आधी रात के ठीक बारह बजे, बंद दुकान के अंदर टाइपराइटर खुद चलने लगता है। कोई उँगलियाँ नहीं — सिर्फ़ खट-खट की आवाज़, और काग़ज़ पर उतरती एक नई पंक्ति।
उनतीस साल की श्रेया मुंबई की फ्रीलांस पत्रकार थी — मरती हुई कलाओं पर लिखती थी। इस बार कहानी उसे भोपाल के चौक बाज़ार खींच लाई थी — "सलीम एंड संस — टाइपराइटर रिपेयर, 1954 से"।
बहत्तर साल पुरानी दुकान। लकड़ी की अलमारियों में पचासों टाइपराइटर — रेमिंगटन, गोदरेज, ओलिवेट्टी — जैसे किसी पुराने ज़माने की सेना, आराम करती हुई। हवा में मशीन-ऑयल और पुराने रिबन की मिली-जुली खुशबू।
दुकान का मालिक — बत्तीस साल का रयान — तीसरी पीढ़ी का कारीगर था। उसके दादा सलीम ख़ान ने ये दुकान 1954 में खोली थी।
"लेख के लिए आई हो?" रयान ने मुस्कुराते हुए पूछा, हाथ का काला तेल पोंछते हुए। "लोग आते हैं, दो तस्वीरें खींचते हैं, चले जाते हैं।"
"मैं रुकने आई हूँ," श्रेया ने कहा। "तीन दिन। जो दिखेगा, वही लिखूँगी।"
रयान ने कंधे उचकाए। "तीन दिन में तुम्हें सिर्फ़ धूल दिखेगी।"
पहली शाम उसने दुकान का हर कोना देखा — तेल की खुशबू, पुराने रिबन के डिब्बे, दीवार पर 1961 की तस्वीर — पगड़ी वाले बुज़ुर्ग, हाथ में स्क्रूड्राइवर, पीछे टाइपराइटरों की कतार। "दादा — सलीम ख़ान।"
और फिर उसकी नज़र पिछले कमरे के शीशम के डेस्क पर पड़ी — काले रंग का रेमिंगटन, 1958 का मॉडल, काग़ज़ लगा हुआ, जैसे कोई अभी-अभी उठकर गया हो।
"ये बिकता नहीं?" उसने पूछा।
रयान का चेहरा गंभीर हो गया। "ये बिकने के लिए नहीं है। ये... दादा की अमानत है।"

रात को वो बाज़ार के ऊपर वाली सराय में ठहरी। आधी रात को नींद खुली — नीचे से आती खट-खट की आवाज़ पर।
टाइपराइटर की आवाज़। साफ़, ठहर-ठहरकर — जैसे कोई सोच-सोचकर लिख रहा हो।
दुकान तो बंद थी — ताला उसने अपनी आँखों से लगते देखा था।
सुबह वो दुकान पहुँची तो रयान पहले से वहाँ था — डेस्क के सामने खड़ा, हाथ में काग़ज़। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"तुमने रात को कुछ सुना?" उसने पूछा।
"खट-खट," श्रेया ने कहा। "तुम्हारी दुकान से।"
रयान ने काग़ज़ उसकी ओर बढ़ाया। टाइप की हुई एक पंक्ति — ताज़ा, स्याही अभी गीली: "आज वो दुकान में आई — नीली साड़ी में।"
श्रेया ने अपनी साड़ी की ओर देखा। नीली।
"ये मज़ाक है?" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तुम रात को आकर —"
"ताला मेरे पास था," रयान ने कहा। "और ये..." उसने दराज़ खोली — पचासों काग़ज़, हर एक पर एक ही पंक्ति, एक ही लिखावट में: "वो आएगी।"
"छियासठ साल से," रयान ने धीरे से कहा, "हर सुबह काग़ज़ पर यही एक पंक्ति मिलती है। दादा के ज़माने से। दादी कहती हैं — मशीन इंतज़ार कर रही है।"
"किसका?"
"पता नहीं। दादी भी नहीं बतातीं। बस इतना कहती हैं — 'जिस दिन मशीन नई पंक्ति लिखेगी, समझ लेना — इंतज़ार खत्म।'"
उस दिन के बाद श्रेया रोज़ दुकान आने लगी। और हर सुबह मशीन की नई पंक्ति — उसके बारे में। "आज उसने पुराने रिबन छुए।" "आज वो दादा की तस्वीर के सामने देर तक खड़ी रही।" "आज उसने चाय में इलायची डलवाई।"
पंक्तियाँ इतनी सही थीं कि डर लगता था।
एक सुबह की पंक्ति ने उसके रोंगटे खड़े कर दिए: "कल रात बारिश में वो यहीं रुकेगी।"
मौसम साफ़ था। आसमान में एक बादल नहीं। धूप इतनी तेज़ कि बाज़ार की टीन की छतें चमक रही थीं।
"मशीन को मौसम नहीं आता," रयान हँसा। पर उसकी हँसी में घबराहट थी।
शाम को सात बजे — बादल घिरे। आठ बजे — मूसलाधार बारिश।
बाज़ार बंद। सराय तक जाने का रास्ता — घुटनों तक पानी।
"लगता है मशीन सही थी," रयान ने दरवाज़ा बंद करते हुए कहा। "आज रात तुम यहीं।"

