सुबह के साढ़े चार बजे थे, और बनारस अभी सो रहा था — सिर्फ़ गंगा जाग रही थी।
नग़मा घाट की सीढ़ियों पर बैठी थी, अट्ठाईस साल की उम्र में पहली बार इतनी सुबह उठी थी। दिल्ली से आई थी — पुरानी हवेलियों के रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट पर काम करने वाली आर्किटेक्ट। नींद नहीं आई थी, तो कैमरा उठाकर निकल पड़ी थी। कोहरा पानी पर तैर रहा था, और दूर कहीं पहली नाव की चप्पू की आवाज़ आ रही थी।
तभी गली के मोड़ पर उसे रौशनी दिखी।
एक छोटी-सी पान की दुकान — इतनी छोटी कि दो आदमी भी मुश्किल से खड़े हों। पीतल का पानदान लालटेन की रौशनी में चमक रहा था, और दुकान के बाहर लकड़ी की तख़्ती पर चॉक से लिखा था — "यादों वाला पान — एक बार खाकर देखिए।"
नग़मा के होंठों पर हल्की हँसी आई। मार्केटिंग का नया तरीका।

दुकानदार बत्तीस-तैंतीस का रहा होगा — नाम फरहान। उसके हाथ पान लगाते हुए भी नहीं रुकते थे, जैसे उँगलियों को बरसों की आदत हो। चेहरे पर न जल्दबाज़ी, न थकान — बस एक अजीब-सा सुकून।
"इतनी सुबह दुकान?" नग़मा ने पूछा।
"गंगा के साथ उठता हूँ, बीबीजी," फरहान ने बिना नज़र उठाए कहा। "जो सुबह सबसे पहले आता है, उसे सबसे अच्छा पान मिलता है।"
एक बूढ़ा आदमी आया, चुपचाप पान लिया, मुँह में रखा — और उसकी आँखें भर आईं। उसने फरहान के कंधे पर हाथ रखा, कुछ कहा नहीं, बस चला गया।
"रो क्यों रहा था?" नग़मा ने पूछा।
"रो नहीं रहा था," फरहान ने पान का पत्ता मोड़ते हुए कहा। "याद कर रहा था। मेरा पान लोगों को उनकी सबसे ख़ुशनुमा याद का स्वाद देता है।"
नग़मा हँस पड़ी — आर्किटेक्ट वाली हँसी, जिसमें नाप-तौल होती है। "अच्छा? तो मुझे भी एक दीजिए। देखते हैं मेरी कौन-सी याद निकलती है।"
फरहान ने पहली बार नज़र उठाकर उसे देखा। गहरी, ठहरी हुई नज़र। फिर उसने एक पान लगाया — धीरे-धीरे, जैसे कोई चिट्ठी लिख रहा हो — और उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।
नग़मा ने मुँह में रखा।
और दुनिया बदल गई।
सावन की दोपहर थी। किसी आँगन में नीम के पत्तों पर बारिश गिर रही थी — छपाक, छपाक, छपाक। गीली मिट्टी की ख़ुशबू। कहीं कोई औरत कजरी गा रही थी, और एक लड़का हँस रहा था — खुलकर, बेपरवाह। नग़मा की आँखों के सामने एक छोटी-सी लड़की दौड़ रही थी, दो चोटियाँ बँधी हुईं, बारिश में भीगती हुई।

