छह साल से श्वेता ने उस चाँदी की डिबिया का ढक्कन सिर्फ़ पोंछने के लिए खोला था —
और हर बार — हर एक बार — वो लबालब भरी मिलती थी।
न उसने कभी उसमें सिंदूर डाला था। न किसी और ने। फिर भी डिबिया के अंदर लाल रंग का वो छोटा-सा समंदर कभी घटता नहीं था।
तीस साल की श्वेता कानपुर के पुराने शहर की एक तंग गली में, अपने बासठ साल के पिता सुरेश के साथ रहती थी। घर से ही ग्राफ़िक डिज़ाइन का काम करती — लैपटॉप, चाय, और छत।
छत — जहाँ हर शाम वो कपड़े सुखाने जाती, और जहाँ तीन महीने पहले से एक नई आवाज़ आने लगी थी।
बग़ल वाली हवेली के बँटवारे वाले हिस्से में कोई रहने आया था। पैंतीस साल का तरुण — पुरानी इमारतों को दोबारा ज़िंदा करने वाला आर्किटेक्ट।
पहली मुलाक़ात छत की साझा मुंडेर पर हुई थी। श्वेता की चादर हवा में उड़कर उसके हिस्से में जा गिरी थी।
"माफ़ कीजिएगा," उसने कहा था, चादर लौटाते हुए। "मैं तरुण। तीन-चार महीने का मेहमान हूँ — हवेली का नक़्शा बना रहा हूँ।"
"श्वेता," उसने कहा था — और बस। नाम के आगे कुछ नहीं। न उम्र, न कहानी।
फिर शामें जुड़ने लगीं। वो अपने हिस्से की मुंडेर पर खड़ा चाय पीता। वो अपने हिस्से में कपड़े तह करती।
बातें पहले मौसम की होतीं — "आज बादल घने हैं" — फिर किताबों की, फिर उन सपनों की जो अधूरे रह गए थे।
तरुण ने कभी नहीं पूछा — तुम्हारी माँग में सिंदूर क्यों नहीं? तुम्हारे हाथ में चूड़ियाँ क्यों नहीं?
और शायद इसीलिए श्वेता उसके सामने ज़्यादा देर रुकने लगी थी।

उसके पति को गए चार साल हो चुके थे। दो साल की शादी — एक सड़क हादसा — और फिर वो ख़ामोशी जो मातम से भी ज़्यादा लंबी होती है।
सास उर्मिला देवी भी उसी साल चल बसी थीं। जाते-जाते श्वेता के हाथ में ये चाँदी की डिबिया थमा गई थीं — "मेरी शादी की है, बेटा। अब तुम्हारी।"
श्वेता ने उसके बाद सिंदूर नहीं लगाया। डिबिया अलमारी के सबसे ऊपर वाले खाने में रख दी — नज़रों से दूर, यादों से नहीं।
पर डिबिया ने उसका पीछा नहीं छोड़ा।
एक सुबह सफ़ाई करते हुए उसने ढक्कन खोला — डिबिया भरी थी। "शायद सासू माँ ने भरकर दी थी," उसने सोचा।
हफ़्ते भर बाद फिर खोला — उतनी ही भरी। महीने भर बाद — वही।
छह साल। दो साल उसने रोज़ लगाया था — डिबिया आधी हो जानी चाहिए थी। चार साल उसने छुआ तक नहीं।
हिसाब नहीं बैठता था।
एक रात उसने जानबूझकर एक चम्मच सिंदूर निकालकर काग़ज़ की पुड़िया में बाँधा और दराज़ में रख दिया।
अगली सुबह डिबिया खोली — लबालब। जैसे किसी ने रात में आकर भर दी हो।
उसके हाथ काँपने लगे। उसने ढक्कन बंद किया और डिबिया वापस अलमारी में रख दी — सबसे ऊपर, सबसे पीछे।

