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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

वो जहाज़ जो नक़्शे पर नहीं

तूफ़ान की पहली बिजली चमकी — और दीपस्तंभ की बत्ती अपने आप मुड़ गई।

तारा गैलरी की रेलिंग से चिपकी रह गई। बत्ती को हिलना नहीं चाहिए था। दोपहर को इंजीनियरों ने क्लॉकवर्क मोटर अलग कर दी थी — अगले हफ़्ते ऑटोमेशन लगना था।

पर बत्ती मुड़ी थी। धीरे-धीरे, जैसे कोई बहुत पुरानी गर्दन बहुत पुरानी आदत से मुड़ी हो। और रुक गई — सीध कैरवाड़ी चट्टान की तरफ़।

अट्ठाईस साल की तारा ने बाइनॉक्युलर उठाए।

बत्ती के उजाले में — एक जहाज़ था।

लकड़ी की धोव, बिना झंडे की, बिना नेविगेशन लाइटों की। सिर्फ़ एक फ़ानूस — पिछले हिस्से में टंगा, हवा में झूलता हुआ, पीली लौ के साथ। वो चट्टान की तरफ़ बढ़ रही थी।

तारा ने पलक झपकाई।

जहाज़ नहीं था। सिर्फ़ काला पानी, सफ़ेद झाग, और बत्ती की खाली रोशनी।

---

"बाबा ने इसे 'वो रातों वाली लाइन' कहा था।"

तारा ने लॉगबुक विराज के सामने खोली। बत्तीस साल का विराज — कोस्ट गार्ड का डाइविंग ऑफ़िसर — चट्टान के नीचे अपने सर्वे कैंप से धाराओं का रिकॉर्ड माँगने ऊपर आया था, और लॉगबुक के पन्नों में अटक गया था।

चालीस साल। हर तूफ़ानी रात, उसके पिता रघु के हाथ की एक ही लाइन:

"बिना झंडे का जहाज़। एक फ़ानूस। रडार पर कुछ नहीं।"

आख़िरी एंट्री — तीन महीने पहले की रात। उसी रात रघु अपने कीपर-कॉटेज में सोते-सोते चले गए थे।

"रडार पर कुछ नहीं?" विराज ने भौंह उठाई। "आपके बाबा की उम्र हो गई थी, तारा जी। समंदर रात को अजीब चीज़ें दिखाता है।"

"मेरे बाबा की आँखों को कभी धोखा नहीं हुआ।" तारा ने कहा। "और कल रात मैंने भी उसे देखा। बत्ती अपने आप मुड़ी थी, विराज। मोटर अलग है — मैंने ख़ुद देखा था इंजीनियरों को।"

विराज ने लॉगबुक बंद नहीं की। कुछ देर वो पुराने पन्नों को देखता रहा, फिर बोला, "आज रात तूफ़ान फिर आएगा — मौसम विभाग का अलर्ट है। मैं अपना पोर्टेबल रडार लेकर ऊपर आऊँगा।"

"बत्ती तो बंद है," तारा ने कहा।

"फिर भी।" विराज मुस्कुराया। "अगर जहाज़ आएगा, तो रडार उसे देखेगा। और अगर नहीं आया — तो हम चाय पिएँगे और आपके बाबा की यादों पर हँसेंगे।"

---

शाम को लैंप-रूम में चाय बनी — दो कुल्हड़, अदरक वाली।

बाहर हवा ने खिड़कियों को थपथपाना शुरू कर दिया था। तारा ने बताया कि वो इस दीपस्तंभ में बड़ी हुई है — डेढ़ सौ साल पुराना टावर, जिसे उसके बाबा 'बूढ़ा चौकीदार' कहते थे। "बाबा कहते थे — शीशा सब याद रखता है, तारा। रोशनी जहाँ-जहाँ पड़ी, वो सब इसके अंदर है।"

विराज ने बताया कि वो मलबों में गोता लगाता है — डूबे जहाज़ों के सर्वे। "समंदर चीज़ें रख लेता है, तारा जी — और कभी-कभी इंतज़ार भी।"

"इंतज़ार?" तारा ने पूछा।

विराज कुछ कहने ही वाला था कि तभी — गैलरी के शीशों पर रोशनी का एक धब्बा घूमा।

दोनों एक साथ खड़े हुए।

बत्ती मुड़ रही थी। मोटर अलग, तार कटे — और डेढ़ सौ साल पुराना शीशों का पहिया अपने आप घूम रहा था, धीमा, भारी, अटल। वो रुका — सीध चट्टान की तरफ़।

विराज ने रडार की स्क्रीन देखी। खाली। बिल्कुल खाली।

तारा ने बाइनॉक्युलर उसकी तरफ़ बढ़ाए।

विराज ने देखा — और उसका चेहरा बदल गया।

"वो… वो वहाँ है," वो फुसफुसाया। "फ़ानूस वाली धोव। रडार पर कुछ नहीं — पर आँखों से…"

