मीरा की आँख उस रात ठीक बारह बजकर सात मिनट पर खुली — जैसे किसी ने उसके नाम की पुकार आसमान से लगाई हो।
खिड़की के बाहर आसमान जल रहा था — उल्काओं की बारिश हो रही थी, एक के बाद एक चाँदी की लकीरें अँधेरे को चीरती हुई। मीरा चादर हटाकर नंगे पाँव छत पर चली गई। सत्रह साल से वह हर साल इसी रात, इसी वक़्त, इसी छत पर आती थी, और हर साल एक ही दुआ माँगती थी — जिसकी अब उसे आदत रह गई थी, उम्मीद नहीं।
तभी आसमान का सबसे चमकीला तारा हिला।
पहले वह काँपा। फिर वह अपनी जगह से टूटा — और धीरे-धीरे, एक जलती हुई लकीर बनकर, नीचे उतरने लगा। वह किसी उल्का की तरह तेज़ नहीं था; वह ऐसे गिर रहा था जैसे कोई थका हुआ मुसाफ़िर घर लौट रहा हो। तारा झील की ओर जा रहा था, उसी झील की ओर, जिसके किनारे सत्रह साल पहले दो बच्चों ने एक वादा किया था।

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टूटता तारा
सुबह मीरा झील के किनारे पहुँची तो वहाँ सिर्फ़ ठंडी हवा, भीगी घास और पानी पर तैरती धुंध थी। मगर किनारे की रेत पर कुछ चमक रहा था — एक पत्थर, हथेली जितना बड़ा, दूधिया-सुनहरी रोशनी से दमकता हुआ। मीरा ने उसे उठाया तो वह गरम था। और धड़क रहा था, जैसे उसके अंदर कोई छोटा-सा दिल हो।
“उसे नीचे रख दीजिए।”
आवाज़ सुनकर मीरा चौंकी। किनारे पर एक आदमी खड़ा था — ऊँचा कद, आँखों पर चश्मा, हाथ में एक पुरानी डायरी। उसके चेहरे पर सत्रह साल की दूरी थी, मगर मीरा ने उसे एक ही पल में पहचान लिया।
“आरव?”
“मीरा।” उसने धीरे से कहा, जैसे नाम नहीं, कोई भूली हुई धुन दोहरा रहा हो। “तुम अब भी हर साल इस रात यहाँ आती हो?”
“मैं लौट आया हूँ — ऊपर वेधशाला में खगोलशास्त्री की नौकरी मिली है।” आरव ने आसमान की ओर देखा। “कल रात मैंने देखा, एक तारा अपनी कक्षा से टूटा। वैज्ञानिक रूप से यह असंभव है — तारे अपनी जगह से टूटकर गिरते नहीं। मगर वह गिरा, और मुझे लगा जैसे वह इसी झील में गिरा है।”
मीरा ने हथेली खोली। पत्थर की रोशनी अब और तेज़ हो गई थी — जैसे आरव को देखकर वह खिल उठा हो।
झील में गिरा आसमान
“यह क्या है?” मीरा ने पूछा।
“मुझे नहीं पता। मगर…” उसने पत्थर को छुआ तो रोशनी धड़ककर तेज़ हुई, फिर नरम हो गई। “जब मैं अकेला था, यह ठंडा था। तुम्हारे हाथ में यह गरम हुआ। और अब…”
“और अब?”
“अब यह धड़क रहा है।” आरव ने मीरा की आँखों में देखा। “जैसे दो दिलों की धड़कन एक हो गई हो।”
“यह तुम्हें पहचानता है,” आरव ने धीरे से कहा। “और मुझे भी। मगर हम दोनों को एक साथ।”

