पहली बारिश की शाम करण ने भट्टी जलाई — और उसी शाम दरवाज़े पर वो आई, हाथ में मैले कपड़े की एक पोटली लिए।
बीकानेर का पुराना सराफ़ा बाज़ार — ऊपर जूनागढ़ की दीवारों पर डूबते सूरज की आख़िरी लालिमा।
चौंतीस साल का करण — तीसरी पीढ़ी का सुनार — भट्टी के सामने बैठा सोने की एक चूड़ी पर नक़्क़ाशी कर रहा था।
"भाईसाहब," आवाज़ आई — साफ़, थोड़ी हिचक वाली। "ये... देख लेंगे?"
उसने ऊपर देखा। सत्ताईस-अट्ठाईस की एक लड़की। भीगी हुई — बारिश ने उसके बालों को माथे पर चिपका दिया था। हाथ में पोटली।
"बैठिए," करण ने स्टूल बढ़ाया। "बारिश से आई हैं?"
"दिल्ली से," वो बोली, पोटली खोलते हुए। "नताशा। आर्काइव में काम करती हूँ — पुराने दस्तावेज़, ख़त, तस्वीरें।"
पोटली से निकली एक चीज़ — और करण की नक़्क़ाशी वाली सुई एक पल को रुक गई।
सोने की मोहर। बड़ी, भारी, किनारों पर महीन नक़्क़ाशी। साठ-पैंसठ साल पुरानी — पर चमक ऐसी जैसे कल ही ढली हो।
"दादी की संदूक़ से मिली," नताशा ने कहा। "तबस्सुम दादी। पिछले महीने... गुज़र गईं।" उसकी आवाज़ एक पल को डूबी, फिर सँभल गई। "वसीयत में लिखा था — 'मेरी मोहर बीकानेर के सुनार को दिखाना।' बस इतना।
करण ने मोहर उठाई — अँगूठे और तर्जनी के बीच वज़न साधा, दादाजी वाला अंदाज़।
और फिर उसने किनारा देखा — नक़्क़ाशी के बीच एक छोटा-सा निशान। दो अक्षर, घिसे हुए पर पढ़ने लायक।
"आर.जे." — रतनलाल जौहरी। उसके दादाजी का निशान।
करण की साँस एक पल को अटक गई।
"ये मोहर..." उसने धीरे से कहा, "मेरे दादाजी ने बनाई है।"
नताशा की आँखें फैल गईं। "साठ साल पहले? आपको कैसे पता?"
"ये निशान।" करण ने मोहर उसकी तरफ़ बढ़ाई। "दादाजी हर चीज़ पर अपना निशान छोड़ते थे — कहते थे, 'सोना बिकता है, निशान नहीं।'"
उस रात करण गोदाम में गया — जहाँ दादाजी की पुरानी बही-खाते रखी थीं। उसने 1966 वाला रजिस्टर निकाला — और एक पन्ने पर उँगली रुक गई।
"12 अगस्त 1966 — सोने की मोहर, जोड़ा — 'त.' के लिए। एक सुपुर्द, एक बाक़ी।"
करण ने पन्ना दो बार पढ़ा। जोड़ा — यानी दो मोहरें बनी थीं। एक दे दी गई, दूसरी... बाक़ी।
दादाजी 1998 में गुज़र गए थे। अट्ठाईस साल से वो "बाक़ी" मोहर कहाँ थी, किसी को नहीं पता था।
अगली सुबह नताशा फिर आई — इस बार भीगी नहीं, पर आँखों में वही सवाल।
"कुछ पता चला?"

करण ने रजिस्टर का पन्ना उसके सामने रखा। "आपकी दादी की मोहर जोड़े की एक है। दूसरी... मेरे दादाजी के पास ही रह गई थी।"
"जोड़े की?" नताशा ने मोहर को देखा। "मतलब दादी की मोहर अधूरी है?"
"या दोगुनी क़ीमती," करण मुस्कुराया। "जोड़ा मिल जाए तो।"
वो हँस पड़ी — पहली बार, खुलकर। और करण को लगा, भट्टी की आँच एक पल को तेज़ हो गई।
दिन बीतने लगे। नताशा रोज़ आती — कभी मोहर के बारे में, कभी दादी की डायरी के पन्ने लिए, कभी बस चाय के बहाने।
तबस्सुम दादी की डायरी — 1966 की — में एक पन्ने पर लिखा था: "आज 'र.' ने मोहर दी। कहा — जोड़ा बनवाया है, एक तुम्हारी, एक मेरी। जब दोनों पास होंगी... तब समझना।" आगे का पन्ना फटा था।
"ये 'र.' आपके दादाजी?" नताशा ने पूछा। करण ने सिर हिलाया — रतनलाल। "डायरी में बस एक और लाइन है — 'वो चले गए, मोहर रह गई।'"
उस शाम करण ने दादाजी का पुराना औज़ारों वाला संदूक़ खोला — जिसे माँ ने गोदाम में रखवा दिया था।
कपड़े की तहों के बीच, एक छोटी-सी डिबिया। अंदर मखमल पर — सोने की मोहर। हू-ब-हू वैसी ही, बस किनारे का निशान थोड़ा गहरा।
करण ने दोनों मोहरों को — नताशा वाली और ये — अपनी हथेलियों में लिया। और तभी...
गर्म। हलकी-सी गर्माहट, जैसे धूप में रखी हों। पर दुकान में धूप कहाँ थी? शाम के सात बजे थे, भट्टी बुझी हुई थी।
उसने मोहरें अलग कीं — ठंडी। पास लाया — फिर गर्म।
करण की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। दादाजी कहते थे — "सोना अपने जोड़े को पहचानता है, बेटा।" वो इसे कहावत समझता था।
अगले दिन उसने नताशा को दुकान के पीछे वाले कमरे में बुलाया। दोनों मोहरें उसके सामने रखीं।
"हाथ बढ़ाइए," उसने कहा।
नताशा ने हथेली फैलाई। करण ने अपनी मोहर उसकी हथेली पर रखी — और अपनी हथेली उसकी हथेली के नीचे लगा दी।
एक पल। दो पल।
"गर्म..." नताशा ने फुसफुसाया। "ये... कैसे?"
"पता नहीं," करण ने ईमानदारी से कहा। "पर दादाजी की बही में लिखा है — 'जब दोनों पास होंगी, तब समझना।'"
"समझना क्या?"
करण ने उसकी आँखों में देखा। "शायद यही — कि कुछ चीज़ें साठ साल इंतज़ार कर सकती हैं।"
उनके हाथ अभी भी जुड़े थे — मोहर बीच में, गर्म। नताशा ने हाथ नहीं हटाया। करण ने भी नहीं।

