बादल फटने को था — पर वायलिन बजा, और आसमान रुक गया।
शनाया ने कैमरा नीचे किया और पलकें झपकाईं। जहाज़ महल के सामने वाली झील पर काले बादल इतने झुक आए थे कि पानी स्याह पड़ गया था। मांडू की वो शाम — मानसून की पहली बड़ी शाम — चारों ओर से घिर आई थी। पर झील के बीच बने पत्थर-मंडप के ठीक ऊपर बादल फटे हुए थे — जैसे आसमान में छतरी तान दी हो।
और उस छतरी के नीचे, मंडप में, एक आदमी वायलिन बजा रहा था।
उनतीस साल की शनाया — दिल्ली की हेरिटेज आर्किटेक्ट — मांडू के मानसूनी महलों पर किताब के लिए आई थी। उस शाम वो झील किनारे सिर्फ़ तस्वीरें लेने आई थी; पर जो देखा, वो किसी किताब में नहीं था।
वो तीन शाम लौटी — तीनों शाम ठीक छह बजे वही आदमी, वही मंडप, वही धुन। और तीनों शाम बादल मंडप के ठीक ऊपर फट जाते; बारिश झील के चारों ओर पड़ती, पर मंडप की छत पर एक बूँद नहीं।
चौथी शाम वो नाव लेकर मंडप तक पहुँची।
"आप रोज़ यहाँ बजाते हैं?" उसने पूछा, जब धुन थमी।
आदमी ने वायलिन नीचे रखा। तैंतीस के लगभग की उम्र, भीगी हवा में उड़ते बाल, उँगलियों पर रेज़िन की महक। "सात साल से," उसने कहा। "मेरा नाम वरुण है।"
"और बारिश...?" शनाया ने ऊपर देखा। बादल अब भी फटे हुए थे, जैसे साँस रोके हों।
वरुण मुस्कुराया — वो मुस्कान जो जवाब नहीं देती, बात टाल देती है। "मांडू में मानसून के अपने क़ायदे हैं।"
अगले दिन शनाया शहर के सबसे पुराने चायवाले के पास बैठ गई।
"अरे, वो वरुण?" चायवाले ने केतली उठाई। "उस मंडप पर सात साल से बारिश नहीं पड़ी, बिटिया। जब से उसकी अम्मा गईं। कहते हैं — जब तक वो धुन बजती है, बादल रोते नहीं।"
"और अगर धुन रुक जाए?"
चायवाला चुप हो गया। केतली की सीटी लंबी खिंची। "एक बार रुकी थी।"
* * *
अगली शाम शनाया स्केचबुक लेकर फिर मंडप पहुँची। वरुण ने धुन नहीं रोकी; बस आँखों से बैठने को कहा।
धुन ख़त्म हुई तो शनाया ने पूछा, "ये राग कौन-सा है?"
"मेरी अम्मा का। कहती थीं — ये राग बादलों से बात करता है।"
धीरे-धीरे क़िस्सा खुला। वरुण की अम्मा — सुमित्रा — हर मानसून उसी मंडप में वायलिन बजाती थीं। सात साल पहले की एक भयानक शाम बारह साल का वरुण उनके साथ था। धुन के बीचों-बीच उसने वायलिन रख दिया — "बस दो मिनट, अम्मा, मैं नाव देखकर आता हूँ" — और दौड़ गया।
और तभी बादल फटे।
मूसलाधार बारिश में भीगती अम्मा ने धुन नहीं रोकी — काँपते हाथों से बजाती रहीं, जब तक बारिश ने उन्हें छीन नहीं लिया। बुख़ार, निमोनिया — दस दिन में सब ख़त्म।
"अगर मैं न रुका होता," वरुण की आवाज़ रेत-सी खुरदरी हो गई, "तो बादल न फटते।"
शनाया कुछ न बोली। उसने सिर्फ़ अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया। मंडप के ऊपर बादल साँस रोके थे।
उस शाम के बाद शनाया रोज़ आने लगी। वरुण उसे मंडप के पत्थरों के नाम बताता, शनाया उसे शहर की गलियों के।
एक शाम उसने शनाया को वायलिन थामना सिखाया — उसका हाथ उसके हाथ पर, बो की पकड़ सिखाते हुए। झील पर लहरें थीं, और मंडप के ऊपर बादल आज कुछ ज़्यादा ही नीचे।
"तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं," वरुण ने फुसफुसाया।
"बादलों से नहीं डरती," शनाया ने कहा, नज़रें उसके चेहरे पर। "तुमसे भी नहीं।"
उनके चेहरों के बीच बस एक साँस का फ़ासला था। वरुण ने बो नीचे रखा। शनाया ने आँखें नहीं झपकाईं।
तभी दूर कहीं बिजली कड़की — दोनों हँस पड़े, और वो पल हवा में तैरता रह गया, अधूरा, मीठा।
* * *
मानसून की सबसे बड़ी रात आई — जब झील उफनती है और जहाज़ महल सचमुच तैरता लगता है। उस शाम पूरा शहर पुलिया पर जमा था: तूफ़ान के बीच वो एक मंडप, जहाँ बारिश नहीं पड़ती।
वरुण ने बो उठाया। धुन शुरू हुई — अम्मा का राग, सात साल की आदत, एक बच्चे की क़सम।
बादल गरजे। हवा ने झील का पानी उछाला। पर मंडप के ऊपर — आसमान अब भी थमा था।
और तभी — टंकार!
