमगा उठी। कबीर की आँखें खुलीं।
“धुन पूरी हो गई,” उसने फुसफुसाकर कहा।
भोर की पहली किरण आँगन में उतरी। कबीर वहीं खड़ा था। न धुन रुकी थी, न वह गायब हुआ था। साठ साल का इंतज़ार ख़त्म हो गया था — कबीर अब धुन का क़ैदी नहीं, एक ज़िंदा इंसान था।
अनन्या ने उसका हाथ थामा। इस बार कबीर पीछे नहीं हटा। उसने अनन्या को अपनी ओर खींचा, और चाँदनी में बुझती आख़िरी रोशनी के नीचे उनके होंठ मिल गए — लंबा, गहरा, साठ साल के इंतज़ार को समेटता हुआ एक चुम्बन। अनन्या की बाहें उसकी गर्दन के गिर्द कस गईं, और कबीर ने उसे ऐसे थाम लिया जैसे अब कभी छोड़ना ही न हो।

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उसी हफ़्ते गुलाबगढ़ हवेली के आँगन में सचमुच की शादी हुई। वही आँगन, वही बत्तियाँ, वही शहनाई — और इस बार बारात भी आई। जब अनन्या दुल्हन के जोड़े में आँगन में उतरी, तो कबीर ने शहनाई उठाई और वही धुन बजाई — पर इस बार धुन अधूरी नहीं थी। इस बार धुन के आख़िर में अनन्या का सुर भी था।
रात भर हवेली में संगीत गूँजता रहा। और जब सब मेहमान चले गए, तो नवविवाहित जोड़ा आँगन में अकेला रह गया। कबीर ने अनन्या को अपनी बाहों में उठा लिया, और चाँदनी के नीचे उनकी वह रात शुरू हुई जिसकी कहानी शहनाई ने किसी को नहीं सुनाई।
अब गुलाबगढ़ हवेली में शहनाई सिर्फ़ तब बजती है जब अनन्या और कबीर उसे साथ बजाते हैं। लोग कहते हैं, उस धुन को सुनकर अधूरे प्यार पूरे हो जाते हैं। और हवेली के रखवाले काका रामसिंह मुस्कुराकर कहते हैं — “मैंने कहा था न, वह शहनाई किसी का इंतज़ार कर रही थी।”
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।
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