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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

तेरहवीं मंज़िल

लिफ्ट बारहवीं मंज़िल से ऊपर नहीं जाती — ये मीरा को पहले ही दिन बता दिया गया था।

पर उस रात ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट पर लिफ्ट के पैनल पर एक नया नंबर जला — 13।

अट्ठाईस साल की मीरा रेस्टोरेशन आर्किटेक्ट थी। "सनराइज़ मेंशन" — दादर की 1938 की आर्ट-डेको इमारत — उसके फ़र्म का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट था। बारह मंज़िलें, पीतल की ग्रिल वाली पुरानी लिफ्ट।

पहले दिन केयरटेकर बबन काका ने कहा था — "मैडम, सर्विस लिफ्ट रात को मत इस्तेमाल करना। वो अपनी मर्ज़ी की मालिक है।"

मीरा हँस दी थी। तीसरे दिन हँसी बंद हो गई।

रात के ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट पर वो ड्राइंग-रूम में फ़ाइलें समेट रही थी कि लिफ्ट की घंटी बजी — टन। पैनल पर 13 जल रहा था। लाल।

लिफ्ट खाली आई। दरवाज़ा खुला। अंदर गर्म, पीली रोशनी थी।

"इस बिल्डिंग में बारह मंज़िलें हैं," मीरा बुदबुदाई — और फिर भी अंदर क़दम रख दिया।

दरवाज़ा बंद हुआ। लिफ्ट ऊपर उठी — बारह के पार।

तेरहवीं मंज़िल पर गलियारा था — लाल कालीन, झूमर, हवा में जैज़ और इत्र। दूर कहीं गिलासों की खनक।

और गलियारे के आख़िर में वो खड़ा था। इकतीस के आसपास, काली शेरवानी, हाथ में एक सिगरेट जो जली नहीं थी।

"तुम आ गईं," उसने कहा। "मैं नील हूँ।"

"यहाँ कोई तेरहवीं मंज़िल नहीं है," मीरा की आवाज़ काँप रही थी।

"जो होनी नहीं चाहिए," नील मुस्कुराया, "पर हर रात ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट पर होती है। आओ — पार्टी अभी शुरू हुई है।"

उसने हाथ बढ़ाया। मीरा ने — ख़ुद न जानते हुए क्यों — थाम लिया।

हॉल में पार्टी थी। बनारसी साड़ियाँ, शेरवानियाँ। नील ने मीरा को भीड़ में उतारा — किसी ने पलटकर नहीं देखा, जैसे वो दोनों शीशे के उस पार हों।

"ये सब असली हैं?" मीरा ने फुसफुसाकर पूछा।

"उतने ही," नील बोला, "जितना ये पल।" उसने एक गिलास उसकी तरफ़ बढ़ाया। "पीओगी नहीं — पर पकड़ सकती हो।"

मीरा हँस पड़ी — डर और हैरानी के बीच की हँसी।

"तुम कौन हो, नील?"

"इस इमारत के आर्किटेक्ट का बेटा। और इस मंज़िल का आख़िरी मेहमान।"

"आख़िरी क्यों?"

नील ने घड़ी देखी — 11:52। क्योंकि बारह बजते ही सब कुछ फिर से शुरू हो जाता है — हर रात। वही गाने, वही हँसी, वही अनजली सिगरेट।

"तुम्हारी घड़ी रुकी है। ग्यारह बजकर उनसठ मिनट पर।"

"हमेशा। तुम पहली हो जो लिफ्ट में चढ़ीं।"

तभी घड़ी ने बारह बजाए।

रोशनी बुझी। संगीत थमा। मीरा ने आँखें खोलीं तो वो सर्विस लिफ्ट में थी — पैनल पर 12, गलियारा खाली। जैसे कुछ हुआ ही न हो।

उसकी हथेली में अब भी गर्माहट थी — किसी के हाथ की।

अगली रात मीरा ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर लिफ्ट के सामने खड़ी थी।

बबन काका ने सिर हिलाया। "ऊपर जो है, वो नीचे नहीं आता। और नीचे जो है, वो ऊपर ज़्यादा देर नहीं रहता।"

टन। ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट। पैनल पर 13।

इस बार मीरा बिना झिझक चढ़ गई।

नील उसी जगह था — वही शेरवानी, वही अनजली सिगरेट। "लगा था तुम नहीं आओगी," उसने कहा।

"लगा था तुम नहीं होगे," मीरा बोली।

उस रात नील उसे छत पर ले गया — जहाँ से पूरी मुंबई जगमगाती थी। समंदर की हवा में उसके बाल उड़े; नील ने एक लट सँभाली — उसके हाथ की गर्माहट मीरा के गाल पर ठहर गई।

"तुम्हें छू सकता हूँ," नील ने धीरे से कहा। "इस मंज़िल पर मैं असली हूँ।"

"और नीचे?"

