चार बजे की घंटियाँ। दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर अभी-अभी पहला दीया जला था, और गंगा की सतह पर सोने जैसी लकीरें बनने लगी थीं। बनारस जाग रहा था — धीरे-धीरे, जैसे कोई बुज़ुर्ग अपनी गहरी नींद से उठता है।
मीरा ने छत पर घुंघरू बाँधे और पहला ठुमका लगाया — उसी पल नीचे गली से एक 'क्लिक' की आवाज़ आई।
वह रुक गई। गली में एक आदमी खड़ा था — कंधे पर बड़ा-सा कैमरा, लेंस उसकी ओर उठा हुआ। सुबह की धुँधली रोशनी में उसका चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था।
"माफ़ कीजिए," उसने हाथ उठाकर कहा, "आपकी इजाज़त के बिना एक फ़ोटो ले ली। सॉरी।"
उनतीस साल की मीरा को ग़ुस्सा कम, हैरानी ज़्यादा हुई। वो रोज़ सुबह इसी छत पर रियाज़ करती थी — पाँच साल से। आज तक किसी ने उसे 'शूट' नहीं किया था।
"फ़ोटो डिलीट कीजिए," उसने नीचे आकर कहा। "मैं कोई मंज़र नहीं हूँ, जो आप फ़्रेम में क़ैद कर लें।"
आदमी ने बिना बहस किए कैमरा उठाया, दो बटन दबाए, और स्क्रीन उसकी ओर कर दी। "डिलीट हो गई। मेरा नाम अर्णव है — बत्तीस साल का, दिल्ली से आया फ़ोटोग्राफ़र। 'भोर का बनारस' नाम से एक फ़ोटो-निबंध बना रहा हूँ।"
मीरा ने उसकी आँखों में देखा — वहाँ न तो चालाकी थी, न अफ़सोस का नाटक। सिर्फ़ सच्चाई। "मीरा," उसने कहा, "कथक सिखाती हूँ — नीचे वाली हवेली में। और अगर आपको भोर का बनारस देखना है, तो कैमरा नीचे रखिए। पहले बनारस को जीना पड़ता है, फ़ोटो बाद में।"
अर्णव हँसा। "तो आप मेरी गाइड बनेंगी?"
"गाइड नहीं," मीरा ने कहा, "बस एक शर्त पर — कल सुबह की नाव मेरे साथ।"
अगली सुबह चार बजे अर्णव घाट पर था। मीरा पहले से वहाँ थी — गहरे नीले रंग की साड़ी में, हाथ में छोटा-सा दिया।
नाव धीरे-धीरे पानी पर तैरने लगी। केवट बूढ़ा था, चुपचाप चप्पू चलाता रहा। दूर मणिकर्णिका की ओर से धुआँ उठ रहा था, और इस पार अस्सी घाट पर कोई शंख बजा रहा था।
"मेरे पिता तबला बजाते थे," मीरा ने अचानक कहा। "इसी घाट के पास एक छोटी-सी सभा में। मैं सात साल की थी, जब उन्होंने मुझे पहली बार घुंघरू पहनाए थे। कहते थे — 'बेटा, तबले की थाप और पैरों की थाप में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि एक हाथ से निकलती है, दूसरी दिल से।'"
अर्णव ने कैमरा नीचे रख दिया। कुछ पल ऐसे होते हैं, जिन्हें फ़्रेम में नहीं, याद में रखना चाहिए।
"और आप?" मीरा ने पूछा। "दिल्ली छोड़कर बनारस क्यों?"
