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वो कागज़ की कश्ती जो हर रात झील पार करके आती थी

(यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।) हर रात ठीक बारह बजे, जब नीरपुर की झील पर चाँदनी बिछ जाती थी, एक कागज़ की कश्ती बिना किसी हवा के, बिना किसी लहर के, झील पार करके आती थी — और नैना के घर की आख़िरी सीढ़ी पर आकर रुक जाती थी। नैना सत्ताईस साल की थी, झील के किनारे बने छोटे-से घर में रहती थी, जहाँ से झील दिखती थी। वह कागज़ की कश्तियाँ, लालटेनें और फूल बनाकर झील-किनारे के बाज़ार में बेचती थी। पर पिछले सात दिनों से नैना की उँगलियाँ काँप रही थीं। वजह थी वह कश्ती, जो हर रात बारह बजे उसकी सीढ़ी पर आती थी — न उसकी बनाई हुई, न बाज़ार की किसी दुकान की — और जिसके अंदर, चाँदनी में चमकती स्याही से, एक पंक्ति लिखी होती थी। पहली रात की पंक्ति थी — "तुम्हारी हँसी की आवाज़ इस झील को भी सुनाई देती है।" नैना ने इसे मज़ाक समझा। दूसरी रात लिखा था — "तुम जब कश्तियाँ बनाती हो, तो तुम्हारे हाथों से झील का पानी भी मुस्कुराता है।" तीसरी रात — "मैंने तुम्हें कभी करीब से नहीं देखा, फिर भी तुम्हारी हर कश्ती मुझे पहचानती है।" चौथी रात कश्ती आई — सफ़ेद कागज़ की, किनारों पर हल्की नील...

वो निमंत्रण

कार्ड पर दुल्हन का नाम उसका था — वेदिका — और वो कार्ड छपा था तीस साल पहले।

उनतीस साल की वेदिका उदयपुर के उस पैलेस-होटल की सीढ़ियाँ उतर रही थी जहाँ अगले हफ़्ते सीज़न की सबसे बड़ी शादी होनी थी। वो वेडिंग प्लानर थी — मुंबई से आई, तीन दिन से नींद पूरी नहीं हुई थी, और मंडप के फूलों का ऑर्डर अभी तक अटका था।

पुराने स्टोर रूम में वो 1994 के बचे हुए सजावट के डिब्बे ढूँढने गई थी। धूल, टूटे झूमर, पीतल के बर्तन — और एक लकड़ी के संदूक में, रेशम में लिपटा, शादी के कार्डों का एक बंडल।

सबसे ऊपर वाले कार्ड पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था — "शुभ विवाह — वेदिका"।

उसके हाथ काँपे। कार्ड पलटा — अंदर तारीख़ थी: 14 जुलाई, 1994। दूल्हे के नाम की जगह एक धब्बा था — जैसे स्याही कभी सूखी ही न हो, तीस साल से गीली।

"ये किसका मज़ाक है?" उसने ख़ुद से कहा।

पीछे से आवाज़ आई — "मज़ाक नहीं, दस्तूर है।"

चौंतीस साल का शौर्य दरवाज़े पर खड़ा था। होटल का हेरिटेज मैनेजर — पिछले तीन दिन से जिससे उसकी हर बात पर बहस हो रही थी। वो परी-लाइटें चाहता था, ये दीये; वो कहता था बारिश में आतिशबाज़ी नहीं होगी, ये कहती थी होगी।

"तुम्हें कैसे पता मेरा नाम?" वेदिका ने कार्ड उसकी तरफ़ बढ़ाया।

शौर्य ने कार्ड देखा — और उसका चेहरा उतर गया। "ये... ये यहाँ कैसे?"

"तुम जानते हो इसके बारे में?"

वो ख़ामोश रहा। फिर बोला, "चलो। बूढ़े ख़ानसामा से पूछते हैं। वो सब जानता है।"

रात को बारिश शुरू हुई — मानसून की पहली भारी बारिश, झील पर थपेड़े मारती। अस्सी साल के रहीम चाचा ने कार्ड को उल्टा-पल्टा, चश्मा ठीक किया।

"1994," वो बोले। "महाराजा साहब के भतीजे की शादी तय हुई थी। कार्ड छपे — बँटने से एक हफ़्ते पहले बारात वाले दिन दूल्हा नहीं रहा। दिल का दौरा। पच्चीस साल का था।"

"और दुल्हन?" वेदिका ने पूछा।

"दुल्हन का नाम कभी तय ही नहीं हुआ था," रहीम चाचा ने कहा। "रिश्ता टूटा नहीं था — बस वक़्त रुक गया था।"

"पर इस पर मेरा नाम—"