उस शाम छत पर तरुण ने पूछा — "आज कुछ परेशान लग रही हैं?"
"नहीं तो," श्वेता ने कहा — और पहली बार उससे नज़र चुराई।
पर तरुण वो नहीं था जो सवालों से भागता। उसने अपनी चाय का कुल्हड़ उसकी ओर बढ़ाया — "आधी-आधी?"
श्वेता हँस पड़ी — चार साल में पहली बार इतनी खुलकर। और फिर उसने बता दिया। डिबिया के बारे में। सब कुछ।
तरुण ने ध्यान से सुना। फिर बोला — "मेरी दादी कहती थीं — कुछ चीज़ें इंतज़ार करती हैं। घड़ी नहीं देखतीं, बस इंतज़ार करती हैं।"
"किसका इंतज़ार?" श्वेता ने पूछा।
"जिसका हक़ हो," तरुण ने कहा — और मुंडेर के उस पार देखता रहा।
उस रात बारिश हुई — सावन की पहली झड़ी। श्वेता खिड़की पर बैठी बूँदें गिनती रही।
और गिनते-गिनते उसे याद आया — सासू माँ की वो शाम। डिबिया देते हुए उन्होंने कहा था —
"जिस दिन तुम्हें फिर से मुस्कुराने की वजह मिल जाए, बेटा — समझना, डिबिया ने इजाज़त दे दी।"
उस वक़्त श्वेता को ये बात समझ नहीं आई थी। दुःख में कही गई बात लगी थी।
आज — छह साल बाद — वो बात उसके सीने में कहीं अटक गई।
अगले दिन गली की दो आंटियों ने पिता से कहा — "सुरेश जी, बिटिया अभी जवान है... अकेली कब तक?"
पिता ने कुछ नहीं कहा। बस शाम को श्वेता के कमरे में आए, उसके सिर पर हाथ रखा — "बेटा, तेरी माँ होती तो यही कहती — ज़िंदगी रुकने का नाम नहीं।"
"पापा, वो डिबिया..." श्वेता ने धीरे से कहा।
सुरेश मुस्कुराए — "वो तेरी सास की माँ की थी। उर्मिला ने मुझे बताया था — ये डिबिया कभी ख़ाली नहीं होती। ये इंतज़ार करती है।"
"इंतज़ार? किसका?"
"उसका — जिसके दिल में मोहब्बत फिर से जाग जाए।" पिता ने कहा। "तेरी सास कहती थीं — सिंदूर बाँटने की चीज़ है, बचाने की नहीं। जो बाँटता है, उसका कभी घटता नहीं।"
श्वेता की आँखें भर आईं। छह साल से वो एक चमत्कार से डर रही थी — और वो चमत्कार दरअसल इजाज़त थी।
उस शाम वो डिबिया लेकर छत पर गई।
आसमान में बादल घुमड़ रहे थे। तरुण अपनी मुंडेर पर था — रोज़ की तरह, चाय के दो कुल्हड़ लिए।
"आज दो क्यों?" श्वेता ने पूछा।
"आदत," तरुण ने कहा — और एक कुल्हड़ उसकी ओर बढ़ा दिया।
श्वेता ने डिबिया उसके सामने रखी। ढक्कन खोला। लाल सिंदूर शाम की रोशनी में दहक उठा।
"ये कभी ख़ाली नहीं होती," उसने कहा। "छह साल से।"
तरुण ने डिबिया को देखा, फिर उसे। "तो आज इसे थोड़ा ख़ाली कर दो।"
"मतलब?"
"मतलब — जो चीज़ बाँटने के लिए बनी हो, उसे बाँधकर क्यों रखा है?" उसने धीरे से कहा।
तभी बादल गरजा। श्वेता चौंकी — डिबिया उसके हाथ से छूटने को हुई।
तरुण ने आगे बढ़कर डिबिया थाम ली। उसके हाथ ने उसका हाथ छू लिया — एक पल के लिए, पर उस एक पल में छह साल की ख़ामोशी टूट गई।
बारिश की पहली बूँदें गिरने लगीं। दोनों मुंडेर के साये में सिमट आए — कंधे से कंधा छूता हुआ।
श्वेता ने काँपती उँगलियों से एक चुटकी सिंदूर उठाया।
तरुण ने कुछ नहीं कहा। बस देखा — इज़्ज़त से, इंतज़ार से, मोहब्बत से।
उसने सिंदूर अपनी माँग में लगाया — धीरे, डरते, और फिर पूरे यक़ीन से।
बारिश तेज़ हो गई। बूँदें उसके चेहरे पर गिरीं — पर वो हिली नहीं। वो मुस्कुरा रही थी।

"अब?" तरुण ने पूछा — आवाज़ में वो कँपकँपाहट थी जो सिर्फ़ सच्ची मोहब्बत में होती है।
"अब डिबिया बंद कर दो," श्वेता ने कहा — "और कल सुबह खोलकर देखना।"
"क्यों?"
"क्योंकि अब ये मेरे लिए नहीं भरेगी," वो बोली — "अब ये हम दोनों के लिए भरेगी।"
उस रात श्वेता सोई — छह साल में पहली बार, बिना डर के।
सुबह उसने डिबिया खोली — लबालब भरी थी।
पर इस बार वो चौंकी नहीं। वो मुस्कुराई — और एक चुटकी सिंदूर निकालकर माँग में सजा लिया।
क्योंकि अब वो जानती थी — मोहब्बत बाँटने से घटती नहीं।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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