सिक्का हवा में तीन बार पलटा — और फिर उसी तरफ़ गिरा, जिस तरफ़ वो पिछले अठहत्तर साल से गिरता आ रहा था।
नायरा ने उसे हथेली पर उठाया। चित। हमेशा की तरह चित। उसने सिक्के को खिड़की पर रख दिया, और कहा, “आज भी तुमने अपनी बात नहीं बदली।”
नायरा सत्ताईस साल की थी। लखनऊ के अमीनाबाद में उसके दादाजी की पुरानी दुकान थी — ‘पुरानी दुनिया’ — जहाँ पुराने सिक्के और पीतल की लालटेनें रखी थीं। नियम था: रोज़ शाम नायरा उस सिक्के को एक बार उछालती थी। अठहत्तर साल में वो कभी पट नहीं गिरा था।
लोग कहते थे, सिक्का जादुई है। नायरा कहती थी, सिक्का इंतज़ार कर रहा है।

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कबीर
उस शाम दुकान की घंटी बजी, और अंदर एक नौजवान आया — कंधे पर छोटा-सा बैग, हाथ में पुरानी टोपी, आँखों में दुनिया को हैरान करने की चमक।
“मेरा नाम कबीर है — तीस साल का, जयपुर का जादूगर हूँ। सिक्कों का जादू दिखाता हूँ।” उसने टोपी काउंटर पर रखी। “सुना है, यहाँ एक ऐसा सिक्का है, जो कभी पट नहीं गिरता।”
नायरा मुस्कुराई। “सुना तो बहुत कुछ जाता है।”
कबीर ने जेब से एक सिक्का निकाला, हवा में उछाला — और वो नायरा की आँखों के सामने ग़ायब हो गया। फिर नायरा के कान के पीछे से वही सिक्का निकाल दिया। नायरा हँस पड़ी।
“अब तुम्हारा सिक्का,” कबीर ने कहा। “मैं उसे एक बार उछालना चाहता हूँ।”
नायरा ने सिक्का उसकी हथेली पर रख दिया। कबीर ने उछाला — सिक्का घूमा, गिरा, और चित।
“फिर से,” कबीर ने कहा। दूसरी बार — चित। तीसरी बार — चित। दसवीं बार — चित।
कबीर की मुस्कान ग़ायब हो गई। “ये मुमकिन नहीं है,” उसने कहा। “हर सिक्का कभी न कभी पलटता है।”
“यही तो बात है,” नायरा ने कहा। “ये सिक्का कभी नहीं पलटता।”
उसके बाद कबीर रोज़ आने लगा — कभी किसी पुराने सिक्के के बहाने, कभी किसी चाल के बहाने। एक शाम, जब दोनों ने एक ही अलमारी की तरफ़ हाथ बढ़ाया, तो हाथ टकरा गए। कबीर ने हाथ पीछे नहीं हटाया। नायरा ने भी नहीं।
1947 की वो रात
एक रात नायरा ने कबीर को अपनी दादी रेखा की कहानी सुनाई — जिसकी वजह से ये सिक्का दुकान में आया था।
सन् 1947। लखनऊ में गोमती के घाट पर दो लोग मिला करते थे — रेखा, उन्नीस साल की, और देव, इक्कीस साल का। आधी रात को घाट पर, चाँदनी में, उन्होंने इस सिक्के को उछाला था — चित आया तो सुबह दोनों शहर छोड़कर नई ज़िंदगी शुरू करेंगे, पट आया तो हमेशा के लिए अलग हो जाएँगे।
सिक्का चित गिरा था।
पर सुबह देव नहीं आया। रेखा घाट पर अकेली बैठी रही — सुबह से शाम तक। बाद में पता चला, उसी रात देव के परिवार को शहर छोड़ना पड़ा था। कोई ख़त नहीं, कोई विदाई नहीं। रेखा ने फिर कभी शादी नहीं की, और हर शाम सिक्का उछाला — वो हमेशा चित ही गिरा।
“दादी कहती थीं,” नायरा ने कहा, “सिक्का उस फ़ैसले के पूरा होने का इंतज़ार कर रहा है, जो कभी पूरा हुआ नहीं।”
कबीर देर तक ख़ामोश रहा। फिर उसने सिक्का हाथ में लिया, रोशनी में घुमाया — और उसकी साँस रुक गई।