"महल जिसे चाहता है," बूढ़े ने उसकी आँखों में देखा, "उसका कार्ड ख़ुद छापता है।"

वेदिका हँस पड़ी — थकी हुई, नर्वस हँसी। "अच्छा मज़ाक है।"

पर उस रात, अपने कमरे में, उसने कार्ड तकिये के पास रखा — और आधी रात को आँख खुली तो धब्बा हिल रहा था।

स्याही — तीस साल से गीली स्याही — धीरे-धीरे आकार ले रही थी। पहला अक्षर उभरा: "श"।

उसकी साँस थम गई।

अगले दो दिन वो शौर्य से बचती रही — या बचने की कोशिश करती रही। पर होटल छोटा था, बारिश बड़ी थी, और काम एक ही था। मंडप की सजावट पर फिर बहस हुई — इस बार दीयों पर।

"तुम्हें हर चीज़ में पुरानापन क्यों चाहिए?" उसने कहा।

"क्योंकि पुरानी चीज़ें टिकती हैं," शौर्य ने कहा — और एक पल को उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो बहस से बड़ा था।

उस रात धब्बे में दूसरा अक्षर उभरा: "शौ"।

वेदिका ने कार्ड दराज़ में बंद किया। दराज़ को ताला लगाया। सुबह ताला खुला मिला — और कार्ड तकिये पर था। तीसरा अक्षर: "शौर"।

वो शौर्य के दफ़्तर पहुँची — कार्ड मेज़ पर पटका। "ये बंद करो।"

"मैंने कुछ नहीं किया," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में डर था — पहली बार।

"तो कौन कर रहा है?"

शौर्य ने दराज़ से एक पुरानी डायरी निकाली — उसके दादा की, जो 1994 में इस महल के मैनेजर थे। "उन्होंने लिखा है — उस शादी के बाद महल ने एक दस्तूर बनाया। हर पीढ़ी में एक कार्ड अधूरा छपता है। दुल्हन का नाम महल ख़ुद चुनता है।"

"और दूल्हा?"

"दूल्हे का नाम," शौर्य ने धीरे से कहा, "तब साफ़ होता है जब दुल्हन मान जाए।"

वेदिका की धड़कन रुक सी गई। "मान जाए — क्या?"

"कि वो इसी महल की है।"

बारिश उस रात इतनी तेज़ थी कि झील का पानी छत की मुंडेरों से टकरा रहा था। वेदिका छतरी लिए टैरेस पर गई — वहाँ शौर्य पहले से था, भीगा हुआ, हाथ में वही कार्ड।

धब्बा अब पूरा नाम था — "शौर्य"। साफ़, सुनहरा, जैसे अभी छपा हो।

"तुम्हें डर लग रहा है?" उसने पूछा।

"बहुत," वेदिका ने कहा — और एक क़दम आगे बढ़ी।

बारिश की बूँदें उसके चेहरे पर थीं, उसकी साँसों में गीली मिट्टी की ख़ुशबू। शौर्य ने उसके गाल से पानी की बूँद पोंछी — उँगलियाँ ठहरीं, फिर उसने उसके चेहरे को हाथों में लिया, धीरे से, जैसे कोई पुराना कार्ड थामता हो।

"महल ग़लत नहीं चुनता," वो फुसफुसाया।

उनके होंठ मिले — बारिश, तीस साल का इंतज़ार, और एक अधूरा कार्ड, सब एक पल में पूरा हो गया।

बारिश ने पर्दा डाल दिया।

उसके बाद सिर्फ़ बारिश की आवाज़ रही। और दो धड़कनें — जो शायद 1994 से एक-दूसरे को ढूँढ रही थीं।

सुबह चाय की ख़ुशबू से आँख खुली — वेदिका टैरेस के झूले पर थी, शौर्य के कंधे पर सिर रखे। उसके हाथ में कार्ड था — अब पूरा। दुल्हन: वेदिका। दूल्हा: शौर्य। तारीख़ की जगह ख़ाली थी।

"तारीख़?" उसने पूछा, मुस्कराते हुए।

शौर्य ने जेब से पेन निकाला, कार्ड उसकी तरफ़ बढ़ाया। "तुम लिखो। जब मन करे।"

वेदिका ने पेन लिया — और ख़ाली जगह में लिखा: "जब बारिश थमे।"

रहीम चाचा ने कार्ड को महल के म्यूज़ियम में रखा — 1994 के बंडल के साथ, सबसे ऊपर।

"अब ये अधूरा नहीं," बूढ़ा मुस्कराया। "बस... तारीख़ तय होनी बाक़ी है।"

[समाप्त — Raat Ke Afsane]

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