अर्णव देर तक गंगा को देखता रहा। "दो साल पहले तलाक़ हुआ," उसने धीरे से कहा। "बारह साल की शादी, एक झटके में ख़त्म। उसके बाद कैमरा ही मेरा साथी बना। लगा — लोगों के चेहरों में वो सुकून ढूँढूँ, जो अपनी ज़िंदगी में खो दिया था।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना हाथ नाव के किनारे पर रखा — अर्णव के हाथ के बिल्कुल पास, छुए बिना। कभी-कभी ख़ामोशी सबसे अच्छा जवाब होती है।
सूरज निकला। पहली किरण ने पानी को सोना बना दिया, और घाटों की सीढ़ियाँ एक-एक करके रोशनी में नहाने लगीं। अर्णव ने एक फ़ोटो ली — नाव, पानी, और दूर खड़ी मीरा की सिल्हूट। इस बार इजाज़त माँगने की ज़रूरत नहीं थी; मीरा ने ख़ुद पलटकर मुस्कुराया था।
"अच्छी है," मीरा ने स्क्रीन देखकर कहा। "मगर इसमें मैं नहीं, बनारस है।"
"फ़र्क़ क्या है?" अर्णव ने पूछा।
मीरा हँसी — पहली बार खुलकर। "यही तो आपको समझना है, फ़ोटोग्राफ़र साहब।"
दिन ढलने लगा। मीरा उसे अपनी हवेली ले गई — दो सौ साल पुरानी, लकड़ी के झरोखों वाली। अंदर दस-बारह बच्चियाँ फ़र्श पर बैठी थीं, घुंघरू बाँधे।
"ये मेरी दुनिया है," मीरा ने कहा। "माँ के जाने के बाद पिता ने यही हवेली बेचने से मना कर दिया था। कहते थे — 'दीवारों में सुर बसे हैं, बेटा। इन्हें मत बेचना।'"
अर्णव ने देखा — मीरा जब बच्चों को 'तत्कार' सिखा रही थी, तो उसके चेहरे पर वही चमक थी, जो सुबह गंगा पर थी। उसने चुपके से दो-तीन फ़ोटो लीं — इस बार मीरा ने देखा, और मना नहीं किया।
शाम को दोनों अस्सी घाट के पास एक छोटी-सी चाय की दुकान पर बैठे। कुल्हड़ की चाय, सामने बहती गंगा, और बीच में एक अजीब-सी ख़ामोशी — जो अजनबियों के बीच नहीं होती।
"कल सुबह," अर्णव ने कहा, "क्या आप घाट की सीढ़ियों पर नाचेंगी? सिर्फ़ मेरे कैमरे के लिए नहीं — उस फ़ोटो-निबंध के लिए, जो शायद कभी छपेगा भी नहीं। बस... इस सुबह को याद रखने के लिए।"
मीरा ने चाय का कुल्हड़ नीचे रखा। "शर्त वही — कोई पोज़ नहीं, कोई रीटेक नहीं। जो होगा, एक बार में होगा।"
अगली सुबह पाँच बजे घाट ख़ाली था। मीरा सीढ़ियों पर उतरी — लाल साड़ी, घुंघरू, और आँखों में वही पुरानी चमक। अर्णव ने कैमरा उठाया, और मीरा ने पहला कदम रखा।
तबला नहीं था, हारमोनियम नहीं था — सिर्फ़ लहरों की आवाज़ और दूर बजती घंटियाँ। मगर मीरा के पैरों में वो लय थी, जो सालों के रियाज़ से आती है। वो नाची — अपने पिता के लिए, बनारस के लिए, और शायद... उस अजनबी के लिए, जो अब अजनबी नहीं रहा था।
अर्णव की उँगली शटर पर थी, मगर कई पल उसने फ़ोटो नहीं ली। कुछ पल जीने के लिए होते हैं, क़ैद करने के लिए नहीं — ये बात उसे बनारस ने सिखाई थी।
नाच ख़त्म हुआ। मीरा हाँफ रही थी, माथे पर पसीने की बूँदें, होंठों पर मुस्कान। अर्णव ने कैमरा नीचे रखा और ताली बजाई — धीरे-धीरे, दिल से।
"तो?" मीरा ने पूछा। "मिली आपकी सुबह?"
अर्णव ने स्क्रीन पर आख़िरी फ़ोटो दिखाई — सूरज की पहली किरण में नाचती मीरा, पीछे जागता बनारस। "मिली," उसने कहा। "और साथ में कुछ और भी — जो मैं ढूँढने नहीं आया था।"
मीरा ने नज़रें झुका लीं, फिर उठाईं। "अर्णव... आप कब लौट रहे हैं दिल्ली?"
"टिकट तो परसों का था," उसने कहा। "मगर अभी-अभी कैंसिल किया। एक हफ़्ता और... अगर बनारस इजाज़त दे, तो।"
"बनारस तो इजाज़त दे देगा," मीरा ने मुस्कुराकर कहा। "बस... रोज़ सुबह चार बजे घाट पर मिलना होगा।"
दोनों हँस पड़े। गंगा बहती रही — जैसे हज़ारों साल से बहती आई है, हज़ारों कहानियाँ अपने साथ लिए।
कुछ रिश्ते फ़ोटो में नहीं क़ैद होते। वो सुबह की पहली किरण की तरह होते हैं — दिखते हैं, महसूस होते हैं, और हमेशा के लिए याद रह जाते हैं।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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