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दोनों तरफ़ चित
“नायरा,” कबीर ने कहा, उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था, जो नायरा ने पहले कभी नहीं सुना, “इस सिक्के के दोनों तरफ़ चित है।”
नायरा ने सिक्का उसके हाथ से लिया। रोशनी में देखा — और सच सामने था। दोनों तरफ़ एक ही निशान था, एक ही चित। ये सिक्का कभी पट गिर ही नहीं सकता था।
“तो कोई जादू नहीं था,” नायरा ने कहा। “दादी ने ये सिक्का बनवाया था?”
कबीर ने उसका हाथ थाम लिया। “शायद तुम्हारी दादी जानती थीं कि फ़ैसला सिक्के का नहीं, दिल का होता है। उन्होंने फ़ैसला पहले ही कर लिया था — सिक्का बस बहाना था।”
नायरा की आँखों में आँसू आ गए — ग़ुस्से के नहीं, पुरानी समझ के। “तो फिर देव क्यों नहीं आया? किस्मत भी साथ थी, फिर भी?”
“क्योंकि,” कबीर ने कहा, “किस्मत दरवाज़ा खोल सकती है, पर उससे गुज़रना इंसान को ख़ुद पड़ता है। देव डर गया होगा। और तुम्हारी दादी ने पूरी ज़िंदगी उस एक रात के इंतज़ार में गुज़ार दी, जो कभी आई ही नहीं।”
उस रात नायरा दुकान में अकेली बैठी रही। सिक्का काउंटर पर पड़ा था — अब वो जादुई नहीं लगता था, बस एक पुराना, चालाक-सा सिक्का। फिर भी वो चित ही गिरा।
अगले दिन कबीर का आख़िरी शो था। फिर उसे दिल्ली जाना था — बड़े थिएटर का बुलावा, महीनों का टूर, बरसों की मेहनत का मौक़ा। नायरा ने सोचा, वो उसे रोकने के लिए कुछ कहेगी। पर वो कुछ कह नहीं पाई — ठीक वैसे ही, जैसे रेखा कभी कुछ कह नहीं पाई थी।
घाट पर आधी रात
आधी रात को नायरा गोमती के घाट पर पहुँची — जहाँ अठहत्तर साल पहले उसकी दादी ने सिक्का उछाला था। चाँदनी पानी पर फैली थी। उसके हाथ में वो सिक्का था।
पीछे से क़दमों की आवाज़ आई — कबीर था, हाथ में वही पुरानी टोपी, आँखों में वही चमक, चेहरे पर जाने वालों वाली उदासी।
“मैं जानता था, तुम यहीं आओगी,” कबीर ने कहा। “जहाँ कहानी शुरू हुई थी, वहीं ख़त्म होनी चाहिए।”
नायरा ने सिक्का बढ़ाया। “एक बार और। इस बार हम दोनों एक साथ उछालेंगे। चित आया, तो मैं कहूँगी — रुक जाओ। पट आया, तो मैं कुछ नहीं कहूँगी।”
कबीर ने उसका हाथ थाम लिया। दोनों ने सिक्के को एक साथ पकड़ा, और हवा में उछाल दिया।
सिक्का ऊपर उठा — घूमा — और गिरने के बजाय अपनी धार पर खड़ा हो गया। पत्थर के घाट पर वो धीरे-धीरे घूम रहा था, जैसे फ़ैसला अभी हो रहा हो। नायरा की साँस रुक गई। कबीर ने उसका हाथ कसकर थाम लिया।
फिर सिक्का हिला — और पट की तरफ़ गिर गया।
अठहत्तर साल में पहली बार। पट।
नायरा ने सिक्के को देखा, फिर कबीर को — समझ आ गया। सिक्के ने अपना काम पूरा कर दिया था; फ़ैसला अब उसके हाथ में था। रेखा की कहानी इसलिए अधूरी रही थी, क्योंकि उसने अपनी बात कभी कही नहीं।
“कबीर,” नायरा ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में कोई हिचक नहीं थी, “मैं सिक्के से नहीं पूछूँगी। मैं ख़ुद कह रही हूँ — रुक जाओ। यहीं, मेरे पास।”
कबीर ने टोपी घाट के पत्थर पर रख दी, और नायरा का चेहरा अपने हाथों में लिया — धीरे, सहमकर, जैसे किसी बहुत पुरानी चीज़ को छू रहा हो। नायरा ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ मिले — लंबा, गहरा, इतना सच्चा कि चाँदनी भी एक पल ठहर गई। उसके बाद की कहानी सिर्फ़ उस रात की ख़ामोशी के पास रह गई।

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कबीर ने दिल्ली का बुलावा ठुकरा दिया। वो लखनऊ में ही रुक गया — ‘पुरानी दुनिया’ के बग़ल में जादू की छोटी-सी क्लास शुरू की, और हर शाम दुकान बंद होने से पहले नायरा के साथ चाय पीता है।
और वो सिक्का? अब वो दुकान की खिड़की पर एक काँच के डिब्बे में है। जब कोई ग्राहक उसे उछालता है, तो वो कभी चित गिरता है, कभी पट — बिल्कुल किसी आम सिक्के की तरह।
क्योंकि अब उसे किसी फ़ैसले का इंतज़ार नहीं है।
स्रोत: यह कहानी काल्पनिक है।
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