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वादा जो आसमान ने रखा था
रात को वे झील के किनारे वाले पुराने चीड़ के पेड़ के पास गए। पेड़ की छाल पर अब भी वह निशान था — दो नाम, एक दिल, और नीचे लिखा हुआ एक वाक्य: “हर साल, इसी रात, इसी जगह।”
“मुझे याद है,” मीरा ने कहा, उसकी आवाज़ में सत्रह साल की दूरी काँप रही थी। “हमने कहा था — चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हों, सत्रह अक्टूबर की रात हम दोनों आसमान की ओर देखेंगे। और अगर कोई टूटता तारा दिखे, तो समझेंगे कि दूसरा भी देख रहा है।”
“और एक हफ़्ते बाद मेरे पिता का तबादला हो गया,” आरव ने कहा। “हम दिल्ली चले गए। मैंने तीन साल तक चिट्ठियाँ लिखीं। फिर…”
“फिर चिट्ठियाँ आनी बंद हो गईं,” मीरा ने कहा। “और मैंने सोचा, तुम भूल गए।”
“मैं नहीं भूला। मैंने खगोलशास्त्र इसीलिए पढ़ा, मीरा — मुझे लगता था, अगर मैं आसमान को समझ लूँ, तो एक दिन उसी तारे को ढूँढ लूँगा जिसके नीचे हमने वादा किया था। और कल रात…” उसने पत्थर की ओर देखा, जो उनकी हथेलियों के बीच सुनहरी आग की तरह जल रहा था। “कल रात वह तारा ख़ुद मुझे ढूँढता हुआ यहाँ आ गया।”
“तुम्हें पता है,” उसने फुसफुसाकर कहा, “मैंने कल रात एक दुआ माँगी थी। मैंने कहा था — अब और नहीं। अब मैं इंतज़ार नहीं करूँगी। और उसी पल तारा टूटा।”
वापसी की रात
अगली रात वे फिर झील के किनारे आए। आसमान साफ़ था, तारे टिमटिमा रहे थे — मगर एक जगह ख़ाली थी, वहीं जहाँ से कल रात तारा टूटा था।
मीरा ने पत्थर को दोनों हाथों में लिया। “अब क्या होगा?”
“मुझे लगता है,” आरव ने कहा, “यह वापस जाना चाहता है। मगर तब तक नहीं, जब तक हम वह बात न कह दें जो सत्रह साल से अधूरी है।”
ख़ामोशी छा गई। झील का पानी चाँदनी में चमक रहा था। मीरा ने आरव की ओर देखा — वही चेहरा, जो बचपन से उसके दिल के सबसे सुरक्षित कोने में रखा था। और आरव ने मीरा को देखा — वही आँखें, जिनकी ख़ातिर वह आसमान का हर तारा छान आया था।
“मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया, आरव,” मीरा ने कहा। “हर साल। हर रात। हर टूटते तारे के साथ। मैंने कभी किसी और को वह जगह नहीं दी, जो तुम्हारी थी।”
आरव ने उसके हाथ थाम लिए — पत्थर अब उनकी हथेलियों के बीच था, और उसकी रोशनी इतनी तेज़ हो गई कि झील का किनारा दिन की तरह जगमगा उठा। “और मैं हर रात आसमान में तुम्हें ढूँढता रहा, मीरा — हर तारे में, हर उल्का में। मुझे लगा था मैंने तुम्हें खो दिया है। मगर अब समझ आया, मैं तुम्हें खोया ही नहीं था — तुम इसी झील के किनारे, इसी आसमान के नीचे, मेरा इंतज़ार कर रही थीं।”
फिर वह पल आया, जिसका इंतज़ार दो दिलों ने सत्रह साल किया था। आरव ने धीरे से मीरा का चेहरा अपनी हथेलियों में लिया। उनके चेहरे इतने क़रीब आ गए कि एक-दूसरे की धड़कन सुनाई देने लगी। आरव के होंठ मीरा के माथे को छुए — एक लंबा, नरम, सत्रह साल की दूरी को पिघला देने वाला स्पर्श। फिर मीरा ने उसकी आँखों में देखा, और दोनों के होंठ एक-दूसरे से मिल गए — एक ऐसे चुंबन में, जिसमें सत्रह साल का इंतज़ार, सारी अधूरी चिट्ठियाँ और सारे टूटे वादे एक साथ घुल गए।
और उसी पल पत्थर उनकी हथेलियों से उठा।
वह ऊपर उठा — धीरे-धीरे, सुनहरी रोशनी की एक गेंद की तरह — और आसमान की ओर बढ़ने लगा। झील का पानी, चीड़ के पेड़, दोनों के चेहरे — सब कुछ उसकी रोशनी में नहा गया। फिर, ठीक उसी ख़ाली जगह पर जहाँ से वह टूटा था, वह फिर से जाकर ठहर गया। तारा वापस आ गया था।

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मीरा और आरव एक-दूसरे की बाँहों में खड़े थे — आरव ने मीरा को अपनी छाती से लगा लिया, और मीरा ने अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया। वे आसमान की ओर देख रहे थे, और तारा, जो अभी-अभी वापस लौटा था, दो बार टिमटिमाया — जैसे कह रहा हो, वादा पूरा हुआ।
उस रात के बाद से हर साल सत्रह अक्टूबर की रात, कनाताल की झील के किनारे दो लोग खड़े होते हैं — और आसमान का वह तारा दो बार टिमटिमाता है। लोग कहते हैं, यह कोई खगोलीय घटना है। मगर मीरा और आरव जानते हैं — यह एक तारे का तरीक़ा है, हर साल अपना वादा निभाने का।
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।
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