वरुण का तार टूटा। बीच धुन में, सबके सामने — सन्नाटा।
एक पल को पूरी दुनिया रुक गई। फिर बादल — सात साल से रुके हुए बादल — फट पड़े।
मूसलाधार। मंडप की छत पर, पत्थरों पर, वरुण के चेहरे पर। सात साल में पहली बार बारिश ने उस मंडप को छुआ।
पुलिया पर खड़े लोग साँस रोके देख रहे थे। वरुण टूटे वायलिन को देख रहा था — और हँस रहा था। हँसते-हँसते रो रहा था।
शनाया बारिश में भीगती मंडप तक आई और वरुण का चेहरा अपने हाथों में लिया।
"तुम्हारी अम्मा ने आख़िरी बार क्या कहा था?" उसने पूछा।
वरुण ने आँखें बंद कीं। "उन्होंने कहा था — 'अब बादलों को भी रोने दो।'"
"तो तुमने सात साल से क्या किया, वरुण?"
ख़ामोशी। सिर्फ़ बारिश की आवाज़।
"तुमने बादलों को रोने नहीं दिया," शनाया ने धीरे से कहा। "तुम्हारी अम्मा ने राग बादलों से बात करने के लिए बनाया था — उन्हें क़ैद करने के लिए नहीं। वो क़सम एक बारह साल के बच्चे की थी, वरुण। अम्मा की नहीं।"
वरुण ने आँखें खोलीं। बारिश उसकी पलकों से टपक रही थी।
"और आज," शनाया ने कहा, "तार टूटा — पर धुन नहीं टूटी। सुनो।"
दूर — बहुत दूर से, बारिश की लय में — जैसे कोई दूसरा वायलिन बज रहा हो। धीमा, गर्म, पहचाना-सा। वरुण की साँस अटक गई।
"अम्मा...?"
"शायद हवा है — शायद कुछ और। पर वो तुमसे नाराज़ नहीं है, वरुण। वो तुम्हें आज़ाद देखना चाहती है।"
वरुण ने टूटा वायलिन नीचे रखा। और फिर — सात साल में पहली बार — उसने बारिश को अपने ऊपर पड़ने दिया। खुलकर। बिना लड़े।
शनाया उसके सामने खड़ी थी — भीगी, हँसती, रोती। उनके चेहरों के बीच बस एक साँस का फ़ासला था।
और फिर मांडू की उस रात ने अपनी चादर तान दी — बाक़ी कहानी बारिश ने अपने पास रख ली।* * *
ठीक एक साल बाद — मानसून की पहली बड़ी शाम।
मंडप में दो वायलिन थे। वरुण ने बो उठाया — वही राग। पर इस बार उसके बग़ल में शनाया थी — हाथ में उसका हाथ।
बादल घिरे। गरजे। और इस बार वरुण ने उन्हें नहीं रोका।
बारिश पड़ी — मंडप पर, पत्थरों पर, दोनों पर। हल्की, मीठी, जैसे आशीर्वाद। अब सब जानते थे: ये धुन बादलों को रोकती नहीं — उनसे बात करती है।
और बारिश की लय में — अगर ध्यान से सुनो — आज भी कोई दूसरा वायलिन बजता है। धीमा, गर्म, बहुत दूर से।
सुबह झील किनारे दोनों चाय पी रहे थे। शनाया का सिर वरुण के कंधे पर था। उसकी किताब छप चुकी थी — समर्पण पेज पर लिखा था:
"उस धुन के नाम, जो बादल रोकती थी — और उस इश्क़ के नाम, जिसने उन्हें रोने दिया।"
कहते हैं, उस मंडप पर अब भी हर मानसून वायलिन बजता है — पर अब वहाँ बारिश भी पड़ती है।
क्योंकि कुछ राग आसमान को थामने के लिए नहीं होते। कुछ राग — दिल थामने के लिए होते हैं।
[समाप्त — Raat Ke Afsane]



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