पर कहानी इतनी आसान नहीं थी। तीसरे दिन मुंबई का एक डीलर आया — चिकनी बातें, बड़ी बोली। करण की माँ बोलीं, "इतने में दुकान का क़र्ज़ उतर जाएगा। लड़की को समझा — बेच दे।" और नताशा को दिल्ली से फ़ोन आ रहे थे — "कब लौट रही हो?"
"परसों की ट्रेन है," नताशा ने एक शाम कहा। करण कुछ न बोला — जूनागढ़ की दीवारों पर शाम उतर रही थी।
"तुम्हें... जोड़ा मिलाना चाहिए था न?" नताशा ने पूछा। "दादी की ख़्वाहिश?"
"वसीयत में लिखा था — 'बीकानेर के सुनार को दिखाना,'" करण ने कहा। "शायद वो जानती थीं — सुनार कौन होगा।"
नताशा रुक गई। "मतलब?"
"मतलब ये," करण ने जेब से दूसरी मोहर निकाली, "कि साठ साल पहले दो लोगों ने एक जोड़ा बनवाया था। और साठ साल बाद... वो जोड़ा ख़ुद मिल गया।"
बारिश शुरू हो गई थी — हलकी, रेत की ख़ुशबू वाली। बाज़ार की बत्तियाँ धुंध में तैरने लगीं।
"करण..." नताशा की आवाज़ काँप रही थी।
"एक शर्त पर दूँगा ये मोहर," करण ने कहा, मोहर उसकी हथेली पर रखते हुए। "कि तुम इसे बेचोगी नहीं। न डीलर को, न किसी को।"
"और दूसरी शर्त?"
"दूसरी शर्त..." वो उसके इतना क़रीब आया कि बारिश की बूँदें दोनों के चेहरों पर एक जैसी चमकने लगीं, "कि तुम परसों की ट्रेन... एक हफ़्ते आगे बढ़ा दो।"
नताशा हँस पड़ी — आँसुओं के बीच। "ये शर्त है या..."
"दोनों," करण ने कहा — और उसके माथे को हलके से छू लिया, जैसे कोई वादा हो।
बाक़ी रात सिर्फ़ बारिश जानती है।

सुबह — आख़िरी सुबह नहीं, पहली सुबह — करण ने दोनों मोहरों को एक ही धागे में पिरोया। बीच में एक छोटी-सी कड़ी — नई, उसके हाथ की बनी।
"साठ साल, दो मोहरें, एक धागा," उसने नताशा के गले में पहनाते हुए कहा। "दादाजी का निशान भी रहेगा, दादी की मोहर भी।"
नताशा ने आईने में देखा — मोहरें सीने पर, गर्म। हमेशा की तरह गर्म।
"दिल्ली कब?" करण ने पूछा।
"एक हफ़्ते बाद," नताशा मुस्कुराई। "और उसके बाद... हर महीने। बीकानेर-दिल्ली की ट्रेन अब मेरी सबसे पसंदीदा होगी।"
करण ने भट्टी की तरफ़ देखा — आज उसे जलाने की ज़रूरत नहीं थी। कुछ आँचें बिना आग के भी जलती हैं।
कहते हैं, बीकानेर के सराफ़ा बाज़ार में आज भी वो दुकान है — जहाँ सुनार हर जोड़े के गहने में एक छोटा-सा निशान छोड़ता है।
और जो ग्राहक पूछते हैं — "ये निशान कैसा?" — वो मुस्कुराकर कहता है:
"कुछ चीज़ें पिघलती नहीं — वो इंतज़ार करती हैं।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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