"आँखों से सब कुछ," तारा ने कहा।

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"राबिया।" तारा ने दादी की कही कहानी याद की। "डेढ़ सौ साल पहले, जब ये दीपस्तंभ नहीं था — सिर्फ़ चट्टान थी और एक दीये बनाने वाले की बेटी।"

राबिया का शौहर हमीद गोताख़ोर था। एक तूफ़ानी रात उसकी नाव नहीं लौटी। हर तूफ़ानी रात राबिया चट्टान पर चढ़ती, फ़ानूस जलाती, और भोर तक वहीं बैठी रहती। चालीस साल। गाँव वाले कहते — "वो हमीद का इंतज़ार नहीं करती, वो समंदर को रास्ता दिखाती है — ताकि कोई और हमीद अँधेरे में न खोए।"

जिस साल राबिया फ़ानूस के पास ही सो गई — उसी साल ये दीपस्तंभ बना। 1871।

"तो ये जहाज़…" विराज धीरे से बोला।

"भूत नहीं है," तारा ने कहा। "ये इंतज़ार है — जो समंदर ने रख लिया। राबिया का फ़ानूस हर तूफ़ान में जलता है, और ये बत्ती — जो उसी की चट्टान पर खड़ी है — उसके फ़ानूस को जवाब देती है। बाबा की लाइन का मतलब अब समझ आया — 'रडार पर कुछ नहीं' — क्योंकि ये नक़्शों का जहाज़ नहीं है। ये यादों का है।"

विराज चुप रहा। फिर उसने बैग से एक कपड़ा निकाला — अंदर पीतल का एक जला-काला फ़ानूस-तला था, चट्टान से चिपका हुआ।

"मेरे डाइव सर्वे में चट्टान पर मिला," उसने कहा। "डेढ़ सौ साल पुराना। मैं किसी को बताने वाला था — पर ख़ुद यक़ीन नहीं हो रहा था।"

तारा ने फ़ानूस-तले को छुआ। ठंडा पीतल — पर उसे लगा जैसे उसमें अब भी कोई गर्मी बाक़ी हो।

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सीज़न का सबसे बड़ा तूफ़ान उस रात आया।

"हम राबिया का फ़ानूस फिर जलाएँगे," तारा ने कहा। "आज। अभी।"

विराज ने उसे देखा — पागलपन था, पर उसकी आँखों में वही पागलपन था जो गहरे पानी में गोताख़ोरों की आँखों में होता है।

वो दोनों पुराना तूफ़ानी फ़ानूस लेकर चट्टान के रास्ते उतरे। हवा चीख़ रही थी, लहरें पत्थरों से टकराकर आसमान छू रही थीं। एक जगह रास्ता टूटा हुआ था — विराज ने तारा का हाथ पकड़ा, और छोड़ा नहीं। उसके हाथ की गर्मी तूफ़ान से ज़्यादा तेज़ थी।

चट्टान की नोक पर, जहाँ राबिया चालीस साल बैठी थी, उन्होंने फ़ानूस जलाया।

और समंदर ने साँस रोकी।

धोव आई — इस बार बहुत करीब। कोई मल्लाह नहीं था — सिर्फ़ पिछला फ़ानूस, स्थिर जलता हुआ।

और उसका फ़ानूस — एक बार, दो बार फड़फड़ाया — और बुझ गया।

धीरे से। जैसे कोई साँस छोड़ दे।

धोव छींटों में घुल गई। और बत्ती — जैसे किसी ने उसे छोड़ दिया हो — अपनी आराम की जगह पर लौट आई।

गैलरी पर, भीगे हुए, तूफ़ान की चीख़ में — विराज ने तारा का चेहरा अपने हाथों में लिया।

उनके होंठों के बीच बस एक साँस का फ़ासला था — और फिर तूफ़ान ने अपनी चादर तान दी। बाक़ी कहानी समंदर ने अपने पास रख ली।

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सुबह समंदर नीला था — बेइंतहा नीला।

लैंप-रूम में दो कुल्हड़ चाय के। ऑटोमेशन इंजीनियर का फ़ोन आया — सिस्टम ने भोर में कंट्रोल ले लिया था, सब साफ़। पुरानी मोटर रात भर हिली तक नहीं — रिकॉर्ड में।

विराज का रडार लॉग रात भर खाली था।

"तो अब?" विराज ने पूछा।

"अब मैं यहीं रहूँगी," उसने कहा। "बूढ़े चौकीदार को अभी एक कीपर चाहिए — ऑटोमेशन के बावजूद।"

विराज मुस्कुराया — वो मुस्कुराहट जो जवाब नहीं देती, साथ देती है।

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एक साल बाद, शादी की रात — गैलरी पर खड़े दोनों ने देखा:

ऑटोमेटेड बत्ती — अपने आप — एक बार मुड़ी।

सीध चट्टान की तरफ़।

जहाँ एक फ़ानूस जल रहा था।

तारा ने विराज का हाथ पकड़ा। "राबिया ने आख़िरकार दुल्हन देख ली।"

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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