बिजली चली गई। लालटेन जली। बारिश शीशों पर बज रही थी — और ठीक बारह बजे, पिछले कमरे से खट-खट शुरू हुई।
दोनों दबे पाँव गए। डेस्क पर कोई नहीं था। कुंजियाँ खुद दब रही थीं — धीरे, ठहर-ठहरकर, जैसे कोई सोच-सोचकर लिख रहा हो।
काग़ज़ पर उतर रही पंक्ति: "आज वो कह देगी — और मशीन चुप हो जाएगी।"
रयान ने श्रेया की ओर देखा। लालटेन की रोशनी में उसका चेहरा — और वो बात जो दिनों से दोनों के बीच बिना कहे तैर रही थी।
"श्रेया..."
"रुको," उसने कहा। "पहले मुझे दादी से मिलना है। मुझे जानना है — मशीन किसका इंतज़ार कर रही थी।"
अगली सुबह वो पचासी साल की सुधा के घर पहुँचे — सलीम ख़ान की बेवा, जिनकी याददाश्त आज भी कमाल की थी। आँगन में धूप, तुलसी के पास बैठीं वो — जैसे इंतज़ार कर रही हों।
श्रेया ने काग़ज़ों का पुलिंदा उनके सामने रखा।
सुधा देर तक "वो आएगी" वाली पंक्तियाँ देखती रहीं। फिर उनकी आँखें भर आईं।
"सन् अट्ठावन में मैं इस दुकान में टाइपिस्ट थी," उन्होंने कहा। "सत्रह साल की। तुम्हारे दादा के पास काम सीखने आई थी — और टाइपिंग भी।"
"और ये मशीन?" श्रेया ने पूछा।
"इसी पर मैंने अपने ख़त टाइप किए थे," सुधा ने कहा। "अमर के नाम। फौज में थे — सीमा पर। चार साल, हर हफ़्ते एक ख़त।"
"उन्होंने जवाब —"
"एक भी ख़त नहीं पहुँचा," सुधा की आवाज़ भर्रा गई। "पता चला — बहुत बाद में — कि बटालियन का डाक गुम हो गया था। और बासठ में... वो नहीं रहे।"
ख़ामोशी छा गई। आँगन में सिर्फ़ चिड़ियों की आवाज़।
"मैंने टाइप करना नहीं छोड़ा," सुधा ने कहा। "हर रात, आधी रात को, मैं दुकान आती — और मशीन पर एक पंक्ति टाइप करती — 'वो आएगी।' मतलब — उसके ख़त की खबर आएगी। छियासठ साल... मशीन ने मेरी आदत सीख ली। अब मैं नहीं जाती — वो खुद टाइप करती है।"
श्रेया की आँखों में आँसू थे। "और अब नई पंक्तियाँ? मेरे बारे में?"
सुधा ने उसका हाथ थामा। "अब मशीन मेरी कहानी तुम्हारे ज़रिए पूरी कर रही है, बिटिया। जो ख़त मुझे नहीं मिले — वो तुम्हें मिल रहे हैं। एक-एक पंक्ति करके।"
उस रात श्रेया दुकान में फिर रुकी। बारिश नहीं थी — पर वो रुकी।
बारह बजे मशीन ने अपनी आख़िरी पंक्ति टाइप की: "मेरी कहानी पूरी हुई।"
फिर — ख़ामोशी। छियासठ साल में पहली बार, सुबह काग़ज़ खाली मिला।
लालटेन की रोशनी में रयान ने उसकी ओर देखा। उसने उसका हाथ थामा — और उनके होंठ मिले — धीरे, जैसे कोई पुरानी चाबी आख़िरकार सही ताले में घूमे।
उसके बाद की रात — सिर्फ़ भोपाल का वो बाज़ार जानता है।

सुबह दो कुल्हड़ चाय थी — और डेस्क पर सुधा दादी का एक पुराना लिफ़ाफ़ा — उनके कभी न भेजे गए ख़तों में से एक, श्रेया के नाम।
अंदर एक पंक्ति थी — सुधा की काँपती लिखावट में: "मेरे ख़त मंज़िल तक नहीं पहुँचे — पर मोहब्बत पहुँच गई।"
श्रेया का लेख नहीं छपा — किताब छपी। "टाइपराइटर की मोहब्बत" — उसी मशीन पर टाइप की हुई।
और वो मशीन? अब वो सिर्फ़ एक रात बोलती है — हर साल, उनकी शादी की सालगिरह पर, ठीक बारह बजे — एक ही पंक्ति: "शुभ विवाह।"
सुधा दादी मुस्कुराती हैं — "मशीन ने मुझसे ज़्यादा इंतज़ार नहीं करवाया।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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