"ये..." नग़मा का हाथ काँपा। पान हाथ से गिरते-गिरते बचा। "ये क्या था?"
"आपकी याद," फरहान ने कहा।
"झूठ!" उसकी आवाज़ तेज़ हो गई। "मैंने ऐसी जगह कभी देखी नहीं! मैं दिल्ली में पली-बढ़ी हूँ, मेरे बचपन में कोई आँगन नहीं था, कोई नीम नहीं था!"
फरहान ने कुछ कहा नहीं। बस एक और पान लगाया और चुपचाप उसकी तरफ़ बढ़ा दिया। नग़मा ने उसे घूरा — फिर, न जाने क्यों, ले लिया।
उस शाम वो फिर आई। फिर अगली शाम। फिर हर शाम।
हर पान के साथ आँगन और साफ़ होता गया। लड़की की चोटियों में लगा लाल रिबन दिखने लगा। लड़के के हाथ में काग़ज़ की नाव। औरत का चेहरा अब भी धुंधला था — बस उसकी आवाज़ साफ़ थी, कजरी की वो तान जो नग़मा की रगों में उतरती चली गई।
"तुमने इसमें कुछ मिलाया है," एक शाम नग़मा ने सीधे कहा। "कोई नशा, कोई... मैं नहीं जानती। पर ये मेरी याद नहीं हो सकती।"
फरहान के हाथ एक पल के लिए रुके। उसने नज़र उठाई, और नग़मा ने पहली बार उसके चेहरे पर दर्द देखा।
"बीबीजी, मैंने आज तक किसी को उसकी अपनी याद के सिवा कुछ नहीं दिया," उसने धीरे से कहा। "पान झूठ नहीं बोलता। जो दिल माँगता है, वही देता है। आपका दिल... शायद कुछ ढूँढ रहा है जो आप भूल गई हैं।"
उस रात नग़मा सो नहीं सकी।
अगली शाम बारिश हो रही थी। फरहान ने पान दिया — और इस बार स्वाद नमकीन था। आँसुओं जैसा।
आँगन में बारिश थी। औरत रो रही थी — चुपचाप, आँचल से मुँह ढके। लड़का छोटी लड़की पर छाता ताने खड़ा था, ख़ुद भीग रहा था। और नग़मा की अपनी आँखों से आँसू बह रहे थे — उसे पता भी नहीं चला कब।
"कौन हैं ये लोग?" उसकी आवाज़ टूट गई।
फरहान ने जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली — पीली पड़ी, कोनों से मुड़ी। एक आँगन, नीम का पेड़, एक औरत, और दो बच्चे।
"ये मेरी अम्मी हैं," उसने कहा। "और ये मैं — ग्यारह साल का। और ये लड़की..."
नग़मा ने तस्वीर छीन ली। लड़की की दो चोटियाँ। लाल रिबन।
उसके हाथ काँपने लगे।
"ये... ये मेरी नानी का घर है," वो बुदबुदाई। "विश्वनाथ गली के पीछे वाला... मैं... मैं सात साल की थी। एक सावन नानी के यहाँ रही थी। फिर नानी चल बसीं, और हम दिल्ली चले गए। मैंने... मैंने सब भूल दिया था।"
"तुम वो लड़की हो," फरहान की आवाज़ भर्रा गई। "जो हर शाम मेरे आँगन में आती थी। जिसकी चोटी खींचने पर वो रोती थी, फिर हँस पड़ती थी। इक्कीस साल हो गए, नग़मा।"
"तुम्हें मेरा नाम कैसे—"
"तुम्हारी नानी तुम्हें आवाज़ देती थीं — 'नग़मा, खाना खा ले!' पूरा मोहल्ला सुनता था।"
सन्नाटा। बारिश की आवाज़। लालटेन की लौ काँपी।
"तो पान ने मुझे तुम्हारी याद नहीं दी," नग़मा ने धीरे से कहा। "उसने मुझे मेरी अपनी याद लौटाई — जो मैंने कहीं खो दी थी।"
फरहान ने सिर झुकाया। "पान वही देता है जो दिल माँगता है। तुम्हारा दिल इक्कीस साल से ये आँगन ढूँढ रहा था।"
अगली सुबह नग़मा घाट की सीढ़ियों पर बैठी थी — उसी जगह, उसी वक़्त। फरहान आया, चुपचाप उसके पास बैठ गया। नीचे गंगा बह रही थी, ऊपर आसमान में पहली रौशनी फूट रही थी।
"तुम्हें याद आया?" उसने पूछा।
नग़मा ने सिर हिलाया — हँसते-हँसते रोते हुए। "सब। अम्मी की कजरी। तुम्हारा काग़ज़ की नाव बनाना। वो दिन जब तुमने मेरी चोटी खींची थी और मैंने तुम्हें धक्का दे दिया था।"
फरहान हँसा — इक्कीस साल पुरानी हँसी। फिर उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उसके गाल पर ढलकता आँसू पोंछ दिया। उसका अँगूठा उसके गाल पर एक पल ठहरा रहा।
नग़मा ने आँखें बंद कर लीं।
दोनों के माथे बस एक साँस की दूरी पर थे। उसकी साँस उसके चेहरे को छू रही थी। घाट पर आरती के घंटे बजने लगे — टन, टन, टन — और सुबह की पहली किरण उनके चेहरों पर पड़ी।
बाक़ी सुबह ने अपने आँचल में छिपा लिया।

नग़मा ने अपना रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट सावन भर के लिए बढ़ा दिया।
और विश्वनाथ गली के मोड़ पर, लालटेन की रौशनी में, अब तख़्ती पर एक लाइन और जुड़ गई है — "यादों वाला पान — कुछ यादें पान में नहीं घुलतीं, वो दिल में उतरती हैं।"
[समाप्त — Raat Ke Afsane]
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