"नीचे मैं सिर्फ़ एक नाम हूँ — किसी पुराने अख़बार के पन्ने पर।"

"तो बताओ। वो पन्ना क्या कहता है?"

नील ने समंदर की तरफ़ देखा। 1978। इस इमारत की सिल्वर जुबली की पार्टी। आधी रात को शॉर्ट सर्किट — आग। तेरहवीं मंज़िल जल गई। पिता ने ऊपर का हिस्सा बंद करवा दिया — नक़्शे दोबारा बने, बारह मंज़िलों वाले। मैं अंदर गया था — ड्राइंगें बचाने।

"और?"

"ड्राइंगें बच गईं।" टूटी हुई मुस्कान। "मैं नहीं।"

मीरा ने उसका हाथ थामा — कसकर, जैसे छोड़ते ही वो धुएँ में घुल जाएगा। "हर रात तुम उसी रात को जीते हो?"

"वही पार्टी, वही गाने — और बारह बजते ही आग।" "डर नहीं लगता, मीरा?"

"लगता है," उसने कहा। "पर तुम्हारे बिना ज़्यादा लगता है।"

अगले दिन मीरा फ़र्म के आर्काइव में घुसी — 1978 की फ़ाइलें, धूल भरे डिब्बे। एक डिब्बे में बिना दस्तख़त की ड्राइंगों का पुलिंदा — तेरहवीं मंज़िल का पूरा नक़्शा।

आख़िरी शीट के कोने में हल्की लिखावट — "N.S. 1978"।

मीरा की साँस रुक गई। उसका रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट इन्हीं ड्राइंगों पर बना था — फ़र्म ने इन्हें "अज्ञात आर्किटेक्ट, 1978" के नाम से फ़ाइल किया था।

ये नील की ड्राइंगें थीं। और मीरा — अनजाने में — उसका अधूरा काम पूरा कर रही थी।

उस रात उसने नील को सब बताया। वो चुप रहा। फिर उसने वो अनजली सिगरेट निकालकर मसल दी।

"तो तुम मेरा काम पूरा कर रही हो," उसने धीरे से कहा।

"हम," मीरा बोली। "तुम्हारी ड्राइंगें, मेरे हाथ की लकीरें।"

नील ने उसके चेहरे को हाथों में लिया। उनके बीच बस एक साँस का फ़ासला था —

तभी घड़ी ने बारह बजाए। रोशनी काँपी। दूर धुआँ उठा — वही आग, वही रात, फिर से।

"लिफ्ट!" नील चिल्लाया।

वो दौड़े — गलियारा धुएँ में डूब रहा था। लिफ्ट का दरवाज़ा खुला था। मीरा ने नील का हाथ खींचा — पूरी जान से। वो दोनों अंदर गिरे। दरवाज़ा बंद हुआ।

और फिर — ख़ामोशी।

मीरा ने आँखें खोलीं तो वो छत पर थी — असली छत, बारहवीं मंज़िल की। बारिश। नील पास बैठा था — भीगा, हाँफता।

"बारह के ऊपर," मीरा बोली, "और तेरह के नीचे। शायद बीच में कहीं।"

बारिश में नील ने उसके गाल से पानी की बूँद हटाई। उसका हाथ इस बार काँपा नहीं। उनके होंठ मिलने ही वाले थे कि —

कहीं दूर घंटी बजी — टन। लिफ्ट की। जैसे कोई बुला रहा हो — या अलविदा कह रहा हो।

"जाओ," मीरा ने फुसफुसाकर कहा। "तुम्हारा काम पूरा हो गया, नील।"

"और तुम्हारा?"

"मेरा अभी बाक़ी है। तुम्हारी मंज़िल बनानी है — असली वाली।"

नील ने उसका माथा चूमा — हल्के से, जैसे बारिश छू रही हो। "तो बनाओ। और जब बने, तो पहली शाम वहीं मनाना। मैं आऊँगा — किसी भी मंज़िल से।"

छह महीने बाद "सनराइज़ मेंशन" का रेस्टोरेशन पूरा हुआ। तेरहवीं मंज़िल — नील की ड्राइंगों के मुताबिक़ — फिर से बनी। उद्घाटन की शाम बोर्ड लगा — "मूल अभिकल्पना — नील शाह (1978)"।

उस रात ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट पर मीरा छत पर खड़ी थी। तभी लिफ्ट की घंटी बजी — टन।

लिफ्ट खाली आई। पैनल पर एक सेकंड के लिए 13 जला — और बुझ गया। जैसे कोई धड़कन।

फ़र्श पर एक चीज़ रखी थी — एक मसलकर फेंकी हुई, अनजली सिगरेट।

मीरा ने उसे उठाया — और मुस्कुरा दी।

कहते हैं, सनराइज़ मेंशन की तेरहवीं मंज़िल पर अब भी कभी-कभी जैज़ सुनाई देता है।

कुछ इश्क़ मंज़िलें नहीं माँगते। सिर्फ़ एक रात — और एक पूरा किया हुआ वादा।

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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